छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में तारा कोयला ब्लॉक की नीलामी ने एक पुराने विवाद को फिर सामने ला दिया है। एक तरफ कोयला खनन से राज्य को राजस्व और रोजगार मिलने का तर्क है, तो दूसरी तरफ वन, जैव विविधता, आदिवासी आजीविका और हाथियों के आवागमन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2023 में तारा ब्लॉक को नीलामी से बाहर रखने की मांग राज्य सरकार ने खुद की थी, जबकि दिसंबर 2025 में राज्य सरकार ने केंद्र को इसे नीलामी में शामिल करने की अनुमति दी।
1. 2023 में जिस ब्लॉक पर रोक की मांग, 2026 में उसी की नीलामी
तारा कोल ब्लॉक को 2023 में व्यावसायिक कोयला खदान नीलामी के सातवें चरण में शामिल किया गया था। उस समय छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य के कोयला ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने का आग्रह किया था। इसके बाद तारा समेत कई ब्लॉकों को नीलामी प्रक्रिया से हटा दिया गया। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। 11 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर तारा ब्लॉक को नीलामी में शामिल करने का अनुरोध किया। केंद्र के मुताबिक राज्य ने तब कहा था कि संशोधित तारा ब्लॉक लेमरू हाथी गलियारे के बाहर है। इसके बाद केंद्रीय खनन योजना एवं डिजाइन संस्थान यानी सीएमपीडीआईएल ने ब्लॉक की सीमा में बदलाव किया और इसे 15वें दौर की व्यावसायिक नीलामी में शामिल किया गया। यही 2023 और 2025 के सरकारी रुख का अंतर मौजूदा राजनीतिक विवाद की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।
2. 37.50 प्रतिशत राजस्व हिस्सेदारी का मतलब क्या?
तारा संशोधित कोल ब्लॉक को नीलामी में 37.50 प्रतिशत राजस्व हिस्सेदारी पर सफलतापूर्वक आवंटित किया गया। केंद्र के अनुसार नीलामी में नौ बोलियां मिलीं। सरकार का अनुमान है कि इससे छत्तीसगढ़ को सालाना 1,200 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व मिल सकता है और 8,000 से ज्यादा रोजगार पैदा हो सकते हैं। यानी सरकार के आर्थिक तर्क में यह सिर्फ कोयला निकालने की परियोजना नहीं, बल्कि राजस्व और रोजगार से जुड़ा औद्योगिक अवसर है। लेकिन दूसरी तरफ पर्यावरण समूहों का सवाल है कि आर्थिक लाभ का आकलन करते समय जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले दीर्घकालीन प्रभाव को किस तरह शामिल किया जाएगा।
3. हाथी कॉरिडोर बना सबसे बड़ा विवाद
तारा ब्लॉक को लेकर सबसे संवेदनशील मुद्दा लेमरू हाथी कॉरिडोर है। केंद्र सरकार का वर्तमान पक्ष है कि संशोधित तारा ब्लॉक की सीमा से लेमरू हाथी कॉरिडोर का प्रभाव क्षेत्र हटा दिया गया है और राज्य सरकार ने भी इसे कॉरिडोर से बाहर बताया था। वहीं पर्यावरण कार्यकर्ताओं और हसदेव बचाओ समूहों का तर्क है कि हसदेव का वन परिदृश्य केवल नक्शे पर खींची गई किसी एक सीमा तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि जंगलों के बीच खनन और बुनियादी ढांचे का विस्तार हाथियों के आवागमन तथा मानव-हाथी संघर्ष को प्रभावित कर सकता है। इन समूहों ने नीलामी रद्द करने की मांग की है। इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि तारा ब्लॉक कॉरिडोर के अंदर है या बाहर, बल्कि यह भी है कि खनन परियोजना के व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव का आकलन किस आधार पर होगा।
4. 2,400 हेक्टेयर का आंकड़ा क्यों अहम?
2023 की नीलामी से संबंधित कोयला मंत्रालय के दस्तावेजों में तारा ब्लॉक का क्षेत्रफल करीब 2,400 हेक्टेयर बताया गया था। उसी दस्तावेज में ब्लॉक की सीमा, वन क्षेत्र और खनन पद्धति से जुड़े सवाल भी दर्ज हैं। अब 2026 में जिस ‘तारा रिवाइज्ड’ ब्लॉक की नीलामी हुई है, उसकी सीमा पहले वाली स्थिति से बदली गई है। इसलिए पुराने 2,400 हेक्टेयर के आंकड़े को वर्तमान संशोधित ब्लॉक की अंतिम सीमा मान लेना उचित नहीं होगा। यही वह बिंदु है जहां बहस में पुराने तारा ब्लॉक और संशोधित तारा ब्लॉक के बीच अंतर करना जरूरी है।
5. विधानसभा के पुराने संकल्प से टकराव का सवाल
हसदेव विवाद का राजनीतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जुलाई 2022 में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने हसदेव अरण्य में आवंटित कोयला खदानों को रद्द करने की मांग वाला सर्वसम्मत शासकीय संकल्प पारित किया था। बाद में 2023 में राज्य सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर नौ ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने का आग्रह भी किया। इसी पुराने रिकॉर्ड को आधार बनाकर विरोधी दल और पर्यावरण संगठन पूछ रहे हैं कि जब विधानसभा का संकल्प मौजूद है और 2023 में राज्य सरकार का रुख भी अलग था, तो 2025 में तारा को नीलामी के लिए वापस लाने का आधार क्या बना? जवाब है कि परिस्थितियां बदलीं, राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में तारा को हाथी कॉरिडोर से बाहर बताते हुए नीलामी के लिए अनुरोध किया और ब्लॉक की सीमा संशोधित की गई।
6. केंद्र का पर्यावरण संबंधी तर्क भी सामने
यह भी महत्वपूर्ण है कि कोयला मंत्रालय ने 2023 में कहा था कि कोयला ब्लॉकों की पहचान करते समय राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, ईको-सेंसिटिव जोन और वन्यजीव गलियारों जैसे क्षेत्रों को लेकर सुरक्षा मानकों और पर्यावरण मंत्रालय के निर्णय समर्थन तंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। मंत्रालय ने तारा ब्लॉक के चयन को हसदेव-अरण्य की जैव विविधता संबंधी अध्ययन की सिफारिशों से भी जोड़ा था। यानी सरकारी पक्ष का तर्क है कि खनन का मतलब अनिवार्य रूप से पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी नहीं है। लेकिन परियोजना के वास्तविक प्रभाव का आकलन आगे की वन और पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रियाओं में होगा।
7. अब असली लड़ाई नीलामी से आगे की है
तारा ब्लॉक की नीलामी हो चुकी है, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि खनन तुरंत शुरू हो जाएगा। वास्तविक खनन के लिए संबंधित वन, पर्यावरण, भूमि और अन्य वैधानिक स्वीकृतियों की प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण होंगी। यही वजह है कि आने वाले समय में बहस तीन स्तरों पर दिखाई दे सकती है—
आर्थिक सवाल: कितना राजस्व और रोजगार मिलेगा?
पर्यावरणीय सवाल: जंगल और वन्यजीवों पर वास्तविक प्रभाव कितना होगा?
कानूनी-राजनीतिक सवाल: 2022 के विधानसभा संकल्प और बाद में बदले सरकारी रुख को कैसे देखा जाए? हसदेव का तारा कोल ब्लॉक अब केवल कोयला नीलामी का मामला नहीं रह गया है। यह सरकारी नीति में बदलाव, विधानसभा के पुराने संकल्प, राज्य-केंद्र के बीच हुए पत्राचार और जंगल तथा वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल बन चुका है। एक तरफ केंद्र का आधिकारिक पक्ष है कि संशोधित तारा ब्लॉक लेमरू हाथी गलियारे के प्रभाव क्षेत्र को हटाकर नीलाम किया गया है और इससे राज्य को 1,200 करोड़ रुपये से ज्यादा सालाना राजस्व तथा 8,000 से अधिक रोजगार मिल सकते हैं। दूसरी तरफ पर्यावरण संगठन और विपक्षी नेता इसे हसदेव के जंगल और हाथी आवागमन पर संभावित असर से जोड़ते हुए नीलामी पर सवाल उठा रहे हैं। इसलिए हसदेव की असली कहानी अब ‘कोयला चाहिए या जंगल’ जैसी दो ध्रुवीय बहस से आगे है—सवाल यह है कि विकास, राजस्व, आदिवासी हित और पारिस्थितिकी के बीच व्यावहारिक संतुलन किस तरह तय किया जाता है।