बिहार के चुनावी माहौल में फिर गूंजा सीवान का तेज़ाब कांड: जब इंसानियत शर्मसार हुई
बिहार का सीवान ज़िला—कभी राजनीति और अपराध के गठजोड़ का पर्याय बन गया था। 2000 के दशक की शुरुआत में यहां एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। यह कहानी है चंदा बाबू नामक एक छोटे व्यापारी की, जिनके तीन बेटों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। यह घटना बिहार की न्याय व्यवस्था, अपराध और सत्ता के संबंधों पर गहरे सवाल छोड़ गई।
आतंक का नाम बन चुका था सीवान
वर्ष 2004 का समय था। सीवान में एक प्रभावशाली नेता और उन पर चल रहे कई मामलों को लेकर भय का माहौल था। बताया जाता है कि उस दौर में कई इलाकों में समानांतर सत्ता जैसी स्थिति बन चुकी थी। स्थानीय व्यापारियों से रंगदारी वसूली और ज़मीनों पर कब्ज़े जैसी घटनाएं आम थीं।
एक व्यापारी के साहस की कीमत
सीवान के मुख्य बाज़ार में रहने वाले चंद्रेश्वर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू की दो दुकानें थीं — एक पर उनका बेटा सतीश और दूसरी पर बेटा गिरीश बैठते थे। अगस्त 2004 में उनके निर्माणाधीन मकान की एक दुकान पर कब्ज़े की कोशिश हुई, जिसका उन्होंने विरोध किया। यह विरोध आगे चलकर उनके परिवार के लिए त्रासदी बन गया।
16 अगस्त 2004 की वह भयावह शाम
रिपोर्ट्स के अनुसार, उसी दिन कुछ लोग उनकी दुकान पर रंगदारी मांगने पहुंचे। जब पैसे देने से मना किया गया, तो हिंसा शुरू हुई। दुकानों पर हमला हुआ, लूटपाट की गई और उनके दो बेटों — सतीश और गिरीश — को जबरन उठा लिया गया। तीसरे बेटे राजीव को भी अगवा कर लिया गया।
अमानवीय कृत्य जिसने देश को झकझोर दिया
तीनों बेटों को कथित रूप से प्रतापपुर स्थित एक हवेली में ले जाया गया। गवाहों और जांच रिपोर्टों के मुताबिक, वहां दो बेटों को पेड़ से बांध दिया गया और उन पर तेज़ाब डाला गया। यह दृश्य इतना भयावह था कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएं। इसके बाद दोनों की हत्या कर दी गई। तीसरे बेटे राजीव को कुछ समय तक बंधक बनाकर रखा गया।
फरार हुआ एकमात्र गवाह
राजीव किसी तरह वहां से भागने में सफल रहा। उसने बाद में पुलिस को इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। लेकिन जिस दौर में यह घटना हुई, उस समय कानून का डर अपराधियों पर न के बराबर दिखता था। चंदा बाबू को न्याय की उम्मीद थी, लेकिन शुरू में उन्हें सुरक्षा तक नहीं मिली।
न्याय की जंग और लगातार धमकियाँ
चंदा बाबू के परिवार को कई धमकियाँ मिलीं। बताया जाता है कि उनके रिश्तेदार तक डर के कारण सीवान छोड़कर चले गए। बार-बार प्रशासन और नेताओं से गुहार लगाने के बाद भी कार्रवाई में देरी होती रही। इस बीच, समय बीतता गया और परिवार का सहारा बनने वाला तीसरा बेटा राजीव भी न्याय की लड़ाई के बीच मारा गया।
लंबी कानूनी जंग और सियासी तूफ़ान
2005 में बिहार में सरकार बदली और अपराध नियंत्रण के प्रयास तेज हुए। कई पुराने मामलों में पुनः जांच शुरू हुई और अपराधियों पर शिकंजा कसा गया। शहाबुद्दीन सहित कई मामलों में कोर्ट में सुनवाई हुई। तेज़ाब कांड में भी अदालत ने कठोर टिप्पणियाँ कीं। कई दोषियों को सज़ा मिली, हालांकि यह न्याय चंदा बाबू के लिए बहुत देर से आया।
न्याय की उम्मीद में एक पिता का संघर्ष
चंदा बाबू जीवनभर अदालतों के चक्कर लगाते रहे। उन्होंने यह लड़ाई अपने तीन बेटों के लिए लड़ी — जिनकी मौत ने न सिर्फ़ उनके परिवार को तोड़ा बल्कि पूरे बिहार को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जब अपराध सत्ता से बड़ा हो जाए, तो आम आदमी कहां जाए।
अंतिम अध्याय: दो मौतें, दो अंत
साल 2020 में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते चंदा बाबू का निधन हो गया। 2021 में जेल में बंद पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की भी कोरोना संक्रमण से मौत हो गई। इस तरह इस दर्दनाक कहानी के दो मुख्य पात्र — एक पीड़ित और एक अभियुक्त — दोनों दुनिया से चले गए, लेकिन सवाल आज भी जिंदा है:
क्या भारत का कोई पिता अपने बच्चों के लिए न्याय पाने में इतना असहाय होना चाहिए था? यह कहानी केवल अपराध की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है, जो वर्षों तक एक पिता की कराह नहीं सुन सकी। सीवान का यह कांड आज भी बिहार की राजनीति और न्याय व्यवस्था के लिए एक मूक प्रश्नचिह्न बना हुआ है।





