भारत के ये ​तीन कदम कर सकते हैं बांग्लादेश को बर्बाद…जानें क्या है फरक्का जल समझौता और तीन बीघा गलियारा

These three steps of India can destroy Bangladesh

भारत के ये ​तीन कदम कर सकते हैं बांग्लादेश को बर्बाद…जानें क्या है फरक्का जल समझौता और तीन बीघा गलियारा

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते लंबे समय तक व्यापार, सहयोग और साझेदारी के प्रतीक माने जाते रहे हैं। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता ने इन संबंधों को मजबूती दी। लेकिन वर्ष 2024 के मध्य से और विशेष रूप से 2025 की शुरुआत के बाद, दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संकेत साफ़ दिखाई देने लगे हैं। इसके पीछे सबसे बड़े कारणों में फरक्का जल बंटवारा संधि और तीन बीघा गलियारे से जुड़ा रणनीतिक महत्व प्रमुख रूप से सामने आ रहा है।

फरक्का जल संधि: 2026 में समाप्ति और बढ़ती अनिश्चितता

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर फरक्का जल संधि एक अहम समझौता रही है। इस संधि का पहला रूप 7 नवंबर 1977 को ढाका में अस्तित्व में आया था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और बांग्लादेश के राष्ट्रपति जियाउर रहमान थे। इसके बाद 12 दिसंबर 1996 को एक नया समझौता हुआ, जिस पर भारत के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए।

वर्तमान समझौते की मियाद 2026 में समाप्त हो रही है और इसमें स्वतः नवीनीकरण का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में नई बातचीत अनिवार्य हो गई है। फरक्का बैराज से निकलने वाला पानी दो दिशाओं में जाता है—एक धारा गंगा के रूप में बांग्लादेश पहुंचती है और दूसरी भारत की जरूरतों को पूरा करती है। समझौते के अनुसार यदि पानी 75,000 क्यूसेक से अधिक हो, तो भारत 45,000 क्यूसेक रखता है और शेष बांग्लादेश को देता है। यदि पानी 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच हो, तो भारत 35,000 क्यूसेक रखता है। यदि पानी 70,000 क्यूसेक से कम हो, तब भी भारत न्यूनतम लगभग 30,000 क्यूसेक अपने उपयोग के लिए सुरक्षित रखता है। भारत की न्यूनतम आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही फरक्का बैराज का निर्माण किया गया था।

फरक्का पानी पर निर्भर बांग्लादेश की खेती

विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश की लगभग 30 प्रतिशत कृषि फरक्का से मिलने वाले पानी पर निर्भर है। यदि इस संधि का नवीनीकरण नहीं होता या शर्तें बदलती हैं, तो बांग्लादेश के बड़े हिस्से में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इससे न केवल कृषि प्रभावित होगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर भी गंभीर असर पड़ेगा।
दरअसल शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में अस्थिरता देखी गई। जिसका असर भारत के साथ रिश्तों पर भी पड़ा। इसी कारण ढाका में यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं भारत इस संधि को अपने रणनीतिक हितों के तहत कड़े रुख के साथ पुनर्परिभाषित न कर दे।

मोदी सरकार और संभावित कड़ा रुख

नए साल 2026 के संदर्भ में स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्थिर और मजबूत सरकार है। दूसरी ओर, बांग्लादेश लगभग 17 महीनों की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद एक नई लोकतांत्रिक सरकार की ओर बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में भारत ने यह संकेत दिया है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। पाकिस्तान के संदर्भ में सिंधु जल संधि को लेकर उठाए गए कड़े कदम इसका उदाहरण हैं। ऐसे में यदि बांग्लादेश भारत विरोधी गतिविधियों या बाहरी दबावों के प्रभाव में आता है, तो नई दिल्ली की प्रतिक्रिया कठोर हो सकती है।

तीन बीघा गलियारा: बांग्लादेश की “नब्ज”

तीन बीघा गलियारा बांग्लादेश के लिए रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। यह पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में स्थित है और बांग्लादेश के दहाग्राम–अंगारपोटा एन्क्लेव को उसके मुख्य भूभाग से जोड़ता है। 1974 के भूमि सीमा समझौते (LBA) के तहत भारत ने लगभग 178 मीटर × 85 मीटर क्षेत्र को स्थायी पट्टे पर देकर इस गलियारे के उपयोग की अनुमति दी थी। इसके ज़रिए बांग्लादेशी नागरिक बिना वीज़ा या पासपोर्ट के भारतीय भूमि से होकर गुजरते हैं। इस एन्क्लेव में लगभग 21,000 परिवार रहते हैं और इसका क्षेत्रफल व जनसंख्या दोनों ही बड़े पैमाने पर हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत पर इस क्षेत्र को स्थायी रूप से देने की कोई बाध्यता नहीं है। यह पूरी तरह भारत की नीतिगत उदारता पर आधारित व्यवस्था है।

रणनीतिक दबाव का माध्यम

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फरक्का जल संधि और तीन बीघा गलियारा, दोनों ही ऐसे मुद्दे हैं जिनके ज़रिए भारत के पास बांग्लादेश पर कूटनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने की क्षमता है। हालांकि भारत आधिकारिक तौर पर हमेशा शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक समाधान की बात करता रहा है, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में इन मुद्दों का महत्व और बढ़ गया है। भारत और बांग्लादेश के संबंध इस समय एक नाज़ुक मोड़ पर खड़े हैं। फरक्का जल संधि का नवीनीकरण और तीन बीघा गलियारे का भविष्य आने वाले वर्षों में दोनों देशों की दिशा तय करेगा। यदि संवाद और आपसी विश्वास बना रहता है, तो समाधान संभव है। लेकिन टकराव की स्थिति में ये दोनों मुद्दे क्षेत्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं।

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