देश में पिछले साढ़े तीन साल तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी से दूरी बनाए रखने वाला रिजर्व बैंक अब एक बार फिर महंगाई के मोर्चे पर सख्त नजर आ रहा है। मौद्रिक नीति समिति के फैसले में रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया गया है। यानी अब सस्ता कर्ज मिलने की उम्मीद पर फिलहाल ब्रेक लग गया है और आने वाले समय में होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ईएमआई पर दबाव बढ़ सकता है।
- साढ़े तीन साल बाद RBI का बड़ा फैसला
- रेपो रेट बढ़ा, अब 5.50 फीसदी
- महंगाई ने बढ़ाई RBI की चिंता
- आगे कटौती नहीं, बढ़ोतरी का विकल्प खुला
- महंगाई काबू में तो दरें रहेंगी स्थिर
दरअसल, RBI के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह महंगाई को लेकर बढ़ती चिंता है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ संकेत दिया है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल महंगाई का माहौल उतना अनुकूल नहीं है। अगले तीन तिमाहियों में खुदरा महंगाई औसतन करीब 5.8 फीसदी रहने का अनुमान अपने आप में बड़ा संकेत है। यानी RBI अब महंगाई को लेकर जोखिम लेने के मूड में नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आगे ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर हो गई है। RBI के सामने अब मोटे तौर पर दो रास्ते हैं। पहला, अगर महंगाई का दबाव और बढ़ता है तो रेपो रेट में फिर बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरा, अगर महंगाई नियंत्रित रहती है तो मौजूदा 5.50 फीसदी की दर को कुछ समय तक बरकरार रखा जा सकता है।
यानी फिलहाल कटौती का रास्ता बंद दिखाई दे रहा है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां रफ्तार बनाए हुए हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर दोनों में विस्तार देखने को मिल रहा है। निजी खपत और निवेश भी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं।
लेकिन RBI के लिए चुनौती यही है कि विकास की रफ्तार और महंगाई के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अगर महंगाई लगातार बढ़ती है तो ब्याज दरों को ऊंचा रखना जरूरी हो सकता है। इससे कर्ज महंगा होगा, लेकिन कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। वहीं बहुत ज्यादा सख्ती आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार को प्रभावित कर सकती है।
आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब है कि आने वाले महीनों में EMI राहत की उम्मीद कम हो गई है। नए कर्ज लेने वालों के लिए ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं और पुराने फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की लागत भी बढ़ सकती है। यानी RBI का संदेश साफ है—अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन महंगाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिलहाल ब्याज दरों में कटौती की बजाय दरों को ऊंचा रखने या जरूरत पड़ने पर और बढ़ाने का विकल्प खुला है।