नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली और आधिकारिक भाषा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ (द्वितीय श्रेणी यात्री) जैसे शब्द संविधान की समानता की भावना के अनुरूप नहीं हैं। न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने निर्देश दिया कि भविष्य में श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय कोच या डिब्बे के संदर्भ में किया जाए, ताकि किसी व्यक्ति की पहचान उसके यात्रा वर्ग के आधार पर न हो।
- यात्री नहीं, कोच की श्रेणी बताने का निर्देश
- ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ संविधान की भावना के विपरीत: सुप्रीम कोर्ट
- रेलवे में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने पर जोर
- टिकट न मिलने से यात्री को गैर-टिकटधारी नहीं मान सकते
- मृतक यात्री की पत्नी को 8 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
सुनवाई के दौरान अदालत ने रेलवे में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि रेलवे मैनुअल के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता है और स्टेशनों व ट्रेनों में स्टाफ बढ़ाने से यात्रियों की सुरक्षा बेहतर होगी तथा युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।
इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर किसी मृतक को गैर-टिकट यात्री नहीं माना जा सकता। यदि उपलब्ध साक्ष्य और परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि व्यक्ति वैध रूप से यात्रा कर रहा था, तो उसके आश्रित मुआवजे के हकदार हैं।
अदालत ने मृतक यात्री की पत्नी को ब्याज सहित 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया। इस फैसले को रेलवे में यात्रियों के सम्मान, समानता और अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक पहल माना जा रहा है।





