ईरान-भारत रिश्तों का सच: इतिहास की उन घटनाओं पर एक नजर, जो बताती हैं कि संबंध हमेशा सहज नहीं रहे
भारत और ईरान को अक्सर प्राचीन सभ्यताओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और ऊर्जा सहयोग के आधार पर मित्र देशों के रूप में पेश किया जाता है। सदियों से दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति और भाषा के स्तर पर गहरे संबंध रहे हैं। लेकिन आधुनिक इतिहास की कई घटनाएँ ऐसी भी रही हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के रिश्ते हमेशा एक जैसे मजबूत और भरोसेमंद नहीं रहे। कई मौकों पर ईरान के फैसलों से भारत को कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में देशों के रिश्ते स्थायी मित्रता या दुश्मनी से नहीं, बल्कि हितों से तय होते हैं। भारत-ईरान संबंधों के इतिहास को देखें तो इसमें सहयोग के साथ-साथ कई ऐसे अध्याय भी हैं, जिनमें दोनों देशों के बीच मतभेद और तनाव सामने आए।
कुड्रेमुख आयरन ओर प्रोजेक्ट का विवाद
1970 के दशक में भारत और ईरान के बीच एक बड़ा औद्योगिक समझौता हुआ था। 1975 में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के शासनकाल में ईरान ने भारत के कुड्रेमुख आयरन ओर प्रोजेक्ट (KIOCL) से 20 वर्षों तक लगभग 150 मिलियन टन आयरन ओर खरीदने और इस परियोजना को वित्तीय सहायता देने का समझौता किया था। यह परियोजना मुख्य रूप से ईरान की इस्पात मिलों के लिए तैयार की जा रही थी। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन हो गया और नई इस्लामी सरकार ने इस परियोजना के लिए दी जा रही फंडिंग रोक दी। 1980 में जब उत्पादन शुरू हुआ तो खरीदार और निवेशक के रूप में ईरान की वापसी नहीं हुई, जिससे भारत की इस परियोजना को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना को अक्सर भारत-ईरान आर्थिक संबंधों में एक बड़े झटके के रूप में देखा जाता है।
1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में पाकिस्तान को समर्थन
भारत-ईरान संबंधों के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान से जुड़ा है। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान ईरान के शाह ने पाकिस्तान को सैन्य सामग्री, हथियार और गोला-बारूद की मदद दी थी। उस समय पाकिस्तान पश्चिमी ब्लॉक का करीबी सहयोगी था और ईरान भी अमेरिका समर्थक रणनीतिक ढांचे का हिस्सा था। 1971 के भारत-पाक युद्ध, जो बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के रूप में जाना जाता है, उस समय भी ईरान ने पाकिस्तान का समर्थन किया। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान को सैन्य सहायता और हथियार उपलब्ध कराए गए। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को समर्थन देने वाले देशों में ईरान शुरुआती देशों में शामिल था।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बयान
1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारत के कई मुस्लिम देशों के साथ संबंधों में तनाव आया था। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने इस घटना की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मुस्लिम दुनिया के लिए अपमान बताया था। ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व ने भारत से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी की थी। इन बयानों के कारण उस समय दोनों देशों के रिश्तों में असहजता पैदा हुई और भारत ने इसे अपने आंतरिक मामलों में टिप्पणी के रूप में देखा।
कश्मीर मुद्दे पर ईरान की टिप्पणियाँ
कश्मीर को लेकर भी समय-समय पर ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने बयान दिए हैं। 2010 में हज संदेश के दौरान अयातुल्ला खामेनेई ने दुनिया के मुसलमानों से कश्मीर के मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की थी। उन्होंने कश्मीर को फिलिस्तीन और अफगानिस्तान के संघर्षों के समान बताया। 2019 में जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला किया, तब भी ईरान की ओर से कुछ आलोचनात्मक बयान आए। ईरानी नेताओं ने कश्मीर के लोगों के अधिकारों और न्यायपूर्ण नीति की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने ऐसे बयानों को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखा।
कुलभूषण जाधव मामला
2016 में भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी का मामला भी भारत-ईरान संबंधों में चर्चा का विषय बना। पाकिस्तान ने दावा किया कि जाधव को बलूचिस्तान से गिरफ्तार किया गया, जबकि भारत का कहना था कि उन्हें ईरान से अगवा कर पाकिस्तान ले जाया गया। जाधव पर पाकिस्तान ने जासूसी के आरोप लगाए और उन्हें मौत की सजा सुनाई। हालांकि ईरान ने इस मामले की जांच की बात कही, लेकिन भारत में कई विश्लेषकों ने सवाल उठाए कि अगर अपहरण ईरानी क्षेत्र से हुआ था तो सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल क्यों नहीं उठे।
CAA और दिल्ली हिंसा पर बयान
2019-2020 के दौरान भारत में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। उस समय ईरान के कुछ नेताओं और संसद के सदस्यों ने इस कानून की आलोचना की थी और दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर भारत सरकार से शांति सुनिश्चित करने की अपील की थी। भारत ने ऐसे बयानों को सावधानी से लिया और यह संकेत दिया कि किसी भी देश को भारत के आंतरिक मुद्दों पर सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए।
जटिल लेकिन महत्वपूर्ण संबंध
इन घटनाओं के बावजूद यह भी सच है कि भारत और ईरान के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग भी लंबे समय से जारी रहा है। चाबहार पोर्ट परियोजना, तेल व्यापार और मध्य एशिया तक पहुंच जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इतिहास के मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग जारी रहता है। भारत भी पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति में संतुलन की नीति अपनाता रहा है, जहां वह अमेरिका, इजरायल, अरब देशों और ईरान – सभी के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
इसलिए भारत-ईरान संबंधों को समझने के लिए केवल दोस्ती या दुश्मनी के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है। यह रिश्ता कई उतार-चढ़ाव, कूटनीतिक दबावों और रणनीतिक जरूरतों के बीच विकसित हुआ है, और भविष्य में भी यही जटिलता बनी रहने की संभावना है।