तीन दिन, दो भूस्खलन और बढ़ी चिंता
उत्तराखंड के देहरादून जिले में यमुना नदी पर निर्माणाधीन लखवार बहुउद्देशीय परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। जुलाई 2026 में महज तीन दिनों के भीतर दो बड़े भूस्खलन ने बांध निर्माण की सुरक्षा व्यवस्था और हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की विशाल परियोजनाओं की व्यवहारिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राहत की बात यह रही कि दोनों घटनाओं में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन करोड़ों रुपये की निर्माण मशीनरी क्षतिग्रस्त हो गई और परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस तेज हो गई।
भारी बारिश बनी हादसों की वजह
पहला भूस्खलन 9 जुलाई को लगातार हो रही भारी बारिश के बीच हुआ। वायरल वीडियो में एक जेसीबी ऑपरेटर को पहाड़ी से तेजी से गिरते मलबे के बीच मशीन छोड़कर जान बचाते हुए देखा गया। इसके बाद 12 जुलाई की रात एक और बड़ा भूस्खलन हुआ, जिसमें भारी मात्रा में चट्टानें और मलबा बांध निर्माण स्थल के साथ-साथ दिल्ली-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर आ गिरे। इस घटना में जेसीबी, पोक्लेन, डंपर, ड्रिलिंग मशीन और अन्य भारी उपकरण क्षतिग्रस्त हो गए, जबकि राजमार्ग कई घंटों तक बंद रहा।
श्रमिकों ने लगाए गंभीर आरोप
पहली घटना के बाद श्रमिकों ने निर्माण कंपनी पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए। उनका कहना है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और जिला प्रशासन की भारी बारिश की चेतावनी के बावजूद उन्हें अस्थिर ढलानों के पास काम जारी रखने के निर्देश दिए गए। वायरल वीडियो में भी यह दावा किया गया कि पत्थर गिरने के दौरान भी मशीन ऑपरेटरों को काम रोकने के बजाय जारी रखने को कहा गया। दूसरी घटना के बाद मानवाधिकार और आरटीआई एसोसिएशन ने भी परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए भविष्य में बड़े हादसे की आशंका जताई।
कंपनी और UJVNL ने दी सफाई
एलएंडटी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मलबा हटाने का कार्य निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुसार किया जाता है। कंपनी का कहना है कि 12 जुलाई के भूस्खलन से पहले मौसम की चेतावनी को देखते हुए निर्माण कार्य रोक दिया गया था और घटना के समय कोई कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं था। वहीं उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) ने इसे मानसून के दौरान निर्माण कार्यों में होने वाली सामान्य घटना बताते हुए कहा कि केवल ठेकेदार की मशीनरी को नुकसान पहुंचा है। हालांकि दोनों संस्थाओं के अलग-अलग स्पष्टीकरणों ने सुरक्षा उपायों को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
लागत बढ़ी, समय बढ़ा और सवाल भी
204 मीटर ऊंचे लखवार बांध, 300 मेगावाट जलविद्युत स्टेशन और बैलेंसिंग बैराज वाली इस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा प्राप्त है। वर्ष 1976 में स्वीकृत परियोजना कई दशकों तक विवादों और देरी का शिकार रही। फरवरी 2023 में दोबारा निर्माण शुरू हुआ, लेकिन अब इसकी लागत लगभग 45 प्रतिशत बढ़कर 5,747 करोड़ रुपये पहुंच चुकी है और परियोजना की समयसीमा भी 2028 से बढ़ाकर 2031 कर दी गई है। लगातार हो रहे भूस्खलन अब यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या हिमालय जैसे संवेदनशील भू-भाग में इतनी बड़ी परियोजनाओं के लिए मौजूदा सुरक्षा और निर्माण मानक पर्याप्त हैं, या फिर व्यापक भू-वैज्ञानिक समीक्षा की जरूरत है।





