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‘मराठी अस्मिता’ पर ठाकरे बंधुओं की जुगलबंदी….उद्धव-राज ने समझी एक दूसरे के मन की भाषा…सियासी वापसी की कोशिश या मजबूरी?

DigitalDesk by DigitalDesk
July 8, 2025
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‘मराठी अस्मिता’ पर ठाकरे बंधुओं की जुगलबंदी….उद्धव-राज ने समझी एक दूसरे के मन की भाषा…सियासी वापसी की कोशिश या मजबूरी?
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महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से अलग राहों पर चल रहे ठाकरे परिवार के दो चेहरे — उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे — आखिरकार एक मंच पर नजर आए। मौका था महाराष्ट्र सरकार की ‘थ्री लैंग्वेज पॉलिसी’ के खिलाफ हुई एक विजय रैली का, जिसे मराठी अस्मिता की जीत के रूप में पेश किया गया। यह रैली न सिर्फ मराठी भाषियों के अधिकारों की बात करने के लिए बुलाई गई थी, बल्कि राजनीतिक हलकों में इसे ठाकरे परिवार की राजनीतिक जड़ों की ओर वापसी की कोशिश भी माना जा रहा है।

मराठी अस्मिता की राजनीति: बाल ठाकरे से लेकर आज तक

मराठी अस्मिता की राजनीति की नींव बाल ठाकरे ने रखी थी। 1960 में मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाने के बाद भी मराठी भाषी लोग वहां अल्पसंख्यक थे। इस असंतुलन को दूर करने के लिए बाल ठाकरे ने अपने अखबार मार्मिक से मराठी चेतना जगाई और 1966 में शिवसेना की स्थापना की। बाल ठाकरे ने मुंबई में बाहरी राज्यों से आने वालों का विरोध किया और मराठी मानुष को रोजगार व सम्मान देने की मांग की। इसी विचारधारा से शिवसेना आगे बढ़ी। राज ठाकरे ने भी शिवसेना के इन मूल विचारों को अपनी राजनीति की धुरी बनाया, जबकि उद्धव ठाकरे ने अपेक्षाकृत संयमित और समावेशी राजनीति की राह पकड़ी।

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राजनीतिक पतन और वोट बैंक की गिरावट

2009 के विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे की एमएनएस ने अपनी पहली ही परीक्षा में 13 सीटें और 5.7% वोट हासिल किए, जबकि शिवसेना को चार फीसदी वोट का नुकसान हुआ। 2014 में शिवसेना ने 63 सीटें जीतीं और एमएनएस की ताकत घटकर सिर्फ एक सीट पर आ गई। 2019 और फिर 2024 के चुनाव में स्थिति और खराब हुई। 2024 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को मात्र 10% वोट और 20 सीटें, जबकि एमएनएस 0 सीट और 1.6% वोट पर सिमट गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ठाकरे बंधुओं की राजनीति ने न सिर्फ गैर मराठी वोट बैंक को खोया, बल्कि मराठी मतदाताओं का भरोसा भी कम किया।

मराठी बनाम हिंदी… संतुलन की राजनीति

थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के खिलाफ राज ठाकरे ने आक्रामक रूप से बयानबाज़ी की, लेकिन उद्धव ठाकरे की रणनीति ज्यादा संतुलित रही। वह किसी भी तरह हिंदी विरोधी छवि से बचना चाहते थे। उन्होंने डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के ‘जय गुजरात’ कहने पर हमला जरूर बोला, लेकिन हिंदी भाषा के खिलाफ सीधे कोई बयान नहीं दिया। जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने ठाकरे बंधुओं को हिंदी थोपने के खिलाफ सहयोग की बात कही, तो संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया कि “हम किसी को हिंदी बोलने से नहीं रोकते, लेकिन स्कूलों में इसे थोपे जाने का विरोध करते हैं।”

राजनीतिक मजबूरी या रणनीतिक वापसी?

राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को ठाकरे परिवार की सियासी मजबूरी मान रहे हैं। उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे वर्ली सीट से विधायक हैं, जहां उत्तर भारतीय वोटरों की संख्या निर्णायक है। ऐसे में हिंदी विरोधी रुख उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है।
वहीं राज ठाकरे के पास एमएनएस को पुनर्जीवित करने का यही एक मौका है। अगर वे मराठी अस्मिता की राजनीति में फिर से पकड़ बना पाए तो 2029 तक खुद को प्रासंगिक बना सकते हैं।

जनता की बदलती प्राथमिकताएं

अब मराठी मतदाता केवल अस्मिता की बातों से संतुष्ट नहीं होते। उन्हें रोजगार, शिक्षा, मूलभूत सुविधाएं और पारदर्शी प्रशासन की उम्मीद है। शिवसेना और एमएनएस दोनों ही इस मोर्चे पर पिछड़ते नजर आए हैं। इसके अलावा, हिंदुत्व की राजनीति का मैदान अब पूरी तरह बीजेपी के कब्जे में है, जिससे ठाकरे परिवार के पास अपनी अलग पहचान स्थापित करना और मुश्किल हो गया है।

दो दशक बाद साथ आए ठाकरे बंधु

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, दोनों का एक साथ मंच पर आना कोई साधारण दृश्य नहीं था। साल 2005 में राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होकर अपनी पार्टी — महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) — बनाने के बाद यह पहला मौका था जब वे सार्वजनिक रूप से एक मंच साझा करते नजर आए। इस ‘गैर राजनीतिक’ रैली में राज्य सरकार को थ्री लैंग्वेज पॉलिसी वापस लेने को मजबूर करने की जीत का जश्न मनाया गया, लेकिन असल संदेश मराठी अस्मिता की राजनीति का पुनरुत्थान था।

आखिर क्या है थ्री लैंग्वेज पॉलिसी ?

महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार ने हाल ही में सभी स्कूलों में मराठी और अंग्रेजी के अलावा हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का प्रस्ताव पेश किया था। इस फैसले का विरोध करते हुए ठाकरे बंधुओं ने इसे मराठी भाषा और संस्कृति पर हमले के रूप में देखा।
उनका तर्क था कि मराठी भाषियों के अधिकारों की कीमत पर किसी अन्य भाषा को थोपा नहीं जा सकता। दबाव बढ़ने पर सरकार ने यह फैसला वापस ले लिया।

क्या ‘मराठी वॉर’ से होगी वापसी?

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक मंच पर आना प्रतीकात्मक रूप से भले ही मराठी अस्मिता की जीत हो, लेकिन यह उनकी राजनीतिक पुनर्जीवन की आखिरी कोशिश भी हो सकती है। मराठी पहचान को लेकर सियासत भले तेज हो, लेकिन अगर इसमें जनता की असली समस्याओं को जगह नहीं दी गई तो यह जोड़ी सिर्फ मंच तक ही सीमित रह जाएगी। (प्रकाश कुमार पांडेय)

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Tags: #‘Marathi identity’ #Thackeray brothers#Uddhav-RajBal ThackerayMaharashtra Politics
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