भारत पर ट्रंप का 50 प्रतिशत टैरिफ: टैरिफ के विरोध में अमेरिकी संसद में प्रस्ताव…डेमोक्रेट सांसदों ने की ये पहल

Trump 50 percent tariff

भारत पर ट्रंप का 50 प्रतिशत टैरिफ: टैरिफ के विरोध में अमेरिकी संसद में प्रस्ताव…डेमोक्रेट सांसदों ने की ये पहल

नई दिल्ली। भारत से आयात होने वाले सामान पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ के खिलाफ अमेरिका की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में तीन डेमोक्रेट सांसदों ने एक प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत तक के टैरिफ को समाप्त करने की मांग की गई है। सांसदों का कहना है कि ये टैरिफ न केवल अवैध हैं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहे हैं।

इस प्रस्ताव को डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद डेबोरा रॉस, मार्क वीसी और भारतीय मूल के सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने शुक्रवार को सदन में पेश किया। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो 6 अगस्त 2025 को घोषित उस राष्ट्रीय आपातकाल को समाप्त कर दिया जाएगा, जिसके तहत भारत से आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाए गए थे। इसके साथ ही भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए सभी अतिरिक्त टैरिफ वापस ले लिए जाएंगे।

गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन ने भारत पर ये टैरिफ इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए थे। शुरुआत में अगस्त 2025 में 25 प्रतिशत शुल्क लगाया गया, जिसे बाद में तथाकथित “सेकेंडरी ड्यूटी” जोड़कर बढ़ा दिया गया। इसके परिणामस्वरूप कई भारतीय उत्पादों पर प्रभावी टैरिफ दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। इन टैरिफों का असर आईटी उत्पादों, औद्योगिक सामान और कुछ उपभोक्ता वस्तुओं पर विशेष रूप से देखा गया।

प्रस्ताव पेश करने वाले सांसदों का कहना है कि इन टैरिफों के कारण अमेरिकी बाजार में आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है और आम अमेरिकी उपभोक्ताओं व व्यवसायों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। उनका तर्क है कि आयात महंगा होने से अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ा। इसके अलावा, इन कदमों से भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से मजबूत होते रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी नुकसान पहुंचा है।

मार्क वीसी ने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत पर लगाए गए ये टैरिफ असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर लगाया गया एक अप्रत्यक्ष कर हैं। उनके अनुसार, इससे न तो अमेरिकी उद्योग को दीर्घकालिक लाभ हुआ और न ही रोजगार सृजन में कोई ठोस मदद मिली।

भारतीय मूल के सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने भी टैरिफ नीति की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह रणनीति पूरी तरह से प्रतिकूल साबित हुई है और इससे न तो अमेरिका के आर्थिक हित सधे हैं और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य पूरे हुए हैं। कृष्णमूर्ति ने तर्क दिया कि भारत पर शुल्क लगाने के बजाय दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाना अमेरिका के लिए अधिक फायदेमंद होता।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इन टैरिफों को समाप्त किया जाता है, तो इससे वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूती मिलेगी। खासतौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्रों में दोनों देशों के साझा हित जुड़े हुए हैं।

डेबोरा रॉस ने अपने बयान में कहा कि आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर टैरिफ लगाना कांग्रेस की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि व्यापार नीति पर अंतिम अधिकार कांग्रेस के पास होना चाहिए, न कि राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की आड़ में एकतरफा फैसले लेने से।

दरअसल, यह प्रस्ताव केवल भारत से जुड़े टैरिफ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की एक व्यापक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इसके जरिए वे व्यापार नीति पर कांग्रेस के संवैधानिक अधिकारों को फिर से स्थापित करना चाहते हैं और आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर रोक लगाना चाहते हैं।

भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यदि यह प्रस्ताव पारित होता है, तो भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिल सकती है। पिछले कुछ महीनों में ऊंचे टैरिफ के कारण भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हुई है और कई निर्यात सौदों पर असर पड़ा है। टैरिफ हटने से दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में नई ऊर्जा आने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और भारत के बीच रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और वैश्विक कूटनीति में भी दोनों देश एक-दूसरे के अहम सहयोगी हैं। ऐसे में एकतरफा टैरिफ जैसे कदम इन संबंधों में अविश्वास पैदा कर सकते हैं।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इस प्रस्ताव को कितना समर्थन मिलता है। यदि यह पारित होता है, तो यह न केवल भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत होगा, बल्कि अमेरिकी राजनीति में व्यापार नीति को लेकर एक अहम मोड़ भी साबित हो सकता है।

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