ट्रंप की वेनेजुएला कार्रवाई: चीन और रूस को खुली छूट का खतरनाक संदेश
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला में घोषित की गई “असाधारण सैन्य कार्रवाई” ने वैश्विक राजनीति में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कार्रवाई न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों की खुली अवहेलना मानी जा रही है, बल्कि इससे चीन और रूस जैसी महाशक्तियों को भी मनचाही सैन्य विस्तार की एक तरह से वैधता मिलती दिखाई दे रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की इस नीति ने उस नियम-आधारित विश्व व्यवस्था को कमजोर कर दिया है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी थी।
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ट्रंप की कार्रवाई, वैश्विक व्यवस्था कमजोर
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वेनेजुएला संकट से बढ़ी महाशक्ति राजनीति
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चीन- रूस को मिला नया बहाना
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नियम आधारित विश्व व्यवस्था खतरे
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ताकत की राजनीति का खतरनाक दौर
जब ट्रंप ने शनिवार को वेनेजुएला में सैन्य ऑपरेशन की घोषणा की, तो उसकी भाषा और अंदाज ने दुनिया को चौंका दिया। यह शब्दावली रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के समय इस्तेमाल किए गए “विशेष सैन्य अभियान” से मिलती-जुलती लगी। अमेरिका ने तेजी से कार्रवाई करते हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़कर अमेरिका ले जाने और वहां मुकदमा चलाने की योजना बनाई। यह रणनीति भी रूस की उस कोशिश से मेल खाती है, जिसमें उसने युद्ध के शुरुआती महीनों में कीव पर तेजी से बढ़त बनाकर यूक्रेन की नेतृत्व व्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की थी।
इन दोनों कार्रवाइयों में एक और समानता है—रणनीतिक संसाधनों की भूमिका। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है और ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिकी तेल कंपनियां वहां के तेल ढांचे पर नियंत्रण संभालेंगी। दूसरी ओर, पुतिन यह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि रूस, अमेरिका समेत अन्य साझेदारों के साथ मिलकर यूक्रेन के कब्जे वाले पूर्वी क्षेत्रों में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के विकास के लिए तैयार है। आलोचकों के अनुसार, यह विकास कम और शोषण ज्यादा है।
यदि इन समानताओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि अमेरिका की वेनेजुएला कार्रवाई और रूस का यूक्रेन पर हमला—दोनों ही एकतरफा आक्रामक कदम हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्धोत्तर वैश्विक मानदंडों की धज्जियां उड़ाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तक अमेरिका खुद को इन नियमों का संरक्षक बताता रहा है।
इस कार्रवाई पर रूस और चीन की प्रतिक्रियाएं भी कम दिलचस्प नहीं रहीं। रूस ने अमेरिकी हमले को “वेनेजुएला के खिलाफ सशस्त्र आक्रमण” बताया और इसकी कड़ी निंदा की। यह बयान ऐसे समय आया जब एक दिन पहले ही रूसी मिसाइल हमले में यूक्रेन के खारकीव शहर में एक महिला और तीन साल के बच्चे की मौत हो चुकी थी। वहीं चीन ने एक संप्रभु देश के खिलाफ बल प्रयोग की निंदा की, जबकि उसी सप्ताह उसने ताइवान की ओर दर्जनों रॉकेट दागे और युद्धपोतों तथा विमानों की बड़ी तैनाती की।
विडंबना यह रही कि ऑपरेशन के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा कि वे पुतिन से “खुश नहीं” हैं क्योंकि वह “बहुत ज्यादा लोगों को मार रहे हैं।” आलोचकों के अनुसार, यह बयान अमेरिकी नीति के दोहरे मापदंडों को उजागर करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वेनेजुएला में अवैध सैन्य हस्तक्षेप करके अमेरिका ने रूस, चीन और अन्य देशों को एक खाका दे दिया है—कैसे किसी देश पर हमला किया जाए, वहां की सरकार को हटाया जाए और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सही ठहराया जाए। इससे पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को खुद को संप्रभुता का रक्षक दिखाने और साथ ही आक्रामक कदम उठाने का मौका मिल गया है।
चीन पहले से ही लोकतांत्रिक रूप से शासित ताइवान को अपना प्रांत मानता है और दक्षिण चीन सागर के बड़े हिस्से पर दावा करता है, जबकि कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के दावे भी वहां हैं। यदि भविष्य में चीनी सेना ताइवान पर हमला करती है और अमेरिकी शैली की “शॉक एंड ऑ” रणनीति अपनाती है—यानी शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर मित्रवत शासन स्थापित करने की कोशिश—तो ट्रंप की नीति के बाद अमेरिका के पास नैतिक आधार बहुत कमजोर रह जाएगा। ऐसे में अमेरिका के लिए दुनिया को ताइवान के समर्थन में एकजुट करना मुश्किल होगा।
इतना ही नहीं, चीन इस मॉडल का इस्तेमाल उन अन्य देशों के खिलाफ भी कर सकता है, जहां उसे लगता है कि राजनीतिक नेतृत्व बीजिंग के हितों के खिलाफ है। इससे प्रभाव क्षेत्र यानी “स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस” की राजनीति और मजबूत होगी।
ट्रंप का नजरिया साफ तौर पर यह संकेत देता है कि वह दुनिया की बड़ी शक्तियों को अपने-अपने इलाके बांटने की छूट देने के पक्ष में हैं। इसका उदाहरण उनके बयानों और नीतियों में दिखता है। उन्होंने अमेरिका की पारंपरिक मोनरो सिद्धांत को नए रूप में “डोनरो सिद्धांत” कहा, जिसके तहत पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र माना गया। हाल ही में जारी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी पश्चिमी गोलार्ध को प्राथमिकता दी गई और इसके लिए सैन्य तैयारियों पर जोर दिया गया। यदि शी जिनपिंग ताइवान के राष्ट्रपति को चीनी हितों के लिए खतरा मान लें, तो क्या वे ट्रंप प्रशासन की इसी सुरक्षा नीति का हवाला देकर ताइवान को अपना “पिछवाड़ा” बताकर सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं कर सकते? यही सवाल आज वैश्विक मंच पर गूंज रहा है।
ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हैं और मेक्सिको व क्यूबा को खुलेआम धमकियां दी जाती हैं। उन्होंने कोलंबिया के राष्ट्रपति को “बीमार आदमी” कहा और उस पर अमेरिका में ड्रग्स भेजने के आरोप लगाए, साथ ही सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए। यूक्रेन में शांति की कोई भी तात्कालिक योजना डोनबास को रूस के प्रभाव में छोड़ने की बात करती है, जबकि चीन ताइवान जलडमरूमध्य में लगातार युद्धाभ्यास तेज कर रहा है।
नतीजतन, दुनिया तेजी से नियम-आधारित व्यवस्था से हटकर ताकत और प्रभाव क्षेत्रों की राजनीति की ओर बढ़ रही है। ट्रंप की दुनिया में कानून नहीं, बल्कि शक्ति और उसका इस्तेमाल ही अंतिम फैसला करता नजर आता है। यही वह खतरनाक विरासत है, जो भविष्य के वैश्विक संघर्षों को और भड़का सकती है।