छह दशकों के बाद शिवसेना की कमान ठाकरे परिवार से छिनी, पहले किन दलों के साथ हो चुका है ऐसा

महाराष्ट मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे

Shinde Thackeray Shivsena: मुंबई की कई सारी पहचानों में एक पहचान शिवसेना भी थी। बालासाहेब ठाकरे जब तक जीवित रहे, शिवसेना और महाराष्ट्र की राजनीति उन्हीं के गिर्द घूमती रही। अब ऐसा नहीं रहा है। करीबन 6 दशकों बाद पार्टी की कमान अब चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को दे दी है।

पहली बार राजनीतिक दलों के साथ ऐसा नहीं हुआ

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है कि किसी पुराने राजनीतिक दल का दो-फाड़ हुआ है और सही चुनाव चिह्न बागी गुट को दे दिया गया है। खुद को ग्रैंड ओल्ड पार्टी बतानेवाली कांग्रेस हो, या फिर रामविलास पासवान की राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी। सबमें टूट हुई है।

1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विभाजन हुआ था. इसके बाद दो दल कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आई) का गठन हुआ था। इसके बाद 1978 में कांग्रेस एक बार फिर विभाजित हुई जब कांग्रेस (इंदिरा) और कांग्रेस (ओ) बनाई गई। फिलहाल, जो कांग्रेस है वह कई विभाजनों के बाद इंदिरा कांग्रेस का ही बचा हुआ रूप है, इसलिए उनको ग्रैंड ओल्ड पार्टी कहना भी गलत ही है।

साल 2012 में उत्तराखंड आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने वाला क्रांति दल दो गुटों में बंट गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश में साल 2017 में समाजवादी पार्टी विभाजित हो गईं। आज जो राजभर, मौर्य आदि सब अलग दलों के साथ हैं, कभी इन सबका भी एक ठिकाना ही हुआ करता था।

पहचान से क्या होता है

असल में, ग्रामीण या निरक्षर मतदाता पार्टी को तो केवल निशान और नाम से ही जानते हैं, इसलिए लोग अक्सर ही उस नाम और निशान के लिए जोर देते हैं।

वैसे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार ने शुक्रवार को कहा कि ‘तीर-कमान’ का चिह्न खोने से उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि जनता उसके नए चिह्न को स्वीकार कर लेगी। उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 1978 में एक नया चिह्न चुना था, लेकिन उससे पार्टी को नुकसान नहीं उठाना पड़ा था।

पवार ने ठाकरे समूह को सलाह दी, ‘जब कोई फैसला आ जाता है, तो चर्चा नहीं करनी चाहिए. इसे स्वीकार करें, नया चिह्न लें। इससे (पुराना चिह्न खोने से) कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

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