Raksha Bandhan रक्षाबंधन विज्ञापन पर बवाल: कृति सेनन के पहनावे पर कंगना की टिप्पणी, उठे सवाल- हिंदू त्योहारों पर ही विवाद क्यों?

कृति सेनन इन दिनों अपनी फिल्म ‘कॉकटेल 2’ और एक रक्षाबंधन विज्ञापन को लेकर चर्चा में हैं। नेटफ्लिक्स पर फिल्म के ट्रेंड करने के बीच उनका एक ज्वेलरी ब्रांड का रक्षाबंधन एड सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया। विज्ञापन में कृति के पहनावे और त्योहार को पेश करने के तरीके पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। मामला तब और चर्चा में आ गया, जब कंगना रनौत ने बिना नाम लिए विज्ञापन को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

बिकिनी टॉप में राखी बांधने के सीन पर कंगना ने उठाए सवाल

कंगना ने सोशल मीडिया स्टोरी में लिखा कि आज महिलाओं के पास कपड़ों के कई विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने साड़ी, लहंगा-चोली, जींस, कॉकटेल ड्रेस, बिकिनी और सलवार-कमीज जैसे विकल्पों का जिक्र करते हुए सवाल किया कि भाई को राखी बांधने के लिए बिकिनी या इस तरह के पहनावे को ही क्यों चुना गया। कंगना ने विज्ञापन की प्रस्तुति को लेकर इसे जानबूझकर आपत्तिजनक बनाए जाने की बात भी कही। हालांकि उन्होंने अपनी पोस्ट में कृति का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया।

विज्ञापन में पालतू कुत्ते को राखी बांधने का दृश्य भी बना विवाद की वजह

इस विज्ञापन में एक दृश्य ऐसा भी है, जिसमें पालतू कुत्ते को राखी बांधते हुए दिखाया गया है। इस हिस्से को लेकर भी सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए। आलोचकों का कहना है कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार को आधुनिक विज्ञापन की प्रस्तुति में इस तरह दिखाने से उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक भावना प्रभावित हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, विज्ञापन को लेकर यह तर्क भी दिया जा सकता है कि कंपनियां त्योहारों को नए अंदाज में पेश करके युवा दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करती हैं।

सवाल सिर्फ एक विज्ञापन का नहीं, त्योहारों की प्रस्तुति को लेकर भी बहस तेज

इस विवाद के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़ा सवाल भी उठ रहा है—क्या भारतीय त्योहारों को विज्ञापनों और मनोरंजन की दुनिया में पेश करते समय संवेदनशीलता का समान पैमाना अपनाया जाता है? होली, दिवाली और रक्षाबंधन जैसे हिंदू त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों या प्रस्तुतियों पर विवाद सामने आने के बाद अक्सर धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर बहस शुरू हो जाती है।

इसी संदर्भ में कुछ लोग यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि क्या दूसरे धर्मों के प्रमुख त्योहारों, जैसे बकरीद, से जुड़े विज्ञापनों या प्रस्तुतियों में भी इसी तरह के मानदंड लागू किए जाते हैं? हालांकि इस एक मामले के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी खास धर्म के त्योहारों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन विज्ञापन जगत में सांस्कृतिक संवेदनशीलता के समान मानदंड को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

त्योहारों की आधुनिकता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन जरूरी

त्योहार बदलते समय के साथ नए रूपों में लोगों तक पहुंच रहे हैं। ब्रांड सोशल मीडिया और विज्ञापनों के जरिए युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए अलग-अलग रचनात्मक तरीके अपनाते हैं। लेकिन जब किसी विज्ञापन में धार्मिक त्योहार, परंपरा या प्रतीकों का इस्तेमाल होता है, तो रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता का संतुलन भी जरूरी हो जाता है।

रक्षाबंधन का मूल भाव भाई-बहन के रिश्ते, स्नेह और विश्वास से जुड़ा है। ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आधुनिक कपड़े पहनना सही है या गलत, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या किसी त्योहार की भावना को विज्ञापन में दिखाते समय उसकी गरिमा और सांस्कृतिक संदर्भ का ध्यान रखा गया है? कृति सेनन का विज्ञापन इसी सवाल पर नई बहस छेड़ गया है।

Exit mobile version