एक छात्र के लिए आरक्षण पीढ़ियों से चले आ रहे भेदभाव का नतीजा है। वहीं दूसरे छात्र को यह सीमित कॉलेज सीटों या सरकारी नौकरियों के बीच वर्षों की तैयारी के बाद खड़ी एक बाधा के रूप में दिखाई देता है। दोनों को लग सकता है कि व्यवस्था ने उनके साथ न्याय नहीं किया। यही वजह है कि भारत में आरक्षण का मुद्दा इतना भावनात्मक और जटिल है और इसे केवल नारों के जरिए सुलझाना आसान नहीं है।
21 अगस्त को दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर यह तनाव दिखाई दिया, जब सैकड़ों लोग ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बैनर तले जुटे। नीट अभ्यर्थी हर्ष दुबे इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में नजर आए। सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और अनारक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने भी इस जुटान का समर्थन किया। दो दिन बाद करीब 300 प्रदर्शनकारी कनॉट प्लेस में जमा हुए। पुलिस की अनुमति नहीं होने के कारण 20 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया।
हालांकि नारा ‘आरक्षण हटाओ’ था, लेकिन प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों की मांग एक जैसी नहीं थी। कुछ लोग जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार को लागू करने की मांग कर रहे थे। कुछ की मांग क्रीमी लेयर के नियम, एक ही परिवार में बार-बार आरक्षण का लाभ मिलने पर रोक, पदोन्नति में आरक्षण में बदलाव और पूरी व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा की थी।यह अंतर महत्वपूर्ण है। आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने की मांग और मौजूदा व्यवस्था में सुधार की मांग करने वाले आंदोलन को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
आखिर युवाओं में आरक्षण को लेकर नाराजगी क्यों बढ़ रही है?
इस नाराजगी की बड़ी वजह युवाओं के बीच सीमित अवसरों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। लाखों विद्यार्थी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन प्रमुख संस्थानों में सीटों की संख्या सीमित है। सरकारी नौकरियों में बड़ी संख्या में आवेदन आते हैं, जबकि भर्ती में देरी, पेपर लीक और अदालती मामलों के कारण युवाओं की चिंता और बढ़ जाती है। जब अवसर कम होते हैं, तब उन्हें बांटने वाला हर नियम व्यक्तिगत महसूस होने लगता है। कोई विद्यार्थी कुछ अंकों के मामूली अंतर से दाखिला नहीं पा सका तो उसे लग सकता है कि इसकी वजह सिर्फ आरक्षण है। लेकिन इस सोच में एक बड़ी समस्या नजरअंदाज हो जाती है—भारत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थायी रोजगार के अवसरों का विस्तार युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं के अनुरूप तेजी से नहीं कर पाया है। छोटे अवसरों को बांटने के तरीके पर बहस करना आसान है, लेकिन यह पूछना ज्यादा कठिन है कि अवसरों की संख्या इतनी कम क्यों है।
क्या आरक्षण का आधार सिर्फ गरीबी होना चाहिए?
प्रदर्शनकारियों की आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग पहली नजर में काफी प्रभावशाली लगती है। अनारक्षित वर्ग का गरीब विद्यार्थी भी खराब स्कूली शिक्षा, आर्थिक दबाव और महंगी कोचिंग की समस्या झेल सकता है। यह कठिनाई वास्तविक है और उसे सरकारी सहायता मिलनी चाहिए।
लेकिन जाति आधारित आरक्षण केवल गरीबी दूर करने के उद्देश्य से शुरू नहीं किया गया था।
इसका उद्देश्य ऐतिहासिक वंचना, सामाजिक भेदभाव और शिक्षा, सरकारी रोजगार तथा निर्णय लेने वाली संस्थाओं में कुछ समुदायों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को भी दूर करना है। गरीबी और जातिगत पिछड़ापन एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन दोनों पूरी तरह समान नहीं हैं।
ऐतिहासिक रूप से वंचित जाति का आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति भी अपने उपनाम, समुदाय या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव का सामना कर सकता है। वहीं दूसरी ओर अनारक्षित समुदाय का गरीब विद्यार्थी गंभीर आर्थिक कठिनाइयों से गुजर सकता है, लेकिन उसके सामने जातिगत बहिष्कार का वही ऐतिहासिक अनुभव जरूरी नहीं है।
एक तरह की परेशानी को दूसरी परेशानी के अस्तित्व को नकारने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
भारत पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करता है। यह उन लोगों के लिए है जो मौजूदा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के दायरे में नहीं आते। इसलिए बहस अब इस बात पर नहीं है कि आर्थिक कमजोरी को मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि आर्थिक आधार को जाति आधारित आरक्षण के साथ जोड़ा जाए या उसकी जगह पूरी तरह लागू किया जाए।
क्या आरक्षण से योग्यता प्रभावित होती है?
आरक्षण के विरोध में सबसे आम तर्क यह दिया जाता है कि इससे योग्यता प्रभावित होती है। लेकिन योग्यता को केवल अंतिम परीक्षा में मिले अंकों से नहीं मापा जा सकता।
दो विद्यार्थी एक ही परीक्षा दे सकते हैं, लेकिन परीक्षा तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल अलग हो सकता है। एक विद्यार्थी ने बेहतर सुविधाओं वाले स्कूल में पढ़ाई की हो, निजी कोचिंग ली हो और घर में शांत माहौल में पढ़ाई की हो। दूसरा विद्यार्थी सीमित संसाधनों वाले स्कूल से आया हो, पहली पीढ़ी का शिक्षार्थी हो, उसके पास कम किताबें हों और घर पर पढ़ाई में मदद करने वाला कोई न हो।
अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे हमेशा यह नहीं बताते कि उन्हें हासिल करने के लिए विद्यार्थी ने किन बाधाओं को पार किया।
हालांकि सिर्फ यह दोहराना भी पर्याप्त नहीं है कि आरक्षण समानता को बढ़ावा देता है। इसकी व्यवस्था से जुड़े सवालों का जवाब भी जरूरी है। यदि आरक्षित वर्ग के भीतर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले परिवार ही बार-बार अधिकतर अवसर हासिल करते रहें, तो उसी वर्ग के सबसे गरीब और वंचित लोगों को लाभ से बाहर रहना पड़ सकता है।
इसलिए असली सवाल ‘योग्यता या आरक्षण’ का नहीं है। सवाल यह है कि भारत असमान शुरुआती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योग्यता को कैसे पहचान सकता है।
क्या क्रीमी लेयर का सिद्धांत रास्ता दिखा सकता है?
क्रीमी लेयर का सिद्धांत पहले से ही अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में लागू है। इसके तहत समुदाय के अपेक्षाकृत संपन्न और आगे बढ़ चुके वर्गों को कुछ लाभों से बाहर रखा जाता है, ताकि अवसर उन लोगों तक पहुंच सकें जो अभी भी पिछड़े हुए हैं।
अब कुछ प्रदर्शनकारी इसी तरह का नियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित अन्य वर्गों में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं।
इस मांग पर चर्चा हो सकती है, लेकिन यह कानूनी और सामाजिक रूप से जटिल विषय है। किसी परिवार की आय बढ़ जाने से जातिगत भेदभाव अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। केवल आय के आधार पर बनाई गई नीति लगातार जारी सामाजिक वंचना को पूरी तरह पहचानने में असफल हो सकती है।
एक अधिक व्यावहारिक सुधार यह हो सकता है कि नए और विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर यह पता लगाया जाए कि किन समुदायों और उप-वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है और कौन अब भी पीछे रह गए हैं। आरक्षित वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण से लाभ का अधिक न्यायपूर्ण वितरण संभव हो सकता है, लेकिन इसके लिए विश्वसनीय आंकड़े और सावधानी जरूरी होगी। इसे राजनीतिक सुविधा के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए।
क्या ‘एक परिवार, एक बार आरक्षण’ का नियम काम करेगा?
मांग सरल लगती है—यदि परिवार के एक सदस्य को आरक्षण के जरिए अवसर मिल गया है, तो उसके बाद परिवार को लगातार आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। लेकिन आरक्षण केवल किसी परिवार को दी जाने वाली आर्थिक सहायता नहीं है। यह प्रतिनिधित्व बढ़ाने का माध्यम भी है। किसी एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसके परिवार के हर बच्चे और रिश्तेदार को सामाजिक समानता हासिल हो गई। फिर भी यह मांग एक वास्तविक चिंता को सामने लाती है—आरक्षण का लाभ कहीं लंबे समय तक समाज के एक छोटे हिस्से तक ही सीमित न रह जाए और सबसे ज्यादा वंचित लोग उससे बाहर न रह जाएं। पूरी तरह एक बार की सीमा लगाने के बजाय बेहतर लक्ष्यीकरण, जहां संवैधानिक रूप से संभव हो वहां मजबूत क्रीमी लेयर व्यवस्था, बेहतर छात्रवृत्ति और पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों को प्राथमिकता जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है।
आंदोलन के सामने एक स्पष्ट मांग का अभाव भी चुनौती
वर्तमान प्रदर्शन के सामने एक और समस्या है—एक स्पष्ट और विस्तृत कार्यक्रम का अभाव।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद हर्ष दुबे ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात की। कुछ साथी प्रदर्शनकारियों ने व्यापक सलाह के बिना हुई इस मुलाकात पर सवाल उठाया और कहा कि किसी एक व्यक्ति को आंदोलन का स्वामित्व अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए।
यह विवाद सोशल मीडिया आधारित आंदोलन की एक कमजोरी दिखाता है। कोई अभियान लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन उसके पास लोकतांत्रिक नेतृत्व, साझा मांगों का दस्तावेज और सरकार के साथ बातचीत की स्पष्ट रणनीति न हो, ऐसा संभव है।
यदि एक समूह पूरी तरह आरक्षण खत्म करने की मांग करे, दूसरा आर्थिक आरक्षण की मांग करे और तीसरा मौजूदा जाति आधारित आरक्षण में सुधार चाहता हो, तो सरकार नाराजगी को स्वीकार करते हुए भी किसी निश्चित कदम के लिए प्रतिबद्ध होने से बच सकती है। एक गंभीर आंदोलन को वायरल हैशटैग से आगे बढ़कर संवैधानिक समझ, विश्वसनीय आंकड़ों और स्पष्ट प्रस्तावों की जरूरत होती है।
आरक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के सामने भी बड़ी चुनौती
ज्यादातर राजनीतिक दल इस आंदोलन को लेकर सावधानी बरतेंगे। जाति आधारित आरक्षण को खुले तौर पर खत्म करने का समर्थन करना अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की बड़ी आबादी को नाराज कर सकता है। वहीं अनारक्षित वर्ग के उन विद्यार्थियों की शिकायतों को पूरी तरह नजरअंदाज करना, जो खुद को अनसुना महसूस कर रहे हैं, उनकी नाराजगी को और बढ़ा सकता है।
इसी कारण राजनीतिक दल सहानुभूति जताने तक सीमित रह सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करेंगे कि वे वास्तव में व्यवस्था में क्या बदलाव करना चाहते हैं।
सरकार बातचीत, समिति या समीक्षा का आश्वासन दे सकती है। विपक्ष युवाओं की समस्याओं को लेकर सरकार पर हमला कर सकता है। लेकिन मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने के समर्थन में बहुत कम नेता सामने आने की संभावना है, क्योंकि आरक्षण सामाजिक न्याय के साथ-साथ भारत की चुनावी राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। आंदोलन से खतरा यह है कि नीति को लेकर जायज सवाल कहीं समुदायों के बीच टकराव में न बदल जाएं।
बहस ‘आरक्षण हटाओ’ बनाम ‘आरक्षण बचाओ’ तक सीमित नहीं होनी चाहिए
भारत में आरक्षण की बहस लंबे समय से दो चरम नारों के बीच फंसी हुई है—‘आरक्षण हटाओ’ और ‘आरक्षण को मत छुओ’। इनमें से कोई भी नारा पूरी समस्या का समाधान नहीं करता।
ऐतिहासिक असमानता को दूर करने के लिए बनाई गई व्यवस्था हमेशा समीक्षा से बाहर नहीं रह सकती। लेकिन केवल यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि सात दशक बीत जाने के बाद जातिगत भेदभाव समाप्त हो गया है और इसलिए आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए।
प्रदर्शनकारी यह सवाल उठाने में सही हैं कि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। वहीं आरक्षण के समर्थक भी यह कहने में सही हैं कि सामाजिक भेदभाव और असमान प्रतिनिधित्व आज भी वास्तविक समस्याएं हैं। समाधान न तो यह मानने में है कि मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह सही है और न ही हर निराश विद्यार्थी की परेशानी का कारण आरक्षण को बता देने में।
आज भारत का युवा केवल आरक्षण को लेकर संघर्ष नहीं कर रहे हैं। वे शिक्षा और रोजगार के लगातार संकुचित होते अवसरों को लेकर भी चिंतित हैं। जब तक अवसरों का दायरा नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक कतार में खड़े लोगों के क्रम को बदलने से नाराजगी खत्म नहीं होगी।