ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर स्पष्ट रुख न अपनाने से भारत की विदेश नीति पर सवाल
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता Sonia Gandhi ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की हत्या के मामले में भारत सरकार की चुप्पी को लेकर कड़ा ऐतराज़ जताया है। एक राष्ट्रीय अख़बार The Indian Express में लिखे अपने लेख में उन्होंने कहा कि इस गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर कोई स्पष्ट बयान न देना तटस्थ रुख नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा है। उनके मुताबिक ऐसे मौकों पर चुप्पी खुद में एक संदेश बन जाती है।
राजनयिक बातचीत के बीच किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या को बताया खतरनाक संकेत
सोनिया गांधी ने याद दिलाया कि ईरान ने 1 मार्च को इस हत्या की पुष्टि की थी, जो अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए लक्षित हमलों के बाद सामने आई। उन्होंने इसे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक “गंभीर टूट” करार दिया। उनका कहना था कि बिना किसी औपचारिक युद्ध घोषणा के, बातचीत के दौर में किसी देश के सर्वोच्च नेता की हत्या को अनदेखा करना अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन को सामान्य बना सकता है।
ईरान-भारत रिश्तों की ऐतिहासिक और रणनीतिक अहमियत पर दिलाया ध्यान
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत और ईरान के संबंध सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और रणनीतिक भी रहे हैं। सोनिया गांधी ने 1994 का उदाहरण देते हुए बताया कि ईरान ने उस समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश को रोकने में भारत का समर्थन किया था। इसके अलावा, ज़ाहेदान में भारत की रणनीतिक मौजूदगी स्थापित करने में भी ईरान की भूमिका को उन्होंने अहम बताया, जो पाकिस्तान सीमा और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
इज़राइल से नज़दीकी और ईरान पर चुप्पी, नीति की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
कांग्रेस नेता ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यह घटना ऐसे समय पर हुई, जब प्रधानमंत्री Narendra Modi हाल ही में इज़राइल यात्रा से लौटे थे और वहां की सरकार के प्रति समर्थन दोहराया था। उन्होंने कहा कि भारत के Benjamin Netanyahu के नेतृत्व वाली सरकार से मजबूत रिश्ते हैं, यह बात स्वीकार्य है, लेकिन ईरान जैसे पुराने मित्र पर चुप्पी भारत की संतुलित विदेश नीति की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।
खाड़ी देशों में बसे करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा से जुड़ा है भारत का रुख
सोनिया गांधी ने चेताया कि भारत की साख केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा भी जुड़ी है। उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। अतीत में खाड़ी युद्ध, यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों के दौरान भारत अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी इसलिए कर सका, क्योंकि उसे एक स्वतंत्र और भरोसेमंद देश के रूप में देखा गया। यदि भारत सिद्धांतों की जगह सुविधा को तरजीह देता दिखा, तो न सिर्फ वैश्विक दक्षिण बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।





