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बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव का काउंट डाउन शुरु…पीएम मोदी के विदेश से लौटते ही हो सकता है नये नाम का ऐलान..सुर्खियों में हैं कई नाम…जानें कौन से हैं वो नाम और क्यों हो रही है चर्चा

DigitalDesk by DigitalDesk
July 3, 2025
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Countdown for the election of national president in BJP has begun
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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए काउंट डाउन शुरू हो चुका है। प्रधानमंत्री जब 8 दिन के विदेश दौरे पर हैं। जब वो वापस लौटेंगे तो 9 से 15 जुलाई के बीच इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि भारतीय जनता पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर दे। बीजेपी की 37 राज्य इकाइयां हैं। उनमें से 22 में अध्यक्ष बना लिए गए हैं। तो जो आधे जगहों पर अध्यक्ष बनाने का कोरम है वो पूरा हो जाता है। वह इसलिए पूरा हो जाता है क्योंकि 19 राज्यों में अध्यक्ष और संगठन चुनाव की जरूरत हुई जो बीजेपी ने पूरा कर लिया है। अब बाकी प्रदेशों में क्या होगा देखना महत्वपूर्ण होगा। हो सकता है कि कुछ प्रदेशों में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद बीजेपी के राज्य के अध्यक्ष का चुनाव हो। ऐसी संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

संघ की पसंद का ही होगा नया अध्यक्ष…क्योंकि…!

लेकिन चर्चा यह भी है कि आखिरकार बीजेपी को अपना अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया  में इतनी देर क्यों लग रही है। इस प्रक्रिया में इतनी देर इसलिए लगी क्योंकि लोकसभा चुनाव 2024  में  BJP  240 सीटों पर सिमट गई। संघ को ऐसा लगा कि कहीं ना कहीं पार्टी की तरफ से कोई कमजोरी हुई है। संघ इस बात की शिकायत लगातार कर रहा था कि बीजेपी मनमाने ढंग से काम कर रही है। आपको याद होगा चुनाव के दौरान एक अखबार को दिया हुआ जेपी नड्डा का एक इंटरव्यू भी सामने आया था जिसमें जेपी नड्डा ने साफ-साफ कहा था कि संघ की अब हमें जरूरत नहीं है। कमोबेश यही बात उन्होंने कही थी। संघ इस बात से भी नाराज था और संघ इस बात से भी नाराज था कि जितना समावेश संघ की योजनाओं का किया जाना चाहिए या संघ के विचारों के आदान-प्रदान से जिस तरह के फैसले लिए जाने चाहिए वैसे फैसले नहीं लिए जा रहे थे और इसी के चलते देखिए पिछली बार तो क्या था। पिछली बार 303 सीटें आई थी।

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संघ को पता है कि बीजेपी इस वक्त कमजोर विकेट पर है। इसीलिए वो नया अध्यक्ष ऐसा चाहता है जो उनके साथ सामंजस्य के हिसाब से काम कर सके। उन्हीं के कैडर से निकला हुआ हो। उन्हीं की विचारधारा से प्रभावित हो। अब बीजेपी में ज्यादातर लोग तो ऐसे ही होंगे। लेकिन क्या इस वक्त जो संघ की लीडरशिप है। उसके साथ वो तारतम्य करके चल पाएंगे संघ के अंदर आज की तारीख में सारे फैसले दत्तात्रेय होसबोले लेते हैं। मोहन भागवत हैं सर संघ चालक हैं। उनका मार्गदर्शन होता है। लेकिन वर्किंग जो डे टू डे वर्किंग है उसमें सारे फैसले दत्तात्रय होश बोले लेते हैं। इसके अलावा अरुण कुमार संघ की तरफ से भारतीय जनता पार्टी के अंदर पॉइंट पर्सन है। ऐसा लगता है कि इस बार चलेगी दत्तात्रेय होले की ज्यादा। हालांकि संघ अपनी तरफ से नाम नहीं देता है। संघ अपनी तरफ से सिर्फ यह कहता है कि आप इन्हीं नामों के ऊपर आप एक पैनल दे दीजिए और पैनल के ऊपर संघ अपनी राय या अपना मशवरा दे देता है। क्या संघ ये कहेगा कि इसको बनाया जाए? नहीं। संघ ऐसा नहीं कहता है लेकिन संघ अपनी पसंद, नापसंद, नाराजगी या खुशी इन सबको एक सेटल वे में भारतीय  जनता पार्टी के सामने जाहिर कर देता है। तो कारण क्या है? कारण यह है कि भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई है। कारण यह है कि भारतीय जनता पार्टी और संघ का तालमेल इन चुनाव में उतना बेहतर नहीं था। जितना होना चाहिए था। उत्तर प्रदेश में जिन सीटों का नुकसान हुआ, उसके अंदर संघ और बीजेपी के तालमेल की कमी की बात सामने आई। इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के एक धड़े को लगता है कि पार्टी पूरी तरह से हाईजैक हो चुकी है।
दरअसल 240 सीटों के बाद भारतीय जनता पार्टी को एहसास हो गया है कि अपनी मातृ संस्था को इस तरीके से छोड़ने के बाद काम चलाना काफी मुश्किल है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी लगातार एक साल से इस बात को टाल रही है कि नए नया भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन हो?। भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष वो होना चाहिए जो संघ के हिसाब से संघ के विचारों के साथ और संघ की मर्यादा में रहकर काम कर पाए और इसीलिए ऐसी खोज हो रही है। अब कोई बहुत ज्यादा हाईकमान के नजदीक है। उसको भी संघ नहीं चाहता है। कोई बहुत ज्यादा एब्स्ट्रैक्ट है। उसको भी संघ नहीं चाहता है। संघ जिसको चाहता है जैसे मनोहर लाल खट्टर वो खुद एक प्रचारक रहे हैं। लंबे समय तक जो है उन्होंने संघ के लिए काम किया है। उनके नाम पर आम सहमति बन सकती है। लेकिन उनका एज फैक्टर उस तरीके का नहीं है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चर्चा कई नाम…पॉजिटिव और नेगेटिव क्या हैं आइये जानते हैं।

चर्चा में भूपेंद्र यादव का भी नाम

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम पर जिन नामों पर विचार हुआ उसमें एक नाम बहुत महत्वपूर्ण है वो है भूपेंद्र यादव का। भूपेंद्र यादव एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने संगठन और सरकार दोनों के अंदर काम किया है। मजबूत संगठनकर्ता के तौर पर भूपेंद्र यादव जाने जाते हैं और साथ ही साथ भूपेंद्र यादव जो हैं वो कई राज्यों के प्रभारी रह चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी को कई चुनावी राज्यों में जिताने का श्रेय भूपेंद्र यादव और उनकी रणनीति को जाता है। हाल ही में मध्य प्रदेश का चुनाव जीत लीजिए। भूपेंद्र यादव मध्य प्रदेश के प्रभारी थे। इससे पहले वह महाराष्ट्र के प्रभारी थे। कई राज्यों के प्रभारी रह चुके हैं। वह बिहार के प्रभारी भी रह चुके हैं।

भूपेन्द्र यादव का पॉजिटिव

संगठनात्मक अनुभव बहुत मजबूत है। आरएसएस और बीजेपी दोनों में अधिवक्ता परिषद से आते हैं। अमित शाह के करीबी हैं और राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ है। यादव
समाज से भी आते हैं। ओबीसी फैक्टर भी यहां पर आता है।

नेगेटिव पॉइंट्स क्या है?

संगठनात्मक और राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार उनका सीमित है। मास लीडर नहीं है। मास लीडर नहीं है। जो भूपेंद्र यादव हैं। पहली बार चुनाव लड़ा है। पहली बार चुनाव लड़कर जीते हैं। राजस्थान से और एक्सपर्ट राय यह है कि संगठन चलाने में वो दबाव में आ सकते हैं। यानी जिस दबाव से निकालने की बात आरएसएस कर रही है। उस दबाव में भूपेंद्र यादव आ सकते हैं। तो उनका नंबर थोड़ा पीछे हो जाता है।

विनोद तावड़े

विनोद तावड़े भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। विनोद तावड़े महाराष्ट्र से आते हैं। विनोद तावड़े जो है वो जो है राष्ट्रीय महासचिव हैं और महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री भी हैं। इनके पॉजिटिव पॉइंट्स ये हैं कि इनके संगठन में मजबूत पकड़ है। खासकर युवा मोर्चा और महाराष्ट्र में लोकप्रिय हैं। अनुशासित कार्यशैली और बीजेपी की विचारधारा के प्रतिबद्ध है। इस प्रतिबद्धता को भी इस बार आकलन किया जा रहा है। इस प्रतिबद्धता को भी देखा जा रहा है। इसके अलावा उनके नेगेटिव पॉइंट्स ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनमें लोकप्रियता की कमी है और हिंदी पट्टी पर उनकी अपेक्षाकृत पकड़ जो है कमजोर है। हालांकि महाराष्ट्र से अभी तक भारतीय जनता पार्टी का कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष उस तरीके से निकल कर नहीं आया है। ज्यादातर हिंदी पट्टी से रहे हैं या साउथ से रहे हैं।

धर्मेन्द्र प्रधान

इसके अलावा जो तीसरा नाम है धर्मेन्द्र प्रधान का। धर्मेंद्र प्रधान धर्मेंद्र प्रधान सहज है। सुलभ है, मिलनसार हैं। केंद्र के अंदर मंत्री हैं। भारतीय जनता पार्टी में कई पदों पर रह चुके हैं। भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं। पूर्वी भारत में पार्टी को विस्तार दिलाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के विश्वस्त हैं। युवाओं और शिक्षा मंत्रालय में उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है।

प्रधान का नेगेटिव पॉइंट

क्या बनता है? जो उनके पॉजिटिव है वही नेगेटिव में कन्वर्ट हो जाता है। वह खुद ओबीसी समाज से आते हैं। ऐसे में क्या प्रधानमंत्री जिस समाज से आते हैं। उसी समाज का राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी बनाएगी। यहां पर जो है जो एक्टिवेशंस है वो गड़बड़ा सकते हैं। राज्यों में संगठनतिक नेटवर्क पर उनकी पकड़ कितनी है? हालांकि उन्होंने कई सारे चुनाव जो है उनका संचालन किया है। कई सारे चुनाव प्रचार उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए किए हैं और कई राज्यों में जीत में जैसे बिहार में बिहार में कई राज्यों में जीत में कई बार की जो जीत हुई है उसमें धर्मेंद्र प्रधान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब उनके राज्य अह उड़ीसा के अंदर भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसके लिए उनको क्रेडिट दिया जाना चाहिए। संगठन में वह बेहद सक्रिय थे। भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं और कैडर के लोगों में उनकी ठीक-ठाक पकड़ है। लेकिन राज्यों के संगठनात्मक स्तर पर कितनी पकड़ है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। भारतीय जनता युवा मोर्चा से निकले हुए जितने नेता हैं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान की युवाओं पर बहुत अच्छी पकड़ है।

सुनील बंसल

सुनील बंसल राजस्थान से आते हैं। उत्तर प्रदेश के प्रभारी रह चुके हैं। 2017 के अंदर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का सेहरा अगर किसी के सर बांधा जाना चाहिए 2014 और 2017 में तो वो सुनील बंसल पर बांधा जाना चाहिए। इसीलिए सुनील बंसल भी इसके एक टॉप कंटेंडर हैं। इनके पॉजिटिव पॉइंट क्या है? उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में संगठन को मजबूत किया उन्होंने। आरएसएस पृष्ठभूमि अनुशासित और रणनीतिक चेहरा है।

सुनील बंसल के नेगेटिव पॉइंट

अपेक्षाकृत मीडिया और पब्लिक फेस कम है। राजनीतिक रूप से हमेशा से बहुत लो प्रोफाइल रहे हैं।

चौंका सकता है वीडी शर्मा का नाम

इसके अलावा एक नाम बेहद महत्वपूर्ण निकल कर सामने आ रहा है वो है विष्णुदत्त शर्मा का। विष्णुदत्त शर्मा मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। अभी-अभी उनका कार्यकाल खत्म हुआ है और उन्होंने इस कार्यकाल के दौरान राज्य के अंदर भारतीय जनता पार्टी को 150 से ज्यादा सीटें दिलवाई। 150 से ज्यादा सीटों के अलावा 29 की 29 सीटें लोकसभा में विष्णुदत्त शर्मा के नेतृत्व में किसने दिलाई थी? ये सीटें दिलाई थी ये सीटें दिलाई थी 29 की 29 विष्णुदत्त शर्मा और उनकी लीडरशिप ने वहां पर जो जो वहां पर मोहन यादव मुख्यमंत्री जरूर थे लेकिन संगठनिक कौशल के लिए वह जाने जाते हैं।

वीडी शर्मा के पॉजिटिव पॉइंट

वीडी शर्मा का पॉजिटिव पॉइंट यह है कि आरएसएस के पसंदीदा हैं। दत्तात्रय होजबोली के बड़े करीबी हैं। शर्मा का संघ से बहुत गहरा जुड़ाव है। उसी पृष्ठभूमि से आते हैं। एबीवीपी में सक्रिय रहे हैं। इसीलिए कैडर को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। 49 वर्षीय हैं। ऊर्जा और आक्रामक नेतृत्व उनके अंदर है। रणनीतिक उनका समझ बहुत महत्वपूर्ण है।

वीडी शर्मा का नेगेटिव पॉइंट

क्षेत्रीय संगठन में ही जनाधार है। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कभी काम नहीं किया है। जातिगत संतुलन के मामले में उनकी पहचान ने जातिगत बेंचमार्क पर समर्थन तोड़ सकते हैं कि अध्यक्ष के बाद फिर से आपने ब्राह्मण अध्यक्ष बना लिया लेकिन ओबीसी को अगर ओबीसी के सामने कोई अध्यक्ष देना है तो ब्राह्मण जाति से आने की संभावना भी खुल जाती है।

मनोहर लाल खट्टर

अगला नाम मनोहर लाल खट्टर का है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। मनोहर लाल खट्टर के बारे में सब जानते हैं कि वह आरएसएस से बैकग्राउंड से आते हैं। पहली बार उन्होंने चलाव लड़ा। सीधे मुख्यमंत्री बने। प्रधानमंत्री से उनकी दोस्ती काफी प्रचलित है।

पॉजिटिव पॉइंट क्या है?

खट्टर 1977 से आरएसएस के प्रचारक हैं और 1994 से भाजपा में सक्रिय हैं। नरेंद्र मोदी के  साथ उनका गहरा संबंध है। 1990 में उनके साथ काम किया। गुजरात चुनाव आरएसएस नेटवर्क के जरिए उनसे मिले। 2014 में हरियाणा में लगातार दो कार्यकाल इस अनुभव के आधार पर उनका राष्ट्रीय भूमिका में नाम है।

नेगेटिव पॉइंट्स उनके क्या है?

सीएम रहते विरोध और लोकप्रियता की कमी जाट समुदाय के प्रति में उनके प्रति असंतोष 2024 लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारा विवाद के चलते सीएम पद छोड़ा। जातीय राजनीति की चुनौतियां गैर जाट होने के कारण हरियाणा में उन्हें आउटसाइडर माना जाता है। राष्ट्रीय मीडिया में सीमित प्रभाव है। राष्ट्रीय मीडिया में उनका वर्चस्व सीमित दिखता है।

चर्चा में शिवराज सिंह चौहान का भी नाम

इसके अलावा अगला नाम शिवराज सिंह चौहान का। शिवराज सिंह चौहान 18 साल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। लेकिन 18 साल उनका मुख्यमंत्री रहना और उस वक्त जो है यह कंपटीशन भी चलाकर चलती थी कि नरेंद्र मोदी या शिवराज सिंह चौहान पीएम का कंटेंडर कौन? तो मेरे ख्याल से यह बातें जो है लोगों के स्मरण में कहीं ना कहीं निकल आती है। कहीं ना कहीं सामने हो जाती हैं। तो क्या शिवराज सिंह चौहान को बनाने का रिस्क या बनाने की चुनौती स्वीकार करेंगे अमित शाह और नरेंद्र मोदी। ऐसे में इसकी संभावना कम लगती है।

शिवराज का पॉजिटिव पॉइंट्स

संगठनात्मक अनुभव है। 2019-20 में बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे। कार्यकर्ताओं में मजबूत पकड़ है। राजनीतिक और संगठन बैकग्राउंड और अनुभव सं जन संवाद और प्रशासन में गहरी पकड़ है। आरएसएस से गहरा जुड़ाव है और मध्यस्थ की भूमिका उन्होंने आरएसएस और बीजेपी के बीच कई बार निभाई है। 1972 से आरएसएस में सहभागिता शुरू की थी। जिसका फायदा मिला। राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिरता 18 वर्ष तक मध्य प्रदेश के सीएम रहे। सबसे लंबा कार्यकाल और भ्रष्टाचार कांडों में न के बराबर फंसे।

नेगेटिव पॉइंट क्या है?

दृश्यता और रणनीति मीडिया और राष्ट्रीय मंचों पर अभी स्थान बनाने की जरूरत है। ज्यादातर उनका प्रभाव प्रदेश स्तर तक ही रहा। एमपी में पिछड़े वर्गों का महत्व है। लेकिन उत्तर पूर्व दक्षिण और अन्य राज्यों में जातीय समीकरणों पर भाजपा की जरूरतें अलग हो सकती हैं। सवाल जरूरतों का ही है कि भारतीय जनता पार्टी की क्या-क्या जरूरतें हैं और वह जरूरतें किस-किस तरीके से अलग हो सकती है।…(प्रकाश कुमार पांडेय)

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