शिबू सोरेन का निधन… झारखंड आंदोलन के एक युग का अंत….जानें ‘गुरुजी’ के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर

Shibu Soren death is the end of an era of Jharkhand movement

शिबू सोरेन का निधन… झारखंड आंदोलन के एक युग का अंत….जानें ‘गुरुजी’ के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर

शिबू सोरेन, जिन्हें आदिवासी समाज में ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता है, झारखंड की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। आदिवासी अधिकारों की लड़ाई, झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन और राजनीतिक उतार-चढ़ावों से भरी उनकी यात्रा कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

धरतीपुत्र से मुख्यमंत्री तक जानिए झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन का संघर्ष और सियासी सफर

शुरुआती जीवन और आदिवासी संघर्ष से जुड़ाव

झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक रहे Shibu Soren का जन्म साल 1944 की 11 जनवरी के दिन झारखंड (तत्कालीन बिहार) स्थित दुमका जिले नेमरा गांव में हुआ था। Shibu Soren ने सोमवार 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के Sir Ganga Ram Hospital सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम सांस ली। आइये जानते हैं धरतीपुत्र से मुख्यमंत्री तक झारखंड के पूर्व सीएम शिबू सोरेन का संघर्ष और सियासी सफर…

शिबू सोरेन संथाल आदिवासी समुदाय Santhal tribal community से आते थे। बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने पिता को जमींदारों द्वारा मारे जाने के बाद अन्याय के खिलाफ लड़ाई का संकल्प लिया था। यही वह मोड़ था जब उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में कूदने का फैसला किया था।

संघर्ष की शुरुआत: ‘संथाल हुड़ार’ और ‘दिशोम गुरु’

1970 के दशक में उन्होंने ‘संथाल हुड़ार’ नामक आंदोलन की शुरुआत की थी। जिसका उद्देश्य था आदिवासी भूमि को बाहरी लोगों से बचाना। वे दिशोम गुरु यानी “जनजातीयों के नेता” के रूप में पहचाने जाने लगे थे। उन्होंने कई बार भूमाफिया और जमींदारों के खिलाफ संघर्ष किया और गरीबों को उनकी जमीन वापस दिलाई थी।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना

शिबू सोरेन ने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की थी। इस पार्टी का उद्देश्य अलग झारखंड राज्य की मांग को राजनीतिक मंच देना था। धीरे-धीरे यह आंदोलन बिहार के दक्षिणी हिस्सों में एक व्यापक जनांदोलन बन गया था। जिसने केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर अंततः 15 नवंबर 2000 को झारखंड को एक अलग राज्य का दर्जा दिलवाया था।

सांसद और केंद्रीय मंत्री के रूप में योगदान

शिबू सोरेन पहली बार 1980 में लोकसभा के लिए चुने गए थे। इसके बाद वे कई बार सांसद बने। यूपीए सरकार में उन्होंने कोयला मंत्री, श्रम मंत्री और इस्पात मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। लेकिन कोयला घोटाले और अन्य विवादों ने उनके करियर को झटका भी दिया था।

मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल

शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे

पहला कार्यकाल (2 मार्च 2005 – 12 मार्च 2005): बहुमत साबित न कर पाने की वजह से मात्र 10 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा।

दूसरा कार्यकाल (27 अगस्त 2008 – 18 जनवरी 2009): विधानसभा में बहुमत न जुटा पाने के कारण फिर इस्तीफा देना पड़ा।

तीसरा कार्यकाल (30 दिसंबर 2009 – 31 मई 2010): इस कार्यकाल के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बना ली और पार्टी की कमान धीरे-धीरे अपने बेटे हेमंत सोरेन को सौंप दी।

विवादों से भी रहा नाता

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। शशि नाथ झा अपहरण और हत्या मामले में उन्हें 2006 में दोषी ठहराया गया था। हालांकि बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया था। कोयला मंत्रालय में रहते हुए उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे, जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा था।

राजनीति से विराम और विरासत

शिबू सोरेन पिछले कई साल से सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हो चुके थे। लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और मार्गदर्शक के रूप में वे अंतिम सांस तक पार्टी के पथ प्रदर्शक बने रहे। उनके बेटे हेमंत सोरेन इस समय झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। हेमंत ही पार्टी की कमान भी संभाले हुए हैं।

झारखंड के आदिवासी समाज में ‘गुरुजी’ आज भी एक प्रेरणा हैं। जिन्होंने जमीन से उठकर राज्य निर्माण की कहानी लिखी थी। शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर एक आदिवासी किशोर के अन्याय के खिलाफ उठे स्वर से शुरू होकर झारखंड राज्य के निर्माण और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा था। संघर्ष, आंदोलन, जनसमर्थन, सत्ता और विवाद—उनकी जिंदगी हर मोर्चे पर परीक्षा की तरह रही मगर उन्होंने हर बार अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति से जनता का विश्वास जीता था। उनका योगदान न सिर्फ झारखंड की पहचान बना, बल्कि भारतीय राजनीति में जनआंदोलन की ताकत को भी स्थापित किया था। प्रकाश कुमार पांडेय

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