आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: ‘सभी आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश नहीं दिया’— तीन जजों की पीठ ने किया स्पष्ट
नई दिल्ली। देशभर में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) से जुड़ी बढ़ती घटनाओं और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई गुरुवार को एक बार फिर सुर्खियों में रही। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि उसने सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसका निर्देश केवल संवेदनशील और संस्थागत क्षेत्रों तक सीमित है, जैसे स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और खेल परिसर।
तीन जजों की पीठ कर रही है सुनवाई
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने की। सुनवाई के दौरान उन याचिकाओं पर विचार किया गया, जिनमें आवारा जानवरों से आम जनता को होने वाले खतरे और उन्हें नियंत्रित करने में नगर निकायों की कथित लापरवाही का मुद्दा उठाया गया है।
नगर निगमों की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी
बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगमों और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सख्त रुख अपनाया था। अदालत ने कहा था कि भारत में होने वाली मौतें सिर्फ कुत्तों के काटने से नहीं हो रहीं, बल्कि सड़कों पर घूम रहे आवारा जानवरों की वजह से होने वाले सड़क हादसे भी बड़ी वजह हैं।
पीठ ने टिप्पणी की थी कि कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि कोई जानवर कब आक्रामक हो जाए और कब न काटे। इसी संदर्भ में अदालत ने कहा—
“इलाज से बेहतर है रोकथाम” (Prevention is better than cure)।
नवंबर 2025 का आदेश क्या था?
गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि
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स्कूलों
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अस्पतालों
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बस स्टैंड
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रेलवे स्टेशन
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खेल परिसरों
जैसी संवेदनशील सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और उन्हें निर्धारित शेल्टर होम्स में स्थानांतरित किया जाए। इस आदेश का मकसद सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था, न कि जानवरों को नुकसान पहुंचाना।
‘हर गली से कुत्ते हटाने का आदेश नहीं’
गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके आदेश को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। पीठ ने कहा कि अदालत ने कभी भी यह नहीं कहा कि हर गली, हर सड़क या हर मोहल्ले से आवारा कुत्तों को हटाया जाए।
अदालत ने दोहराया कि उसका फोकस केवल संस्थागत और संवेदनशील क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर है, जहां बच्चों, मरीजों और आम नागरिकों को खतरा हो सकता है।
Animal Birth Control (ABC) नियमों पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पूरे मामले में सबसे अहम बात है Animal Birth Control (ABC) Rules का सख्ती से पालन। अदालत ने दोहराया कि आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान हिंसक या अव्यवस्थित तरीकों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से नसबंदी और टीकाकरण के जरिए किया जाना चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि नगर निकायों की जिम्मेदारी है कि वे ABC नियमों को सही ढंग से लागू करें, ताकि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित हो सके और लोगों की सुरक्षा भी बनी रहे।
अस्पतालों में कुत्तों पर सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम सवाल उठाया। पीठ ने कहा—
“कितने कुत्तों को अस्पताल के वार्ड में और मरीजों के आसपास घूमने की अनुमति दी जा सकती है?”
अदालत ने साफ संकेत दिया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है। अस्पतालों और स्कूलों जैसे स्थानों पर आवारा जानवरों की मौजूदगी किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
बिल्लियों और चूहों का जिक्र
सुनवाई के दौरान एक रोचक टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुत्ते और बिल्लियां प्राकृतिक रूप से एक-दूसरे के दुश्मन होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि बिल्लियों की मौजूदगी से चूहों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह टिप्पणी हल्के-फुल्के अंदाज में की गई, लेकिन इसके पीछे शहरी स्वच्छता और संतुलन का बड़ा संदर्भ छिपा हुआ है।
सुरक्षा बनाम पशु अधिकार
यह मामला एक बार फिर उस बहस को सामने लाता है, जिसमें नागरिकों की सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। पशु प्रेमी संगठनों का कहना है कि आवारा कुत्तों को हटाने के बजाय उनकी देखभाल और नसबंदी पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि आम नागरिकों और माता-पिता का कहना है कि बच्चों और बुजुर्गों की जान सबसे पहले है।
कोर्ट का संतुलित रुख
सुप्रीम कोर्ट का ताजा बयान यह दर्शाता है कि अदालत किसी एक पक्ष के साथ खड़ी नहीं है, बल्कि संतुलित और व्यावहारिक समाधान चाहती है। अदालत न तो आवारा कुत्तों के खिलाफ है और न ही नागरिकों की सुरक्षा से समझौता करने को तैयार है।
आगे क्या?
अदालत ने संकेत दिया है कि वह आने वाली सुनवाइयों में
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नगर निगमों की जवाबदेही
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ABC नियमों के पालन
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शेल्टर होम्स की स्थिति
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और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा
जैसे मुद्दों पर और सख्ती दिखा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि आवारा कुत्तों को लेकर फैल रही गलतफहमियों पर विराम लगना चाहिए। अदालत का आदेश सम्पूर्ण हटाने का नहीं, बल्कि संवेदनशील जगहों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने का है। अब गेंद नगर निकायों के पाले में है कि वे कानून, मानवता और जिम्मेदारी—तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए इस समस्या का समाधान निकालें।





