आज ही के दिन भारतीय संसद पर आतंकियों (terrorist) ने हमला (attack) किया था। 13 दिसंबर 2001 को 5 हथियारबंद आतंकियों ने संसद भवन पर बमों और गोलियों से हमला किया था। इस हमले में 14 लोग मारे गए थे, जिसमें हमले में शामिल 5 आतंकवादी भी थे। 8 सुरक्षाकर्मी और संसद भवन के एक माली भी इस हमले में शहीद हुए थे।
- 13 दिसंबर 2001 को हमला हुआ था भारतीय संसद पर
- जैश-ए-मोहम्मद के 5 आतंकियों ने किया था हमला
- विस्फोटकों और हथियारों से पूरी तरह लैस थे
- संसद पर हमले से महज तीन महीने पहले अमेरिका में ट्विन टावर्स को उड़ाया गया था
आतंकियों की कार जा भिड़ी उपराष्ट्रपति के काफिले से
उस वक्त दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर जीतराम उपराष्ट्रपति के काफिले में एस्कॉर्ट वन कार में तैनात थे। सफेद रंग की एबेस्डर कार तेजी से जीतराम की तरफ बढ़त दिखी। संकरे रास्ते पर कार की रफ्तार कम होने की बजाए बढ़ती जा रही थी। उन्हें कार ड्राइवर की हरकत थोड़ी अजीब लगी। कार में लाल बत्ती लगी थी, गृहमंत्रालय का स्टीकर लगा था, फिर भी वह बचकर भाग रही थी.
सुरक्षाकर्मियों ने घंटे भर की मुठभेड़ के बाद आतंकी मारे
इसी बीच संसद की पहली मंजिल पर मौजूद एक पुलिस अफसर ने अपने लोगों को निर्देश दिया कि एक भी आंतकवादी सदन के भीतर न पहुंचने पाए। सारे सुरक्षाकर्मी नेताओं और पत्रकारों को धकेल कर सदन के भीतर ले जाने लगे। हलचल के बीच चार आतंकी गेट नंबर 5 की तरफ भागे, जिनमें से एक गेट नंबर 5 तक पहुंचा। इनमें से 3 को गेट नंबर 9 के पास ही मार गिराया गया। इकलौते पहुंचे आतंकी को गेट नंबर पांच पर तैनात कॉन्सटेबल संभीर सिंह ने गोली मारी।
इसी बीच एक बचा हुआ आतंकी गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ गया. ये लगातार फायरिंग करता जा रहा था. गेट नंबर 1 से ही तमाम मंत्री, सांसद और पत्रकार संसद भवन के भीतर जाते हैं. फायरिंग की आवाज सुनकर गेट को तुरंत बंद कर दिया गया. आतंकी के गेट नंबर एक पास आकर रुकते ही उसे एक गोली पीठ में लगी. एक गोली आतंकी के बेल्ट से टकराई. इसी बेल्ट के सहारे उसने अपनी कमर में विस्फोटक बांध रखे थे. पलक झपकते ही धमाका हुआ और वो वहीं ढेर हो गया.
इस पूरे हमले में 5 पुलिसवाले, एक संसद का सुरक्षागार्ड और एक माली की मौत हो गई।
हमले के बाद जो हुआ
इस मामले में चार चरमपंथियों को गिरफ़्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गिलानी और अफसान को बरी कर दिया, लेकिन अफजल गुरु की मौत की सजा बरकरार रखी थी। कोर्ट ने शौकत हुसैन की मौत की सजा को घटाकर 10 साल की सजा कर दिया था। अफजल के हमदर्दों ने करीबन 12 साल तक उसका मुकदमा लड़ा और आखिरकार 2013 में उसे फांसी हुई।
पाकिस्तान में इन आतंकवादियों को कोई सजा नहीं मिली। वहां आज भी कई आतंकी संगठन सक्रिय हैं।