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Ratlam Mahalaxmi Temple: रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर में सजता है करोड़ों का खजाना, दिवाली पर असली सोने-चांदी के गहनों से होता है मां का श्रृंगार

DigitalDesk by DigitalDesk
November 5, 2026
in धर्म, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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Ratlam Mahalaxmi Temple: रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर में सजता है करोड़ों का खजाना, दिवाली पर असली सोने-चांदी के गहनों से होता है मां का श्रृंगार
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मध्य प्रदेश के रतलाम में स्थित महालक्ष्मी मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां दिवाली के अवसर पर मां महालक्ष्मी का दरबार फूलों और सजावट के साथ-साथ असली सोने-चांदी के गहनों, हीरे-जवाहरात और करोड़ों रुपये की नकदी से सजाया जाता है। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। खास बात यह है कि भक्त मंदिर में अपने कीमती आभूषण और नकदी भेंट के रूप में जमा करते हैं। मंदिर में इन सभी चीजों का रिकॉर्ड रखा जाता है और सुरक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन तथा ओटीपी की व्यवस्था अपनाई जाती है। दिवाली के पांच दिनों तक इसी धन और आभूषणों से मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद पांचवें दिन श्रद्धालुओं को उनका सामान प्रसाद के रूप में वापस लौटा दिया जाता है। यही अनोखी परंपरा रतलाम के इस मंदिर को देश के दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है।

मध्य प्रदेश के रतलाम में कहां स्थित है महालक्ष्मी का अनोखा मंदिर?
रतलाम शहर के माणक चौक क्षेत्र में स्थित महालक्ष्मी मंदिर दिवाली के समय विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। सामान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं, लेकिन दीपावली के अवसर पर मंदिर का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। इस दौरान मां का दरबार सोने-चांदी के आभूषणों और नकदी से सजाया जाता है।

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करीब 300 साल पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास
इस मंदिर को लगभग 300 साल पुराना बताया जाता है। यह रतलाम के रियासतकालीन इतिहास से जुड़ा हुआ है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, रतलाम के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौर के समय से यहां दिवाली पर विशेष पूजा और धन अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है।

महाराजा रतन सिंह राठौर से जुड़ी है धन चढ़ाने की परंपरा
कहा जाता है कि महाराजा रतन सिंह राठौर दिवाली के अवसर पर शाही खजाने से सोने-चांदी के आभूषण निकालकर मां महालक्ष्मी के श्रृंगार के लिए अर्पित करते थे। राजा अपनी प्रजा की खुशहाली, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए पांच दिनों तक यह विशेष पूजा करवाते थे। स्थानीय मान्यता के अनुसार, धीरे-धीरे यही परंपरा आम श्रद्धालुओं से जुड़ गई और लोग भी अपने गहने व नकदी मंदिर में देने लगे।

असली सोने-चांदी और नोटों से सजाया जाता है मां का दरबार
दिवाली के दौरान मंदिर में भक्तों द्वारा दिए गए नोटों की गड्डियों, सोने-चांदी के आभूषणों, हीरे और जवाहरात से सजावट की जाती है। नोटों से फूल, गुलदस्ते और अन्य सजावटी आकृतियां बनाई जाती हैं। सोने-चांदी के गहनों से मां का विशेष श्रृंगार होता है। पांच दिनों तक मंदिर का यह अनोखा रूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

रजिस्ट्रेशन और ओटीपी से रखा जाता है धन का हिसाब
श्रद्धालु अपनी इच्छा से नकदी और आभूषण मंदिर में जमा कराते हैं। इस सामान को स्वीकार करते समय रजिस्ट्रेशन और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था की जाती है। हाल के वर्षों में ऑनलाइन पंजीकरण और ओटीपी के जरिए पहचान की प्रक्रिया भी अपनाई गई है। इससे जमा किए गए सामान का हिसाब रखने और उसे सही व्यक्ति तक वापस पहुंचाने में मदद मिलती है।

पांच दिन बाद भक्तों को वापस मिलता है उनका धन और जेवर
इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि श्रद्धालुओं के दिए गहने और रुपये स्थायी रूप से दान में नहीं रखे जाते। दीपोत्सव की परंपरा पूरी होने के बाद उन्हें वापस लौटा दिया जाता है। कई वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था में भक्तों को अपना सामान प्रसाद के रूप में मिलता है। कुछ श्रद्धालु वापस मिले नोटों या आभूषणों को घर की तिजोरी में संभालकर रखते हैं।

क्या है मंदिर की मान्यता और कुबेर पोटली का महत्व?
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां महालक्ष्मी के श्रृंगार में शामिल होने वाला धन घर में सुख-समृद्धि और बरकत लाता है। कुछ भक्त लौटाए गए रुपये और गहनों को शुभ मानकर सुरक्षित रखते हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, श्रद्धालुओं को पूजा सामग्री और माता के स्पर्श वाला सिक्का शामिल कर कुबेर पोटली भी दी जाती है। इसे भक्त धन और समृद्धि के प्रतीक के रूप में घर या व्यापार स्थल पर रखते हैं। ये धार्मिक आस्था और मान्यताएं हैं।

दिवाली के अलावा भी आते हैं श्रद्धालु
महालक्ष्मी मंदिर में सामान्य दिनों में भी भक्त दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं, लेकिन दिवाली के पांच दिवसीय उत्सव में यहां विशेष भीड़ रहती है। इस दौरान रतलाम के अलावा मध्य प्रदेश के दूसरे जिलों, गुजरात और राजस्थान सहित अन्य स्थानों से भी श्रद्धालु आते हैं। भक्त मां के दर्शन करते हैं और इस अनोखे श्रृंगार को देखते हैं। यही वजह है कि माणक चौक का यह मंदिर दीपावली के समय रतलाम की खास धार्मिक पहचान बन जाता है।

 

 

 

 

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