Wednesday, March 11, 2026
  • Contact
India News
  • मुख्य समाचार
  • राजनीति
  • संपादक की पसंद
  • शहर और राज्य
    • उत्तर प्रदेश
      • आगरा
      • कानपुर
      • लखनऊ
      • मेरठ
    • छत्तीसगढ
      • जगदलपुर
      • बिलासपुर
      • भिलाई
      • रायपुर
    • दिल्ली
    • बिहार
      • पटना
    • मध्य प्रदेश
      • इंदौर
      • ग्वालियर
      • जबलपुर
      • भोपाल
    • महाराष्ट्र
      • नागपुर
      • नासिको
      • पुणे
      • मुंबई
    • राजस्थान
      • अजमेर
      • कोटा
      • जयपुर
      • जैसलमेर
      • जोधपुर
  • स्टार्टअप
  • कृषि
  • मनोरंजन
  • बिजनेस
  • धर्म
  • ऑटो
  • सरकारी नौकरी
  • वीडियो
No Result
View All Result
India News
Home मुख्य समाचार

छह दशकों के बाद शिवसेना की कमान ठाकरे परिवार से छिनी, पहले किन दलों के साथ हो चुका है ऐसा

DigitalDesk by DigitalDesk
February 18, 2023
in मुख्य समाचार, राजनीति
0
महाराष्ट्र  -एकनाथ शिंदे ने लिया बडा फैसला

महाराष्ट मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे

0
SHARES
0
VIEWS
Share on FacebookShare on TwitterWhatsapp

Shinde Thackeray Shivsena: मुंबई की कई सारी पहचानों में एक पहचान शिवसेना भी थी। बालासाहेब ठाकरे जब तक जीवित रहे, शिवसेना और महाराष्ट्र की राजनीति उन्हीं के गिर्द घूमती रही। अब ऐसा नहीं रहा है। करीबन 6 दशकों बाद पार्टी की कमान अब चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को दे दी है।

  • 19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे (Balasaheb Thackeray) ने शिवसेना का गठन किया था
  • 57 साल पुरानी पार्टी का चुनाव चिह्न और अधिकार अब ठाकरे परिवार के हाथ से निकल गया है
  • भारतीय चुनाव आयोग के फैसले में यह तय हुआ कि शिंदे गुट के पास आधिकारिक नाम शिवसेना और पार्टी का चुनाव चिह्न ‘धनुष और तीर’ रहेगा
  • ठाकरे गुट को यह बड़ा झटका है, हालांकि इससे पहले भी कई ऐसे राजनीतिक दल हैं जिन्होंने अलग होने के बाद वास्तविक चुनवी चिह्न की मांग की है
  • चुनाव आयोग ने शिंदे गुट के पक्ष में फैसला विधानसभा में कुल 67 विधायकों में से 40 एमएलए का समर्थन उनके पास होने के कारण दिया है
  • संसद में भी शिंदे गुट के पास ज्यादा सांसद हैं. आयोग ने कहा कि 13 सांसद शिंदे गुट के साथ हैं, तो वहीं 7 उद्धव ठाकरे के साथ और यही कारण है कि शिंदे गुट को वास्तविक चुनावी चिह्न दिया गया है

पहली बार राजनीतिक दलों के साथ ऐसा नहीं हुआ

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है कि किसी पुराने राजनीतिक दल का दो-फाड़ हुआ है और सही चुनाव चिह्न बागी गुट को दे दिया गया है। खुद को ग्रैंड ओल्ड पार्टी बतानेवाली कांग्रेस हो, या फिर रामविलास पासवान की राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी। सबमें टूट हुई है।

Related posts

LPG महंगी और आउट ऑफ स्टॉक अब इलेक्ट्रिक कुकर बन रहे हैं किचन के नए kitchen chef

LPG महंगी और आउट ऑफ स्टॉक अब इलेक्ट्रिक कुकर बन रहे हैं किचन के नए kitchen chef

March 11, 2026
Jal Jeevan Mission- 2.0 को मंज़ूरी: ग्रामीण घरों तक भरोसेमंद पानी के लिए 8.70 लाख करोड़ का प्लान

Jal Jeevan Mission- 2.0 को मंज़ूरी: ग्रामीण घरों तक भरोसेमंद पानी के लिए 8.70 लाख करोड़ का प्लान

March 11, 2026

1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विभाजन हुआ था. इसके बाद दो दल कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आई) का गठन हुआ था। इसके बाद 1978 में कांग्रेस एक बार फिर विभाजित हुई जब कांग्रेस (इंदिरा) और कांग्रेस (ओ) बनाई गई। फिलहाल, जो कांग्रेस है वह कई विभाजनों के बाद इंदिरा कांग्रेस का ही बचा हुआ रूप है, इसलिए उनको ग्रैंड ओल्ड पार्टी कहना भी गलत ही है।

1980 में तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक दो गुटों में विभाजित हो गई। इसके बाद जनता दल में भी इसी तरह का विभाजन देखा गया और जद (यू) और जद (एस) अलग हो गए। देखें तो वाममोर्चा में या जनमोर्चा में जितने दल 90 के दशक में थे, सभी अलग हो गए। जनता दल से अलग होकर समता पार्टी, जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल बने। बाद में उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपनी अलग पार्टी बना ली। रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा बनाई, लेकिन उसके भी दो-फाड़ उनकी मौत के बाद हो गए। उनके भाई रामचरित्र पासवान और बेटे चिराग पासवान में फूट पड़ गयी।

साल 2012 में उत्तराखंड आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने वाला क्रांति दल दो गुटों में बंट गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश में साल 2017 में समाजवादी पार्टी विभाजित हो गईं। आज जो राजभर, मौर्य आदि सब अलग दलों के साथ हैं, कभी इन सबका भी एक ठिकाना ही हुआ करता था।

पहचान से क्या होता है

असल में, ग्रामीण या निरक्षर मतदाता पार्टी को तो केवल निशान और नाम से ही जानते हैं, इसलिए लोग अक्सर ही उस नाम और निशान के लिए जोर देते हैं।

वैसे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार ने शुक्रवार को कहा कि ‘तीर-कमान’ का चिह्न खोने से उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि जनता उसके नए चिह्न को स्वीकार कर लेगी। उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 1978 में एक नया चिह्न चुना था, लेकिन उससे पार्टी को नुकसान नहीं उठाना पड़ा था।

पवार ने ठाकरे समूह को सलाह दी, ‘जब कोई फैसला आ जाता है, तो चर्चा नहीं करनी चाहिए. इसे स्वीकार करें, नया चिह्न लें। इससे (पुराना चिह्न खोने से) कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

Post Views: 75
LIVE India News

लाइव इंडिया न्यूज 2016 से आप तक खबरें पंहुचा रहा है। लाइव इंडिया वेबसाइट का मकसद ब्रेकिंग, नेशनल, इंटरनेशनल, राजनीति, बिजनेस और अर्थतंत्र से जुड़े हर अपडेट्स सही समय पर देना है। देश के हिंदी भाषी राज्यों से रोजमर्रा की खबरों से लेकर राजनीति नेशनल व इंटरनेशनल मुद्दों से जुडी खबरें और उनके पीछे छुपे सवालों को बेधड़क सामने लाना, देश-विदेश के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का विश्लेषण बेबाकी से करना हमारा मकसद है।

Vihan Limelite Event & Entertainment Pvt Ltd
Regd Office Flat No 1
Mig 3 E 6
Arera Colony Bhopal

Branch Office
Main Road. Tikraparaa
Raipur CG

Director Deepti Chaurasia
Mobile No 7725016291

Email id - liveindianewsandviews@gmail.com

Currently Playing

LPG Gas Cylinders रसोई गैस संकट, लंबी कतारों ने बढ़ाई परेशानी

LPG Gas Cylinders रसोई गैस संकट, लंबी कतारों ने बढ़ाई परेशानी

LPG Gas Cylinders रसोई गैस संकट, लंबी कतारों ने बढ़ाई परेशानी

उत्तर प्रदेश
T-20 World Cup 2026: टीम इंडिया की जीत पर शोएब अख्तर की ये बात पाकिस्तानी फैन्स को चुभी

T-20 World Cup 2026: टीम इंडिया की जीत पर शोएब अख्तर की ये बात पाकिस्तानी फैन्स को चुभी

मनोरंजन
T20 World Cup Final: भारत-न्यूजीलैंड भिड़ंत, विजेता पर होगी करोड़ों की बारिश

T20 World Cup Final: भारत-न्यूजीलैंड भिड़ंत, विजेता पर होगी करोड़ों की बारिश

मनोरंजन

RSS Unknown Feed

  • Contact

© Copyright 2022,LIVE INDIA NEWS. All Rights Reserved | Email: Info@liveindia.news

No Result
View All Result
  • Home
  • मुख्य समाचार
  • शहर और राज्य
  • राजनीति
  • बिजनेस
  • संपादक की पसंद
  • मनोरंजन
  • स्टार्टअप
  • धर्म
  • कृषि

© Copyright 2022,LIVE INDIA NEWS. All Rights Reserved | Email: Info@liveindia.news

Go to mobile version