सरमी दीदी की सफलता की कहानी: बाग प्रिंट से बदली जिंदगी, अब दूसरी महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर

Sarmi Didi Success Story

कभी दैनिक मजदूरी से चलता था परिवार, आज घर में ही बाग प्रिंट का कारोबार। स्वयं सहायता समूह और आजीविका मिशन से जुड़कर सरमी दीदी ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत।

गरीबी, सीमित संसाधन और रोजगार की कमी किसी के सपनों को रोक नहीं सकती, यदि मेहनत के साथ सही अवसर और मार्गदर्शन मिल जाए। मध्य प्रदेश के धार जिले के बाग प्रिंट क्षेत्र से जुड़ी सरमी दीदी की कहानी इसी विश्वास को मजबूत करती है। कभी परिवार का भरण-पोषण करने के लिए दैनिक मजदूरी पर निर्भर रहने वाली सरमी दीदी आज बाग प्रिंट का व्यवसाय चला रही हैं। इतना ही नहीं, अब वे दूसरी महिलाओं को भी इस कला का प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़ने का काम कर रही हैं।

मजदूरी से स्वरोजगार तक का सफर

सरमी दीदी का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल नहीं होने के बावजूद उनके माता-पिता ने उनकी शिक्षा को प्राथमिकता दी और उन्हें 12वीं कक्षा तक पढ़ाया। इसके बाद उनका विवाह धार जिले के ग्राम बाग क्षेत्र के निकट स्थित ग्राम आगर में हुआ। विवाह के बाद परिवार की आजीविका का प्रमुख साधन बाग प्रिंट कारखानों में दैनिक मजदूरी करके होने वाली कमाई थी। सीमित आय के कारण परिवार की जरूरतों को पूरा करना आसान नहीं था।

वर्ष 2017 में सरमी दीदी स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह के माध्यम से उन्हें छोटी-बड़ी ऋण सुविधाओं का लाभ मिला। इसी दौरान आजीविका मिशन के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होने का अवसर मिला। प्रशिक्षण ने उनके सामने स्वरोजगार की नई संभावनाएं खोलीं और उन्होंने पारंपरिक बाग प्रिंट कला को ही अपनी आजीविका बनाने का निर्णय लिया।

प्रशिक्षण ने दिखाई नई राह

बाग प्रिंट के व्यवसाय को शुरू करने के लिए सरमी दीदी ने समूह की अन्य महिलाओं को भी साथ जोड़ा। आजीविका मिशन के माध्यम से चयनित महिलाओं को एक महीने का प्रशिक्षण दिया गया। इसमें बाग प्रिंट से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं और उत्पाद तैयार करने की तकनीक सिखाई गई।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद सरमी दीदी ने अपने गांव में ही एक कच्ची झोपड़ी से बाग प्रिंट का काम शुरू किया। शुरुआत सीमित संसाधनों से हुई, लेकिन मेहनत, हुनर और आत्मविश्वास ने धीरे-धीरे कारोबार को आगे बढ़ाया।

उन्होंने बाग प्रिंट से साड़ियां, बेडशीट, सलवार-सूट और पर्दे जैसे उत्पाद तैयार करने शुरू किए। आजीविका मिशन के सहयोग से हाट-बाजारों और मेलों में इन उत्पादों की बिक्री होने लगी। इससे आमदनी बढ़ी और उनके परिवार को आर्थिक मजबूती मिलने लगी।

कच्ची झोपड़ी से पक्के कार्यस्थल तक

सरमी दीदी की मेहनत और व्यवसाय में प्रगति के साथ उनके काम का दायरा भी बढ़ा। संस्था के सहयोग से उन्हें पक्का मकान और बेहतर कार्यस्थल उपलब्ध हुआ, जहां अब वे पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से बाग प्रिंट का काम कर पा रही हैं।

इस बदलाव का असर केवल उनके घर तक सीमित नहीं रहा। समूह की दूसरी महिलाएं भी बाग प्रिंट के काम से जुड़ने लगीं। अब उन्हें रोजगार की तलाश में दूसरे स्थानों पर जाने की मजबूरी कम हुई है और वे अपने गांव में रहकर ही काम कर पा रही हैं।

सरमी दीदी के मुताबिक, वह और उनके पति मिलकर बाग प्रिंट का व्यवसाय संभालते हैं। इससे उनके परिवार की मासिक आय लगभग 20 से 25 हजार रुपये हो गई है। उनका कहना है कि अब परिवार पर कोई कर्ज नहीं है और उनके बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।

अब दूसरी महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर

सरमी दीदी की सफलता की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अपनी तरक्की को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा। अब वह आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को बाग प्रिंट का काम सिखाकर रोजगार से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उनका उद्देश्य है कि दूसरी महिलाएं भी अपने हुनर के दम पर कमाई कर सकें और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत बना सकें। उनका मानना है कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। समूह, प्रशिक्षण और आजीविका मिशन से मिले सहयोग ने उन्हें मजदूरी पर निर्भर रहने के बजाय अपना व्यवसाय खड़ा करने का अवसर दिया।

आत्मनिर्भर गांव की प्रेरक तस्वीर

सरमी दीदी की कहानी बताती है कि ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच और उचित सहयोग मिले, तो वे स्थानीय कला को रोजगार का मजबूत माध्यम बना सकती हैं। बाग प्रिंट जैसी पारंपरिक कला न केवल सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाती है, बल्कि गांव में रोजगार के अवसर भी पैदा करती है। आज सरमी दीदी अपने हुनर और मेहनत से परिवार को बेहतर जीवन देने के साथ दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं। उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि सही दिशा, आत्मविश्वास और सामूहिक प्रयास से एक महिला की सफलता पूरे गांव के लिए बदलाव का रास्ता खोल सकती है।

Exit mobile version