क्या है सारनाथ के चार शेरों की कहानी ?
देश की नई संसद भवन की नई इमारत इन दिनों सुर्खियों में है। दरअसल यहां स्थापित राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। पूरा विवाद और बयानबाजी अशोक स्तंभ में बने चारों शेरों की भाव-भंगिमा को लेकर उठ रहा है।दरअसल विपक्ष का आरोप है कि मूल अशोक की लाट में चित्रित शेर सौम्य ही नहीं राजसी शान वाले दिखाई देते हैं, जबकि नई संसद में
के अशोक स्तंभ के शेरों का उग्र और बेडौल चित्रण किया गया है। सियासी बयानबाजी के बीच इतिहासकार एस इरफान हबीब ने भी अपनी आपत्ति जताई है। उनका सवाल है कि इस प्रतीक में शेर अति क्रूर और बेचैनी से भरे क्यों दिखाई दे रहे हैं। हालांकि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है शांति और आक्रोश देखने वालों की आंखों में होता है। उनके मुताबिक शेरों की तस्वीर का एंगल ऐसा है जिससे अंतर मालूम हो रहा है। इस पूरी बयानबाजी और आरोपप्रत्यारोप के बीच हम बताते आपको वो सच्चाई जो सारनाथ के अशोक स्तंभ से जुड़ी है। दरअसल देश का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का शीर्ष भाग है। जबकि मूल स्तंभ के उपर चार शेर एक-दूसरे से पीठ सटाए खड़े दिखाई देते हैं। जिसे सिंहचतुर्मुख कहा जाता है। जिसके आधार के बीच में अशोक चक्र स्थित है। यह अशोक चक्र हमारे राष्ट्रीय ध्वज के बीच बना हुआ है।
सारनाथ का सिंहचतुर्मुख
सम्राट अशोक ने 250 ईसा पूर्व अपने साम्राज्य में सांची सहित कई स्थानों पर सिंहचतुर्मुख को स्तंभ के उपरी भाग पर स्थापित किया था। जिनमें से कई नष्ट हो गए। अब महज सात स्तंभ ही सुरक्षित बचे हैं। सारनाथ में स्थित सिंहचतुर्मुख करीब सवा दो मीटर का है। जो वहां म्यूजियम की शान बना हुआ है। जबकि सिंहचतुर्मुख का अशोक स्तंभ आज भी अपने मूल स्थान पर ही स्थापित है। चीनी यात्रियों के विवरणों में इन स्तंभों का उल्लेख मिलता है। जिसमें सारनाथ के स्तंभ का भी ब्योरा था लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत तक इसकी खोज
नहीं हो सकी। दरअसल सारनाथ में पुरातत्वविदों को इसका कोई संकेत नहीं मिला। जिससे वो ये जान सकें कि जमीन के नीचे ऐसा कुछ दबा हो सकता है।
ब्रिटिश राज में सिविल इंजिनियर की स्तंभ की खोज
जर्मनी में पैदा हुए फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल ने भारत तत्कालीन नियमों के मुताबिक ब्रिटिश नागरिकता ली। और रेलवे में सिविल इंजिनियरिंग के बाद फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल का लोक निर्माण विभाग में तबादला कर दिया गया। यह वहीं फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल हैं जिन्होंने 1903 में बनारस में पदस्थ होने पर खुदाई का काम शुरु किया था। सारनाथ और वाराणसी अधिक दूर नहीं थे, उन्हें सारनाथ में खुदाई की अनुमति दे दी गई। तब खुदाई के दौरान मुख्य स्तूप के पास गुप्त काल के मंदिर के अवशेष मिले थे। जिसके नीचे अशोक काल का एक ढांचा बना था। उसे पश्चिम की तरफ स्तंभ का सबसे निचला हिस्सा खुदाई में मिला। जबकि स्तंभ के शेष भाग आसपास बिखरे पड़े मिले।
इसी तरह सांची जैसे शीर्ष की तलाश शुरू हुई। स्तंभ का शीर्ष भाग फ्रेडरिक को 1905 में मिला। मशहूर इतिहासकार चाल्र्स रॉबिन एलेन जिन्होंने ब्रिटिश राज पर किताबें लिखी थीं। उन्होंने लिखा कि विशेषज्ञों को ये आभास हुआ कि कभी स्तंभ को जानबूझकर ध्वस्त किया गया था।सारनाथ ही रख लिया अपने घर का नाम ‘सारनाथ’ रखा खुदाई के दौरान जहां स्तंभ मिला था। वहां म्यूजियम बनाया गया। इस तरह भारत का पहला आन साइट म्यूजियम सारनाथ म्यूजियम को कहा जा सकता है। 15 साल तक फ्रेडरिक ने बनारस, लखनऊ, कानपुर, असम में कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया। 1921 में फ्रेडरिक वापस यूनाइटेड किंगडम चले गये। इस दौरान 1928 तक फ्रेडरिक लंदन के टेडिंगटन के घर में रहे उसे वे सारनाथ कहते थे।इतना ही नहीं वे यहां कई ऐतिहासिक कलाकृतियां और मूर्तियां अपने साथ लंदन ले गए थे।
राष्ट्रीय प्रतीक कैसे बना सिंहचतुर्मुख
यह एक महत्वपूर्ण आर्कियोलॉजी घटना थी जिसमें भारत के सारनाथ में अशोक स्तंभ की खोज की गई। आजादी के बाद इस स्तंभ को ही राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में स्वीकार किया गया। 30 दिसंबर 1947 को सारनाथ के अशोक स्तंभ पर स्थित सिंहचतुर्मुख की अनुकृति को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता दी गई। वहीं संविधान की हस्तलिखित प्रति को सजाने का काम भारतीय कला के पुरोधा नंदलाल बोस को सौंपा गया। जिनकी टीम में शामिल युवा दीनानाथ भार्गव ने संविधान के पन्नों में चित्रित करने के लिए सिंहचतुर्मुख की अनुकृति बनाई। जिसे 26 जनवरी, 1950 को सत्यमेय जयते के ऊपर अशोक के सिंहचतुर्मुख को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता मिली।