सोमनाथ से अयोध्या, फिर जिन्ना की मजार तक… लालकृष्ण आडवाणी का सफर और बीजेपी की कहानी

अटल-आडवाणी युग: दो नेताओं की साझेदारी, जिसने भारतीय राजनीति में बीजेपी को राष्ट्रीय ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई

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भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी कहानी किसी एक पद, चुनाव या राजनीतिक घटनाक्रम तक सीमित नहीं रहती। उनका सफर एक पार्टी के निर्माण, विचारधारा के विस्तार और देश की राजनीति में आए बड़े बदलावों से जुड़ जाता है। लालकृष्ण आडवाणी ऐसा ही एक नाम हैं। बीजेपी के इतिहास को समझना हो, उसके शुरुआती संघर्ष को जानना हो या उसके राष्ट्रीय विस्तार की कहानी को पढ़ना हो, आडवाणी की भूमिका को अलग करके नहीं देखा जा सकता।

एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी की ओजस्वी वाणी, संसदीय गरिमा और गठबंधन की राजनीति थी, तो दूसरी तरफ आडवाणी का संगठनात्मक कौशल, कार्यकर्ताओं से संवाद और पार्टी के राजनीतिक आधार को विस्तार देने का अभियान। दोनों की भूमिकाएं अलग थीं, लेकिन बीजेपी के विकास की कहानी में एक-दूसरे की पूरक थीं। बीजेपी के आधिकारिक इतिहास में भी वाजपेयी और आडवाणी को पार्टी के विकास के प्रमुख नेताओं के रूप में दर्ज किया गया है।

आज बीजेपी देश की राजनीति की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल दो सीटें मिली थीं। 1989 में यह संख्या बढ़कर 85 से 86 के आसपास पहुंची और 1990 के दशक में पार्टी राष्ट्रीय सत्ता की दावेदार बनकर उभरी। अलग-अलग स्रोतों में 1989 की सीटों की संख्या में मामूली अंतर मिलता है, लेकिन राजनीतिक विस्तार की दिशा स्पष्ट है।

इस परिवर्तन के पीछे अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं का योगदान था। उनमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की साझेदारी निर्णायक अध्यायों में से एक रही।

1. कराची से दिल्ली तक: विभाजन की पीड़ा से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

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8 नवंबर 1927 को तत्कालीन अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के कराची में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी का बचपन उस दौर में बीता, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन से गुजर रहा था। 1947 में भारत के विभाजन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। कराची छूट गया और उन्हें भारत आना पड़ा।

आडवाणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और बाद में भारतीय जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में आए। जनसंघ की स्थापना 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। यह वही राजनीतिक परंपरा थी, जिससे आगे चलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ।

आडवाणी का शुरुआती राजनीतिक जीवन सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करने, विचारधारा को समझने और कार्यकर्ताओं के बीच काम करने में बीता। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान बना।

2. अटल-आडवाणी की जोड़ी: एक ने आवाज दी, दूसरे ने संगठन को विस्तार दिया

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1980 में बीजेपी के गठन के बाद पार्टी के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने। आडवाणी ने संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और 1986 में पहली बार पार्टी अध्यक्ष बने। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग अवधियों में पार्टी का नेतृत्व किया।

अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान एक प्रभावशाली वक्ता, संसदीय नेता और विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को साथ लेकर चलने वाले राजनेता के रूप में बनी। दूसरी ओर, आडवाणी ने संगठन को मजबूत करने, राजनीतिक मुद्दों को जनसंपर्क अभियानों से जोड़ने और पार्टी के समर्थक आधार का विस्तार करने पर जोर दिया।

इसे इस तरह समझा जा सकता है कि वाजपेयी ने बीजेपी को व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि आडवाणी ने संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक लामबंदी को नई गति दी। यह कोई औपचारिक बंटवारा नहीं था, बल्कि दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली और उनके काम का व्यापक स्वरूप था।

बीजेपी की यात्रा में यह साझेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि पार्टी को एक साथ दो चुनौतियों का सामना करना था। पहली, अपने मूल समर्थक वर्ग को मजबूत करना और दूसरी, उन मतदाताओं तक पहुंचना जो पार्टी को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखने के लिए तैयार हों।

वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी ने अलग-अलग तरीकों से इन दोनों चुनौतियों का सामना किया।

3. 1984 के दो सांसदों से राष्ट्रीय राजनीतिक ताकत तक

1984 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए बेहद कठिन साबित हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला और बीजेपी केवल दो सीटें जीत सकी।

लेकिन यह पार्टी की राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक नए दौर की शुरुआत साबित हुआ। 1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें बढ़कर 85 से 86 के आसपास पहुंच गईं। 1991 में पार्टी ने 120 सीटें हासिल कीं और 1996 में 161 सीटों के साथ लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई।

लोकसभा में बीजेपी की सीटों का सफर

1984 से 1996 तक के प्रमुख चुनावों में बीजेपी की सीटें।आंकड़ों में बीजेपी के संगठनात्मक विस्तार की कहानी दिखाई देती है। हालांकि इस उभार का श्रेय केवल दो नेताओं को देना सही नहीं होगा। पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं, राज्य स्तरीय संगठनों, सहयोगी दलों, कार्यकर्ताओं और बदलते राजनीतिक माहौल ने भी इसमें योगदान दिया।

फिर भी आडवाणी की भूमिका खास थी। पार्टी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को सक्रिय रखने, देशव्यापी यात्राओं के जरिए समर्थकों से जुड़ने और बीजेपी को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने की रणनीति को आगे बढ़ाया।

4. सोमनाथ से अयोध्या तक: राम रथयात्रा जिसने राजनीति की दिशा बदल दी

25 सितंबर 1990। गुजरात के सोमनाथ से लालकृष्ण आडवाणी ने राम रथयात्रा शुरू की। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के आंदोलन के लिए जनसमर्थन जुटाना था। रथयात्रा कई राज्यों से गुजरने वाली थी, लेकिन 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया और यात्रा वहीं रुक गई।

इस यात्रा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। धार्मिक प्रतीकों, सांस्कृतिक पहचान और मंदिर निर्माण के सवाल ने राजनीतिक बहस को नई दिशा दी। बीजेपी के विस्तार में इस आंदोलन की अहम भूमिका रही।लेकिन इस अध्याय को केवल एक राजनीतिक सफलता की कहानी के रूप में देखना भी अधूरा होगा। राम मंदिर आंदोलन के साथ देश में धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक तनाव भी बढ़े। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई, जिसकी घटना ने भारतीय राजनीति और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

इसलिए आडवाणी की रथयात्रा भारतीय राजनीति का ऐसा मोड़ है, जिसे समझने के लिए उसके चुनावी प्रभाव के साथ-साथ उसके सामाजिक परिणामों को भी देखना जरूरी है।

5. सत्ता तक पहुंचने का रास्ता: वाजपेयी प्रधानमंत्री, आडवाणी सरकार के प्रमुख रणनीतिकार

1996 में बीजेपी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी और अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने, हालांकि उनकी सरकार केवल 13 दिन चली। इसके बाद 1998 में बीजेपी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी। 1999 में फिर चुनाव हुआ और एनडीए ने दोबारा सत्ता संभाली। वाजपेयी 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे, बीच में 1999 में नए जनादेश के साथ उनकी सरकार बनी।

यहां आडवाणी की राजनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई। उन्होंने गृह मंत्री के रूप में 1998 से 2004 तक जिम्मेदारी संभाली और 2002 से 2004 तक उपप्रधानमंत्री भी रहे।

वाजपेयी गठबंधन की राजनीति के चेहरे थे। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार चलाई। आडवाणी ने पार्टी संगठन और सरकार के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौर में बीजेपी को केवल आंदोलन आधारित राजनीतिक शक्ति से आगे बढ़कर केंद्र में सरकार चलाने का अनुभव मिला।

यही अटल-आडवाणी युग की एक बड़ी विशेषता थी। एक तरफ पार्टी की वैचारिक पहचान कायम रही, दूसरी तरफ सहयोगी दलों के साथ मिलकर शासन चलाने की राजनीतिक जरूरतों को भी स्वीकार किया गया।

6. प्रधानमंत्री मोदी और आडवाणी: गुरु, वरिष्ठ नेता और राजनीतिक विरासत

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर में भी लालकृष्ण आडवाणी का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा। मोदी ने बीजेपी संगठन में लंबे समय तक काम किया और गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले पार्टी संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। आडवाणी उस दौर के वरिष्ठ नेताओं में थे, जिनके नेतृत्व में बीजेपी का संगठन देश के कई हिस्सों में विस्तारित हुआ।

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया। यह पार्टी के इतिहास में एक नया चरण था। 2014 के बाद बीजेपी का राष्ट्रीय विस्तार जारी रहा और 2019 में भी पार्टी ने लोकसभा में अपने दम पर बहुमत हासिल किया।

मोदी और आडवाणी की तस्वीरें भारतीय राजनीति के एक पीढ़ीगत बदलाव को भी दिखाती हैं। जिस दौर में आडवाणी ने पार्टी को विस्तार देने के लिए काम किया, बाद के दौर में उसी संगठन से निकले नेताओं ने पार्टी को नई राजनीतिक दिशा दी।फिर भी आडवाणी के योगदान को बीजेपी की राजनीतिक विरासत से अलग नहीं किया जा सकता।

7. जिन्ना की मजार: कराची की स्मृति और राजनीतिक विवाद

आडवाणी के राजनीतिक सफर का सबसे विवादास्पद पड़ाव जून 2005 में आया, जब पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने कराची में मोहम्मद अली जिन्ना की मजार का दौरा किया।

कराची उनका जन्मस्थान था। लेकिन जिन्ना के बारे में आडवाणी की टिप्पणियों ने बीजेपी और व्यापक संघ परिवार के भीतर विवाद खड़ा कर दिया। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली उनकी टिप्पणी पर वैचारिक असहमति सामने आई और आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

इस घटना को अक्सर उनके राजनीतिक जीवन के निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह कहना कि उनका पूरा राजनीतिक करियर जिन्ना की मजार पर ही समाप्त हो गया, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।आडवाणी इसके बाद भी राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने पार्टी में जिम्मेदारियां निभाईं, लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे और 2009 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने। 2024 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की।इसलिए जिन्ना प्रकरण उनके राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण विवाद जरूर था, लेकिन उनकी पूरी विरासत को केवल इसी घटना तक सीमित नहीं किया जा सकता।

8. बीजेपी की आज की ताकत में आडवाणी की विरासत

बीजेपी की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए उसके इतिहास के अलग-अलग चरणों को देखना जरूरी है।

1980 का दशक: नई पार्टी के रूप में संगठन और पहचान बनाने का दौर।

1990 का दशक: राम मंदिर आंदोलन, जनाधार का विस्तार और राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख स्थान हासिल करने का दौर।

1998 से 2004: वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार चलाने और गठबंधन की राजनीति का अनुभव।

2014 के बाद: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी का नया विस्तार और राष्ट्रीय राजनीति में उसका व्यापक प्रभाव।

इन सभी चरणों में अनेक नेताओं का योगदान रहा। लेकिन आडवाणी का नाम उस पीढ़ी से जुड़ा है, जिसने दो सीटों वाली पार्टी से राष्ट्रीय सत्ता तक पहुंचने की लंबी राजनीतिक यात्रा देखी और उसमें सक्रिय भूमिका निभाई।

उनका योगदान केवल राम रथयात्रा तक सीमित नहीं था। पार्टी अध्यक्ष के रूप में संगठन को मजबूत करना, राजनीतिक यात्राओं के जरिए देशव्यापी संपर्क बढ़ाना, संसद में सक्रिय रहना और वाजपेयी सरकार में गृह मंत्री तथा उपप्रधानमंत्री की जिम्मेदारियां निभाना उनके राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से रहे।

अटल-आडवाणी युग भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय

लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक सफर कई विरोधाभासों और बड़े बदलावों से भरा रहा। कराची में जन्म, विभाजन के बाद भारत आगमन, जनसंघ से बीजेपी तक का सफर, सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा, वाजपेयी सरकार में उपप्रधानमंत्री का पद और जिन्ना की मजार से जुड़ा विवाद। ये सभी घटनाएं उनके राजनीतिक जीवन की अलग-अलग परतें हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी की साझेदारी ने बीजेपी के संगठनात्मक विस्तार, वैचारिक पहचान और राष्ट्रीय राजनीति में उभार को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वाजपेयी ने गठबंधन की राजनीति और सरकार चलाने के जरिए पार्टी को व्यापक राजनीतिक मंच दिया, जबकि आडवाणी ने संगठन और जनआंदोलन की राजनीति को नई गति दी।

आज बीजेपी जिस मुकाम पर है, उसके पीछे कई दशकों की मेहनत और अनेक पीढ़ियों का योगदान है। आडवाणी उस इतिहास के केंद्रीय पात्रों में से एक हैं।

उनकी विरासत को समझने का सही तरीका न तो उन्हें केवल एक रथयात्रा तक सीमित करना है, न ही जिन्ना प्रकरण को उनके पूरे जीवन का अंतिम अध्याय मान लेना। उनके राजनीतिक सफर में उपलब्धियां भी हैं, विवाद भी और भारतीय लोकतंत्र में आए व्यापक बदलावों की कहानी भी।

अटल-आडवाणी युग की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान यही है कि उसने बीजेपी को एक सीमित संसदीय उपस्थिति वाली पार्टी से राष्ट्रीय सत्ता की प्रमुख दावेदार बनाने की यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान।

 

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