ऑपरेशन से प्रसव के बढ़ते मामले: प्राइवेट अस्पतालों में इस तरह बढ़ रहा सी-सेक्शन का चलन..इन चार राज्यों में सबसे सिजेरियन प्रसव

cesarean delivery

भारत में मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में सिजेरियन डिलीवरी यानी ऑपरेशन के जरिए प्रसव के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। खासकर निजी अस्पतालों में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जहां अब आधे से अधिक प्रसव सी-सेक्शन के माध्यम से कराए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे चिकित्सा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रसव संबंधी निर्णयों से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं।

  • ऑपरेशन से प्रसव के बढ़ते मामले
  • मातृत्व स्वास्थ्य के सामने नई चुनौती
  • प्राइवेट अस्पतालों में सी-सेक्शन का बढ़ता चलन
  • WHO मानकों से कहीं ऊपर पहुंचा आंकड़ा
  • कम और अधिक दोनों दरें चिंता का विषय
  • मां और शिशु स्वास्थ्य पर उठे सवाल

रिपोर्ट के अनुसार देश के निजी अस्पतालों में होने वाले लगभग 54 प्रतिशत प्रसव सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए हो रहे हैं। कई राज्यों में यह आंकड़ा बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। पश्चिम बंगाल के निजी अस्पतालों में लगभग 87.7 प्रतिशत प्रसव ऑपरेशन से हुए, जबकि तेलंगाना में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 66 प्रतिशत दर्ज किया गया। असम और ओडिशा जैसे राज्यों में भी निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव की दर 75 प्रतिशत से अधिक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सी-सेक्शन एक जीवनरक्षक प्रक्रिया है, लेकिन इसका उपयोग केवल चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार किसी भी देश में सिजेरियन प्रसव की आदर्श दर 10 से 15 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए। इससे अधिक दर यह संकेत दे सकती है कि कई मामलों में चिकित्सा आवश्यकता के बिना भी ऑपरेशन किए जा रहे हैं।

भारत में पिछले दो दशकों के आंकड़े इस बदलाव को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। वर्ष 2004-05 में देश में केवल 8.5 प्रतिशत प्रसव सी-सेक्शन के माध्यम से होते थे। यह आंकड़ा 2015-16 में बढ़कर 17.2 प्रतिशत हुआ, 2019-21 में 21.5 प्रतिशत तक पहुंचा और अब 2023-24 में 27.2 प्रतिशत दर्ज किया गया है। यह वृद्धि स्वास्थ्य नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों के लिए गंभीर विचार का विषय बन गई है।

हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में सिजेरियन प्रसव की दर अपेक्षाकृत कम है। पहली नजर में यह सकारात्मक लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञ इसे भी चिंता का विषय मानते हैं। उनका कहना है कि कई क्षेत्रों में आपातकालीन प्रसव सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण जरूरत पड़ने पर भी ऑपरेशन नहीं हो पाता। इससे मातृ और शिशु मृत्यु दर बढ़ने का जोखिम बना रहता है।

रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव की दर अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। पिछले लगभग दो दशकों में सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा 15.2 प्रतिशत से बढ़कर केवल 16.9 प्रतिशत तक पहुंचा है। इससे संकेत मिलता है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में ऑपरेशन का निर्णय अपेक्षाकृत अधिक चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर लिया जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि निजी अस्पतालों में बढ़ती सिजेरियन दर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें समय की सुविधा, अस्पताल प्रबंधन की नीतियां, कानूनी जोखिमों से बचाव और कुछ मामलों में आर्थिक लाभ भी शामिल बताए जाते हैं। हालांकि प्रत्येक ऑपरेशन को अनावश्यक नहीं कहा जा सकता, लेकिन अत्यधिक बढ़ती दरें स्वास्थ्य प्रणाली की समीक्षा की मांग अवश्य करती हैं।

रिपोर्ट में परिवार नियोजन और बच्चों के जन्म अंतराल से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आए हैं। देश में जन्म लेने वाले लगभग 66 प्रतिशत बच्चे परिवार के पहले बच्चे हैं। चौथे या उससे अधिक क्रम के बच्चों का प्रतिशत घटकर केवल 3.5 प्रतिशत रह गया है। यह दर्शाता है कि छोटे परिवार की अवधारणा तेजी से मजबूत हो रही है।

इसके अलावा 53.5 प्रतिशत दूसरे या उसके बाद जन्मे बच्चों के बीच कम से कम तीन वर्ष का अंतर पाया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के बीच पर्याप्त अंतर रखने से माताओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और बच्चों में कुपोषण, संक्रमण तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा कम हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर कुछ क्षेत्रों में अनावश्यक सिजेरियन प्रसव को नियंत्रित करना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर दूरदराज और पिछड़े इलाकों में जरूरतमंद महिलाओं को समय पर सुरक्षित प्रसव सेवाएं उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। संतुलित स्वास्थ्य नीति, प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी, बेहतर प्रसूति सुविधाएं और जागरूकता अभियान ही इस चुनौती का समाधान बन सकते हैं।

मातृत्व स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए आवश्यक है कि हर महिला को सुरक्षित, वैज्ञानिक और जरूरत आधारित प्रसव सुविधा उपलब्ध हो, ताकि मां और नवजात दोनों का स्वास्थ्य बेहतर बनाया जा सके।

Exit mobile version