मैसूर का शाही वैभव, कुल्लू का देव मिलन, बस्तर की 75 दिनों की परंपरा, कोलकाता की दुर्गा पूजा और कोटा का विशाल रावण दहन। एक ही पर्व, लेकिन हर जगह अलग कहानी। आखिर भारत में दशहरे की परंपराएं इतनी अलग क्यों हैं?
रावण का नाम आते ही आमतौर पर दस सिरों वाले उस राजा की तस्वीर सामने आती है, जिसका भगवान राम ने वध किया था। दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है और इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में दशहरे की कहानी केवल रावण के दहन तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में विजयादशमी का स्वरूप इतना अलग है कि पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो सकता है।
कहीं दशहरा राजसी शान और परंपरा का प्रदर्शन है, कहीं सैकड़ों देवी-देवताओं का मिलन, कहीं आदिवासी संस्कृति का महापर्व और कहीं मां दुर्गा की विदाई का भावुक अवसर। भारत के पांच प्रमुख दशहरा उत्सव बताते हैं कि एक ही पर्व को देश के अलग-अलग हिस्सों ने अपनी मान्यताओं, इतिहास और संस्कृति के अनुसार कैसे विशिष्ट पहचान दी है।
मैसूर: जहां दशहरा बन जाता है राजसी उत्सव
कर्नाटक के मैसूर का दशहरा दुनिया भर में अपनी भव्यता के लिए जाना जाता है। यहां दशहरे की परंपरा को राजपरिवार और चामुंडेश्वरी देवी की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। वर्ष 1610 में राजा वाडियार प्रथम के शासनकाल में इस उत्सव को राजकीय स्वरूप मिलने का उल्लेख मिलता है।
विजयादशमी के दिन निकलने वाली जंबू सवारी इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण है। सजे-धजे हाथी, पारंपरिक वाद्ययंत्र, लोककलाकार और सांस्कृतिक झांकियां इस शोभायात्रा को भव्य बनाते हैं। दूसरी ओर, रोशनी से जगमगाता मैसूर पैलेस पूरे उत्सव की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है।
यहां दशहरा केवल रावण पर राम की विजय का उत्सव नहीं, बल्कि राजपरंपरा, शक्ति उपासना और कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन भी है। मैसूर ने सदियों पुरानी परंपरा को इस तरह सहेजा है कि वह आज पर्यटन और स्थानीय पहचान का बड़ा आधार बन चुकी है।
कुल्लू: जहां रावण नहीं, देवताओं का मिलन है खास
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे की शुरुआत विजयादशमी के दिन होती है। जब देश के कई हिस्सों में रावण दहन की तैयारी होती है, तब कुल्लू के ढालपुर मैदान में देवी-देवताओं की पालकियां जुटने लगती हैं।
यहां भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले देवी-देवताओं का समागम उत्सव की आत्मा है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, रंग-बिरंगी पालकियां और स्थानीय रीति-रिवाज इस आयोजन को अनूठा बनाते हैं। सात दिनों तक चलने वाला अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा धार्मिक आस्था के साथ हिमाचली लोकसंस्कृति का भी बड़ा मंच है।
कुल्लू की विशेषता यह है कि यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन मुख्य परंपरा नहीं है। यहां उत्सव का केंद्र भगवान रघुनाथ और देव परंपराओं से जुड़ा सामुदायिक मिलन है।
यह अंतर बताता है कि विजयादशमी का उत्सव हर जगह एक ही तरीके से नहीं मनाया जाता। स्थानीय इतिहास और धार्मिक मान्यताएं किसी पर्व को अलग स्वरूप दे सकती हैं।
बस्तर: 75 दिनों का दशहरा, लेकिन रावण दहन नहीं
छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा भारत की सबसे अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। इसकी अवधि लगभग 75 दिनों तक बताई जाती है। इसकी जड़ें बस्तर की आदिवासी संस्कृति, स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना और ऐतिहासिक राजपरंपरा में हैं।
यहां दशहरे का केंद्र मां दंतेश्वरी हैं। विशाल लकड़ी के रथ, पारंपरिक अनुष्ठान, देवी-देवताओं का आगमन और विभिन्न समुदायों की भागीदारी इस उत्सव को खास बनाती है। यहां रावण दहन नहीं होता, क्योंकि बस्तर दशहरे का स्वरूप राम-रावण युद्ध की कथा पर आधारित नहीं है।
बस्तर की यह परंपरा एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाती है। क्या दशहरे का अर्थ केवल रावण का पुतला जलाना है? बस्तर का जवाब है—नहीं। किसी पर्व की पहचान उसके पीछे मौजूद समाज, इतिहास और आस्था से भी बनती है।
यहां दशहरा स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखता है।
कोलकाता: जहां मां दुर्गा की विदाई है विजयादशमी का भावुक पल
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दशहरे का प्रमुख स्वरूप दुर्गा पूजा है। विशाल पंडाल, कलात्मक प्रतिमाएं, रोशनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लाखों श्रद्धालुओं की भागीदारी इस आयोजन को देश-दुनिया में प्रसिद्ध बनाती है।
यहां मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी पर सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। भक्तों के लिए यह विदाई का भावुक अवसर होता है, जिसमें अगले वर्ष मां के फिर आगमन की कामना की जाती है।
कोलकाता में रावण दहन दशहरे का केंद्रीय आकर्षण नहीं है। यहां देवी शक्ति की आराधना, सामुदायिक सहभागिता और मां दुर्गा के स्वागत से लेकर विदाई तक की परंपराएं पर्व को विशेष बनाती हैं।
इस तरह बंगाल की दुर्गा पूजा यह संदेश देती है कि शक्ति की उपासना भी विजयादशमी के व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक भाव का अहम हिस्सा है।
कोटा: जहां रावण दहन बनता है विशाल जनउत्सव
राजस्थान के कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला उन आयोजनों में शामिल है, जहां रावण दहन की परंपरा भव्य रूप में दिखाई देती है। यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले तैयार किए जाते हैं। विजयादशमी पर इनके दहन के साथ भगवान राम की विजय का संदेश दिया जाता है।
लेकिन कोटा का दशहरा केवल पुतले जलाने तक सीमित नहीं है। कई दिनों तक चलने वाले मेले में लोककलाएं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, व्यापारिक गतिविधियां, झूले और मनोरंजन के अनेक आयोजन होते हैं। मेले की अवधि कार्यक्रम के अनुसार बदल सकती है, लेकिन इसकी पहचान एक बड़े जनउत्सव के रूप में बनी हुई है।
कोटा का दशहरा धार्मिक परंपरा और स्थानीय अर्थव्यवस्था के मेल का उदाहरण है। यह पर्व व्यापारियों, कलाकारों, दुकानदारों और पर्यटकों के लिए भी अवसर पैदा करता है।
यहां रावण दहन उस पारंपरिक संदेश को सामने रखता है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, उनका अंत निश्चित है।
आखिर रावण के दहन से आगे क्या है दशहरे का संदेश?
मैसूर, कुल्लू, बस्तर, कोलकाता और कोटा के दशहरे को साथ रखकर देखें तो एक बात साफ होती है—भारत में विजयादशमी का कोई एक जैसा स्वरूप नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों ने इसे अपने इतिहास, आस्था और सामाजिक परंपराओं के अनुसार अपनाया है।
मैसूर में राजसी विरासत, कुल्लू में देव मिलन, बस्तर में आदिवासी संस्कृति, कोलकाता में शक्ति आराधना और कोटा में रावण दहन प्रमुख है। इनके आयोजन अलग हैं, लेकिन सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने और समाज को जोड़ने का भाव इनमें साझा दिखाई देता है।
रावण का दहन हमें अपने भीतर के अहंकार और बुराइयों को पहचानने की सीख देता है। वहीं, दशहरे के दूसरे रूप यह याद दिलाते हैं कि संस्कृति किसी एक कथा, एक रीति या एक उत्सव पद्धति में कैद नहीं होती।
दशहरे की असली खूबसूरती यही है—कहीं रावण जलता है, कहीं देवी-देवता मिलते हैं, कहीं मां दुर्गा विदा होती हैं और कहीं सदियों पुरानी आदिवासी परंपराएं जीवंत हो उठती हैं। उत्सव अनेक हैं, लेकिन अपनी विरासत को सहेजने का संकल्प साझा है।





