‘पावर टू एम्पावर’ का मंत्र, दुनिया की नई अर्थव्यवस्था में भारत की दावेदारी…2026 ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में पीएम मोदी ने कही ये बड़ी बात

mantra of Power to Empower India

‘पावर टू एम्पावर’ का मंत्र, दुनिया की नई अर्थव्यवस्था में भारत की दावेदारी

मुख्य सवाल: क्या तकनीक, डिजिटल ढांचे और नवाचार के दम पर भारत वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दे सकता है?

दुनिया जब आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं में बाधाओं और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2026 ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में भारत के विकास का एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनके संबोधन का केंद्रीय विचार था, ‘पावर टू एम्पावर’। यानी शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल संसाधनों, तकनीक और ज्ञान पर नियंत्रण हासिल करना नहीं, बल्कि उनके जरिए अधिक से अधिक लोगों को सक्षम बनाना है।

प्रधानमंत्री के संदेश में तीन प्रमुख आयाम दिखाई देते हैं। पहला, डिजिटल तकनीक के माध्यम से आम नागरिकों को अवसर देना। दूसरा, नवाचार और उद्यमिता को बड़े शहरों से निकालकर छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंचाना। तीसरा, वैश्विक संकटों के बीच भारत को भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में प्रस्तुत करना।

यह दृष्टिकोण भारत की बढ़ती आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ इस सवाल को भी सामने रखता है कि विकास की शक्ति समाज के कितने बड़े हिस्से तक पहुंच रही है।

1. तकनीक की ताकत, लेकिन फायदा किसे?

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में एक अहम सवाल उठाया कि क्या तकनीक केवल कुछ लोगों को आगे बढ़ाएगी या करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर पैदा करेगी? यही सवाल आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था के केंद्र में है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा और डिजिटल सेवाएं अब आर्थिक प्रतिस्पर्धा के प्रमुख आधार बन रहे हैं। जिन देशों के पास तकनीक विकसित करने, उसका उपयोग करने और डिजिटल संसाधनों को सुरक्षित रखने की क्षमता होगी, वे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं।

भारत के सामने अवसर यह है कि वह डिजिटल सेवाओं को केवल बड़े उद्योगों तक सीमित न रखे, बल्कि किसानों, छोटे कारोबारियों, विद्यार्थियों, महिलाओं और ग्रामीण आबादी तक पहुंचाए। प्रधानमंत्री का ‘पावर टू एम्पावर’ का विचार इसी दिशा की ओर संकेत करता है।

हालांकि, तकनीक की उपलब्धता अपने आप में समान अवसर की गारंटी नहीं है। डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट की पहुंच, आंकड़ों की सुरक्षा और रोजगार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव जैसे सवालों का समाधान भी जरूरी होगा।

2. डिजिटल इंडिया से वैश्विक साझेदारी तक

प्रधानमंत्री ने भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे और कोविड-19 के दौरान विकसित CoWIN मंच का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत अपने अनुभव दूसरे देशों के साथ साझा कर रहा है।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का महत्व इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि इसके माध्यम से पहचान, भुगतान और सार्वजनिक सेवाओं को अधिक व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जा सकता है। भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का विस्तार इस मॉडल की उपयोगिता को सामने लाता है।

भारत की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह डिजिटल तकनीक को केवल घरेलू विकास का माध्यम नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग का साधन भी बनाना चाहता है। विकासशील देशों के लिए यह अनुभव उपयोगी हो सकता है, बशर्ते डिजिटल व्यवस्था स्थानीय जरूरतों, निजता और सुरक्षा के अनुरूप विकसित की जाए।

3. स्टार्टअप क्रांति और छोटे छोटे शहरों की बढ़ती बदलती भूमिका

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में दावा किया कि 2014 से पहले भारत में कुछ सौ स्टार्टअप थे, जबकि अब उनकी संख्या 2.5 लाख से अधिक हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि लगभग आधे स्टार्टअप छोटे शहरों और कस्बों से आते हैं तथा 45 प्रतिशत स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक या साझेदार है।

इन आंकड़ों के जरिए प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि भारत में उद्यमिता के अवसरों का दायरा बढ़ रहा है। स्टार्टअप संस्कृति का विस्तार युवाओं को नौकरी तलाशने के साथ-साथ रोजगार पैदा करने की दिशा में भी प्रेरित कर सकता है।

लेकिन स्टार्टअप की संख्या के साथ उनकी गुणवत्ता, कारोबार की निरंतरता, निवेश तक पहुंच और रोजगार सृजन को भी देखना होगा। किसी उद्यम की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह कितने समय तक टिकता है, कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा करता है और बाजार में किस तरह की उपयोगिता स्थापित करता है।

महिला उद्यमियों और छोटे शहरों के संस्थापकों की भागीदारी बढ़ना भी तभी व्यापक बदलाव में बदलेगा, जब उन्हें वित्त, प्रशिक्षण, बाजार और तकनीकी संसाधनों तक समान अवसर मिलें।

4. वैश्विक संकट और भारत की भरोसेमंद साझेदार बनने की चुनौती

प्रधानमंत्री मोदी ने महामारी, युद्ध, ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं, महत्वपूर्ण खनिजों की प्रतिस्पर्धा और व्यापारिक तनावों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि वैश्वीकरण से दुनिया को जोड़ने वाली व्यवस्थाएं अब कई परिस्थितियों में दबाव और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन रही हैं।

यह टिप्पणी वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए बदलावों की ओर संकेत करती है। पहले अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लागत और दक्षता को प्रमुखता दी जाती थी, लेकिन अब देश आपूर्ति की सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और भरोसेमंद साझेदारों को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।

भारत के लिए यह परिस्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आती है। विशाल घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, डिजिटल क्षमता और विनिर्माण विस्तार की संभावनाएं भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर देती हैं।

लेकिन इस अवसर को हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे, कौशल विकास, ऊर्जा सुरक्षा, अनुसंधान और नीतिगत स्थिरता में निरंतर सुधार करना होगा। वैश्विक साझेदारों का भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समय पर आपूर्ति, अनुबंधों के पालन और संकट के समय सहयोग से बनता है।

5. भारत की नई आर्थिक सोच की असली परीक्षा

प्रधानमंत्री के संबोधन का व्यापक संदेश यह है कि आने वाले समय में किसी देश की शक्ति केवल उसकी आर्थिक संपदा या तकनीकी क्षमता से नहीं मापी जाएगी। यह भी देखा जाएगा कि वह अपनी क्षमता से कितने लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देता है और वैश्विक संकटों के बीच कितनी विश्वसनीय भूमिका निभाता है।

भारत के सामने डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार करने, स्टार्टअप को मजबूत बनाने, नवाचार को प्रोत्साहित करने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की संभावनाएं हैं।

‘पावर टू एम्पावर’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि विकास को देखने का एक दृष्टिकोण है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि तकनीक कितने लोगों के जीवन को बेहतर बनाती है, नवाचार कितने टिकाऊ रोजगार पैदा करता है और भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपने साझेदारों का कितना भरोसा जीत पाता है। प्रधानमंत्री का संदेश भारत की महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है। अब इस महत्वाकांक्षा को ठोस आर्थिक परिणामों में बदलना सबसे महत्वपूर्ण होगा।

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