राम रहीम को झटका या राहत? पत्रकार हत्याकांड में फिर खुली सुनवाई
पंजाब- हरियाणा हाई कोर्ट ने पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड मामले की सुनवाई एक बार फिर से शुरू कर दी है। पत्रकार की हत्या का यह वही मामला है, जिसमें डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम को दोषी पाया गया था। निचली अदालत ने राम रहीम को सजा भी सुनाई थी। लेकिन अब खास बात है कि पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी कर ली थी। इतना ही नहीं फैसला भी सुरक्षित रख लिया था। करीब चार महीने तक कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा। अब नए तथ्यों के प्रकाश में आने का हवाला दिया जा रहा है, जिसके बाद हाई कोर्ट की ओर से फिर सुनवाई शुरी कर दी है।
चार महीने बाद सुनवाई
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम से जुड़े चर्चित पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बार फिर सुनवाई शुरू कर दी है। यह सुनवाई ऐसे समय पर दोबारा शुरू हुई है, जब करीब चार महीने पहले अदालत ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। हाईकोर्ट ने कहा है कि फैसले का मसौदा तैयार करते समय कुछ नए तथ्य सामने आए हैं, जिन पर स्पष्टता जरूरी है। इसी कारण अब इस संवेदनशील मामले की दोबारा सुनवाई की जा रही है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ ने 30 जनवरी को जारी आदेश में कहा कि राम रहीम और अन्य आरोपियों की अपीलों पर 25 सितंबर 2025 को अंतिम सुनवाई पूरी हो चुकी थी। हालांकि, निर्णय लिखते समय कुछ ऐसे नए तथ्य सामने आए, जिनके बिना मामले का सही और न्यायपूर्ण निपटारा संभव नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन तथ्यों पर पक्षकारों से और स्पष्टीकरण लेना जरूरी है, इसलिए सुनवाई को फिर से शुरू किया जा रहा है।
हत्या मामला और सजा
गौरतलब है कि 17 जनवरी 2019 को पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम और तीन अन्य आरोपियों को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी और 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। रामचंद्र छत्रपति वर्ष 2002 में सिरसा से प्रकाशित होने वाले ‘पूरा सच’ अखबार के संपादक थे और उन्होंने डेरा से जुड़े कई गंभीर खुलासे किए थे। इसी के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी, जिसे लेकर यह मामला देशभर में सुर्खियों में रहा।
राम रहीम की दलीलें
गुरमीत राम रहीम ने अपनी सजा को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दावा किया है कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उनके वकील का तर्क है कि वर्ष 2002 में पुलिस द्वारा दाखिल पहली चार्जशीट में राम रहीम का नाम नहीं था। उस चार्जशीट में अन्य आरोपी निर्मल, कुलदीप और कृष्ण लाल के नाम शामिल थे और उन्होंने भी राम रहीम की किसी साजिश में भूमिका का आरोप नहीं लगाया था। राम रहीम के अनुसार, बाद में सीबीआई ने “बदले की भावना” से उनका नाम मामले में जोड़ा।
अखबार और साजिश सवाल
राम रहीम की ओर से यह भी कहा गया है कि जांच एजेंसी यह साबित करने में असफल रही कि उन्होंने कभी ‘पूरा सच’ अखबार पढ़ा था। उनकी याचिका में दलील दी गई है कि यह एक शाम का अखबार था, जिसमें वही खबरें छपती थीं, जो पहले ही सुबह के अखबारों में प्रकाशित हो चुकी होती थीं। ऐसे में यह मानने का कोई आधार नहीं है कि डेरा प्रमुख को इस अखबार या इसके संपादक से कोई व्यक्तिगत रंजिश थी। बचाव पक्ष ने कहा कि जब कोई नाराजगी या दुश्मनी साबित ही नहीं होती, तो हत्या की साजिश में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट द्वारा दोबारा सुनवाई शुरू करना इस मामले को एक नया मोड़ देता है। एक ओर जहां राम रहीम और उनके समर्थक इसे राहत की उम्मीद के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष और पत्रकार जगत इस बात पर नजर बनाए हुए है कि अदालत नए तथ्यों के आधार पर क्या रुख अपनाती है। अब यह देखना अहम होगा कि हाईकोर्ट की यह पुनः सुनवाई राम रहीम की सजा को बरकरार रखती है या मामले में कोई नया फैसला सामने आता है।





