बस्तर में दम तोड़ता माओवाद, सुरक्षा- विकास की दोहरी मार से सिमटा उग्रवाद
दंतेवाड़ा में माओवाद खत्म होने का दावा
सड़क-पुल और ऑपरेशन से बदली तस्वीर
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में चार दशकों तक जड़ें जमाए माओवाद अब अपने अंतिम दौर में पहुंचता दिखाई दे रहा है। सुरक्षा एजेंसियों और सरकार के संयुक्त प्रयासों का असर यह है कि कभी नक्सल हिंसा का गढ़ रहे इलाके अब तेजी से मुख्यधारा की ओर बढ़ रहे हैं। दंतेवाड़ा जिले को लेकर पुलिस अधिकारियों का दावा है कि यहां अब एक भी सक्रिय माओवादी नहीं बचा है, जो इस पूरे अभियान की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
- बस्तर में माओवाद आखिरी सांसों पर
- दंतेवाड़ा से खत्म हुआ लाल आतंक
- सड़क और सुरक्षाबलों ने खेल पलटा
- बंदूक से विकास ने छीनी जमीन
- नक्सल गढ़ में अब शांति की दस्तक
बस्तर, विशेषकर दंतेवाड़ा, लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और कमजोर बुनियादी ढांचा नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने साबित होते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रणनीति बदली और सुरक्षा के साथ-साथ विकास को भी समान प्राथमिकता दी गई। इसी का परिणाम है कि आज हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों की दरभा डिविजन पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, खुफिया नेटवर्क की मजबूती और स्थानीय लोगों के सहयोग से नक्सलियों का नेटवर्क टूटता गया। बीते दो वर्षों में जिन इलाकों में कभी प्रशासन की पहुंच मुश्किल थी, वहां अब सड़कें और पुल बन चुके हैं।
सरकार ने कटेकल्याण, अरनपुर और अबूझमाड़ जैसे घोर प्रभावित इलाकों में 20 से अधिक पक्की सड़कों का निर्माण कराया है। इसके साथ ही इंद्रावती नदी पर छिंदनार और बड़ेकरका गांव के पास दो बड़े पुल बनाए गए हैं। इन परियोजनाओं ने न केवल आवागमन को आसान बनाया है, बल्कि सुरक्षा बलों को उन क्षेत्रों तक पहुंचने में सक्षम किया है जहां पहले जाना लगभग असंभव माना जाता था।
इन नई पहुंचों का सीधा असर सुरक्षा अभियानों पर पड़ा। जवान अब माओवादियों के छिपे ठिकानों तक पहुंचने लगे हैं और कई बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। थुलथुली मुठभेड़ इसका उदाहरण है, जिसमें सुरक्षा बलों ने 38 सशस्त्र माओवादियों को मार गिराया। यह मुठभेड़ इस बात का संकेत थी कि अब नक्सली बैकफुट पर हैं और उनके पास विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
आंकड़े भी इस बदलाव की कहानी बयां करते हैं। दंतेवाड़ा जिले में अब तक 1659 माओवादी आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जबकि 1720 को गिरफ्तार किया गया है। विभिन्न मुठभेड़ों में 260 माओवादी मारे गए हैं। हालांकि इस संघर्ष में देश ने भी भारी कीमत चुकाई है—335 जवान शहीद हुए हैं और 351 ग्रामीणों ने भी अपनी जान गंवाई है।
दंतेवाड़ा का जंगल कभी नक्सली हिंसा की भयावह घटनाओं का गवाह रहा है। श्यामगिरी ब्लास्ट, अरनपुर हमले और पत्रकारों पर हमले जैसी घटनाएं लंबे समय तक लोगों के मन में डर पैदा करती रहीं। 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला में हुआ हमला आज भी देश की सबसे बड़ी नक्सली घटनाओं में गिना जाता है, जब 76 जवान शहीद हो गए थे। उस दौर में दंतेवाड़ा नक्सल हिंसा का पर्याय बन चुका था।
समय के साथ रणनीति बदली और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई। नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ, कोबरा और अन्य बलों के दर्जनों कैंप स्थापित किए गए। इन कैंपों ने न केवल सुरक्षा का दायरा बढ़ाया बल्कि स्थानीय लोगों में विश्वास भी पैदा किया। अब गांवों में प्रशासन की पहुंच बढ़ी है और विकास योजनाएं जमीन पर उतर रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि माओवाद के कमजोर होने की सबसे बड़ी वजह “विश्वास और विकास” का मॉडल है। जहां पहले बंदूक की आवाज गूंजती थी, वहां अब सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की बात हो रही है। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को पुनर्वास योजनाओं का लाभ मिल रहा है, जिससे वे समाज की मुख्यधारा में लौट रहे हैं।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां अभी पूरी तरह सतर्क हैं। उनका मानना है कि माओवाद भले ही कमजोर हुआ हो, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। कुछ इलाकों में अभी भी छोटे-छोटे समूह सक्रिय हो सकते हैं, जिन्हें खत्म करने के लिए अभियान जारी रहेगा।
कुल मिलाकर, बस्तर की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जहां कभी भय और हिंसा का माहौल था, वहां अब विकास और उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। अगर यही रफ्तार बरकरार रही तो आने वाले समय में बस्तर पूरी तरह नक्सल मुक्त क्षेत्र के रूप में उभर सकता है।





