कोठरी में बंद नहीं, भविष्य के लिए बचाए हैं बीज: मझगवां के आदिवासी परिवारों की देसी खेती में छिपी आत्मनिर्भरता की कहानी

tribal family

शहडोल के मझगवां गांव का सलैया टोला पहली नजर में मध्यप्रदेश के किसी सामान्य आदिवासी गांव जैसा दिखाई दे सकता है। लेकिन यहां के घरों की छोटी-छोटी कोठरियों में ऐसा खजाना सुरक्षित है, जिसकी कीमत बाजार तय नहीं करता। ये खजाना है देसी बीजों का। धान, कोदो, कुटकी, कागुन, समा और मिलो जैसी पारंपरिक फसलों के बीज यहां सिर्फ अगली फसल की तैयारी नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे कृषि ज्ञान की जीवित निशानी हैं।

आज खेती में हाइब्रिड बीज, बाजार आधारित उत्पादन और ज्यादा पैदावार की दौड़ तेज है। ऐसे समय में मझगवां के बैगा और भूमिया परिवारों का अपने पारंपरिक बीजों को बचाए रखना एक अलग तस्वीर सामने रखता है। यहां किसान बीज खरीदकर सिर्फ फसल नहीं उगाते, बल्कि एक फसल से अगली फसल का बीज खुद तैयार करने की परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं।

बीज यानी भोजन भी, भरोसा भी

भोल्ली सिंह के खेतों में झोलार, बांसपोर, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी पारंपरिक धान की किस्मों के साथ कोदो, कुटकी, कागुन और मिलो जैसी फसलें भी मौजूद हैं। यह विविधता अपने आप में महत्वपूर्ण है। एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग अनाजों को खेती और भोजन का हिस्सा बनाना इन परिवारों की पुरानी जीवन पद्धति रही है। यही वजह है कि यहां फसल की सफलता का मतलब केवल बाजार में अनाज बेचकर पैसा कमाना नहीं है। खेत से अनाज घर पहुंचना और घर की कोठरी का भर जाना भी समृद्धि का पैमाना है। भोल्ली सिंह का पारंपरिक भोजन और शारीरिक सक्रियता से जुड़ा अनुभव इसी ग्रामीण जीवनशैली की एक झलक देता है। उनके लिए खेत का अनाज केवल उत्पादन नहीं, जीवन का हिस्सा है।

एक मुट्ठी बीज में कई पीढ़ियों की कहानी

बिरमतिया बैगा के घर में सुरक्षित बीज इस कहानी को और गहरा बनाते हैं। समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी किस्में बताती हैं कि पारंपरिक खेती में बीज केवल कृषि सामग्री नहीं था। बीज के साथ मौसम का अनुभव जुड़ा था। मिट्टी की पहचान जुड़ी थी। कौन-सी फसल कब बोनी है, कितने समय में तैयार होगी, उसका अनाज कैसे सुरक्षित रखना है और अगली बुआई के लिए उसमें से बीज कैसे बचाना है—यह पूरा ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा।

यानी बीज बचाने के साथ खेती का ज्ञान भी बचता रहा।

यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। आधुनिक कृषि तकनीक जहां उत्पादन की क्षमता बढ़ाने पर जोर देती है, वहीं पारंपरिक बीजों का संरक्षण खेती की उस स्मृति को बचाता है, जो किसी किताब में दर्ज नहीं होती।

धनवतिया का जवाब गांव की असली ताकत बताता है

धनवतिया बैगा के पास झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो, कुटकी, कागुन और अलग-अलग पारंपरिक कुटकी की किस्मों के बीज हैं। लेकिन इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात उनके बीजों की सूची नहीं, बल्कि उनका सहज जवाब है—जो बीज यहां नहीं मिलेगा, वह आसपास के पहाड़ी गांवों में मिल जाएगा। यानी बीज संरक्षण किसी एक किसान की निजी कोशिश नहीं है। यह एक तरह का सामुदायिक बीज नेटवर्क है, जहां जरूरत पड़ने पर किसान एक-दूसरे से बीज लेते हैं और फिर अगली फसल के लिए उसे आगे बढ़ाते हैं। बाजार में बीज की कीमत होती है, लेकिन ऐसे समुदायों में बीज का एक और मूल्य होता है—विश्वास।

सालभर का अनाज, कम बाजार निर्भरता

मझगवां के इन परिवारों की कहानी का दूसरा बड़ा पहलू खाद्य आत्मनिर्भरता है। जब किसान अपने खेत में धान के साथ कोदो, कुटकी, कागुन, समा और अन्य अनाज भी उगाता है और उसे सुरक्षित रखता है, तो घर की खाद्य जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खेत से ही पूरा होता है। यह व्यवस्था बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव से पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, लेकिन रोजमर्रा के भोजन के लिए बाहरी निर्भरता को कम कर सकती है। यही वजह है कि घर की कोठरी यहां केवल अनाज रखने की जगह नहीं है। वह परिवार के लिए भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक भी है। फसल घर में सुरक्षित है तो अगले मौसम तक भोजन की चिंता कुछ कम है। बीज सुरक्षित है तो अगली बुआई की चिंता कुछ कम है।

देसी अनाज की वापसी का बड़ा संदर्भ

मझगवां की कहानी आज के समय में इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज और पारंपरिक अनाजों को लेकर देश में फिर से चर्चा बढ़ी है। इन फसलों की खासियत केवल यह नहीं कि वे पुराने समय से उगाई जाती रही हैं। इनके साथ स्थानीय जलवायु, मिट्टी और पारंपरिक कृषि पद्धतियों का लंबा अनुभव जुड़ा है। इसलिए जब कोई किसान पुरानी किस्म का बीज बचाता है, तो वह केवल एक अनाज की किस्म नहीं बचा रहा होता। वह कृषि जैव विविधता का एक छोटा हिस्सा सुरक्षित कर रहा होता है।  मझगवां में झोलार से ठर्री तक और कोदो से कुटकी तक फैली विविधता इसी बात की मिसाल है।

सबसे बड़ी विरासत अगली पीढ़ी के नाम

मझगवां के इन परिवारों की कहानी का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि यहां बीज का सफर खेत पर खत्म नहीं होता।

बीज खेत में जाता है।
फसल बनता है।
अनाज घर आता है।
कुछ हिस्सा परिवार खाता है।
और कुछ हिस्सा फिर बीज बनकर सुरक्षित हो जाता है।

यानी एक मौसम अगले मौसम को जन्म देता है।

यही चक्र दशकों से चलता आया है। इसी चक्र में परिवार की खाद्य सुरक्षा है, परंपरा है और अपनी खेती पर भरोसा है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.के. प्रजापति के अनुसार क्षेत्र के बैगा और भूमिया समाज के किसान लंबे समय से पारंपरिक फस लों की खेती करते रहे हैं और अनेक पुरानी किस्मों के बीज आज भी उनके पास सुरक्षित हैं। मझगवां के घरों की कोठरियों में रखे ये बीज इसलिए खास हैं क्योंकि ये हमें खेती का एक दूसरा अर्थ बताते हैं।

खेती सिर्फ बाजार के लिए पैदा करना नहीं।
खेती अपने परिवार को खिलाना भी है।
खेती अपनी पहचान बचाना भी है।
और बीज बचाना यानी आने वाली पीढ़ी के लिए विकल्प बचाना भी है। 
मझगवां के आदिवासी परिवारों ने शायद किसी बड़े अभियान या बड़े दावे के बिना यह काम पीढ़ियों से किया है। उनकी कोठरी में रखा छोटा-सा बीज इसी बड़े सच की गवाही देता है कि किसान जब बीज बचाता है, तो वह सिर्फ अगली फसल नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली भी सहेजता है।

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