इस गुरुकुल में 6 से 15 वर्ष तक के बच्चे रहकर शिक्षा प्राप्त करते हैं। बच्चों की दिनचर्या सुबह 4 बजे से शुरू हो जाती है। स्नान और पूजा-पाठ के बाद मंदिर में आरती और मंत्रोच्चार होता है। इसके बाद संस्कृत, वेद और शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है। पूरा वातावरण भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा नजर आता है।
आधुनिक शिक्षा का भी खास ध्यान
अनुशासन और संस्कारों की सीख
गुरुकुल में बच्चों का पूरा दिन अनुशासन के तहत बीतता है। सुबह की पढ़ाई और साधना के बाद शाम को खेलकूद कराया जाता है। रात में पारायण और लेखन कार्य होता है। रात 9:30 बजे तक सभी गतिविधियां समाप्त हो जाती हैं। यहां बच्चे केवल किताबों की शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन और संस्कार भी सीखते हैं।
कई राज्यों से आते हैं छात्र
Uttar Pradesh, Jharkhand और बिहार सहित कई राज्यों से करीब 50 से 60 बच्चे यहां रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब तक सैकड़ों छात्र इस गुरुकुल से शिक्षा हासिल कर चुके हैं और कई छात्र अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरी भी कर रहे हैं। हाल ही में यहां के तीन शिष्य शिक्षक बने हैं, जो इस परंपरा की सफलता का उदाहरण माने जा रहे हैं।
“भारत फिर बन सकता है विश्व गुरु”
मठ के महाराज Swami Ranganath Acharya का मानना है कि भारत दोबारा विश्व गुरु बनने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार देश को अपनी जड़ों और पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था की ओर लौटने की जरूरत है। उनका कहना है कि गुरुकुल बच्चों को केवल ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कार भी देता है, जो आधुनिक जीवन में बेहद जरूरी हैं।
समाज के सहयोग से चल रहा गुरुकुल
मठ का संचालन ग्रामीणों और समाज के सहयोग से किया जा रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद यहां बच्चों को बेहतर शिक्षा और संस्कार देने का प्रयास लगातार जारी है। तेजी से बदलती दुनिया के बीच भोजपुर का यह गुरुकुल यह संदेश देता है कि आधुनिकता अपनाने के साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।





