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प्रकृति की कीमत का सवाल… छत्तीसगढ़ के जंगल से हिमालय तक बदलती तस्वीर

DigitalDesk by DigitalDesk
September 13, 2026
in छत्तीसगढ, मुख्य समाचार, रायपुर
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Chhattisgarh to the Himalayas
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प्रकृति की कीमत का सवाल… जंगल से हिमालय तक बदलती तस्वीर

भारत में विकास की कहानी अक्सर सड़क, बिजली, उद्योग, खनन और जीडीपी के आंकड़ों से लिखी जाती है। लेकिन इस कहानी का एक ऐसा हिस्सा भी है, जिसकी कीमत बहुत बड़ी है, मगर हिसाब अब तक अधूरा है। और वो है प्रकृति। जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं हैं। वो हवा को शुद्ध करते हैं। कार्बन सोखते हैं। बारिश और जलचक्र को संतुलित करते हैं। मिट्टी को बचाते हैं। जैव विविधता को सुरक्षित रखते हैं। और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार भी हैं। लेकिन सवाल यही है कि जब किसी जंगल की आर्थिक कीमत का हिसाब लगाया जाता है, तो क्या सिर्फ लकड़ी, बांस, ईंधन और लघु वनोपज की कीमत ही गिनी जानी चाहिए?

छत्तीसगढ़ से सामने आया एक अध्ययन इस सवाल को और गंभीर बनाता है। द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट यानी TERI के आकलन के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के वन हर साल करीब 1.41 लाख करोड़ रुपये की पारिस्थितिकी सेवाएं देते हैं। यानी जंगल जितनी आर्थिक गतिविधि सीधे पैदा करते हैं, उससे कहीं ज्यादा मूल्य वो प्रकृति के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से पैदा कर रहे हैं।

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जंगल का असली मूल्य कितना है?

यहीं भारत के विकास मॉडल के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। परंपरागत आर्थिक लेखांकन में जंगल की कीमत अक्सर उन चीजों से तय होती है, जिन्हें बाजार में खरीदा और बेचा जा सकता है। लकड़ी कितनी मिली। बांस कितना निकला। ईंधन और चारा कितना मिला। लघु वनोपज से कितनी आय हुई। लेकिन जंगल का सबसे बड़ा योगदान शायद इन चीजों में दिखाई ही नहीं देता। जंगल कार्बन सोखते हैं। जलस्रोतों को बचाते हैं। तापमान को नियंत्रित करते हैं। बाढ़ और मिट्टी के कटाव के खतरे को कम करते हैं। वन्यजीवों को आश्रय देते हैं। अध्ययन में इन पारिस्थितिकी सेवाओं की आर्थिक कीमत सामने आने से एक बात साफ होती है। जंगल को सिर्फ राजस्व पैदा करने वाली जमीन मानना, उसकी वास्तविक आर्थिक भूमिका को बेहद छोटा करके देखना है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू और ज्यादा चिंताजनक है। अगर वन क्षेत्र बढ़ भी रहा हो, तो क्या जंगल उतने ही मजबूत हो रहे हैं?

पेड़ बढ़े या जंगल की ताकत?

सैटेलाइट तस्वीरों में हरियाली दिखाई देना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। लेकिन सिर्फ हरित क्षेत्र बढ़ना पर्याप्त नहीं है। जंगल की गुणवत्ता इस बात से तय होती है कि वहां कितना जैवभार है। कितनी घनी वनस्पति है। कितनी जैव विविधता मौजूद है। जंगल कितना कार्बन सोख रहा है। और स्थानीय समुदाय को उससे कितना लाभ मिल रहा है।

छत्तीसगढ़ के अध्ययन में बढ़ते जैवभार यानी बढ़ते स्टॉक में गिरावट की चिंता सामने आती है। इसका सीधा असर जंगलों की कार्बन सोखने की क्षमता पर पड़ सकता है। TERI ने कार्बन पृथक्करण की आर्थिक कीमत करीब 14,770 करोड़ रुपये सालाना आंकी है। यानी अगर जंगल की गुणवत्ता कमजोर होती है, तो नुकसान सिर्फ पर्यावरण का नहीं है। नुकसान आर्थिक भी है। इसलिए भविष्य की वन नीति में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कितना जंगल बचा है?  सवाल यह भी होना चाहिए कि जंगल कितना स्वस्थ है?

पहाड़ों में बिजली…प्रकृति और स्वास्थ्य का कनेक्शन…

प्रकृति और मानव जीवन का रिश्ता सिर्फ जंगल तक सीमित नहीं है। हिमालय और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक भरोसेमंद बिजली की उपलब्धता भी है। दवाओं और टीकों का सुरक्षित भंडारण हो। जांच उपकरण चलाने हों। संचार व्यवस्था कायम रखनी हो। या किसी आपात स्थिति में मरीज का इलाज करना हो। बिजली स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है। ऐसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प नहीं, बल्कि स्वास्थ्य ढांचे की विश्वसनीयता का साधन बन सकती है। यानी जलवायु संकट से निपटने की कोशिश और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

गिद्धों का संकट…प्रकृति का अलार्म

राजस्थान का बीकानेर स्थित जोड़बीड़ क्षेत्र हमें प्रकृति की एक और अहम कड़ी की याद दिलाता है। गिद्धों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ये मृत पशुओं को तेजी से साफ करते हैं। संक्रमण फैलने के खतरे को कम करने में मदद करते हैं। यानी प्रकृति का अपना एक सफाई तंत्र है, जिसमें गिद्ध अहम भूमिका निभाते हैं। जब गिद्धों के भोजन, सुरक्षित आवास और प्रजनन परिस्थितियों पर संकट आता है, तो नुकसान सिर्फ एक पक्षी प्रजाति का नहीं होता। पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि वन्यजीव संरक्षण को सिर्फ बाघ और हाथी जैसे लोकप्रिय वन्यजीवों तक सीमित नहीं किया जा सकता। प्रकृति की हर कड़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक कड़ी कमजोर होने पर पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

खनन की कमाई..पर्यावरण की कीमत कौन देगा?

प्रकृति की कीमत का सवाल खनन तक पहुंचते ही और ज्यादा पेचीदा हो जाता है। MMDR Amendment Act 2026 के बाद राज्यों के खनन राजस्व को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्र का तर्क है कि नए प्रावधानों से खनन क्षेत्र में कर व्यवस्था ज्यादा स्थिर होगी। निवेश बढ़ेगा। उत्पादन को गति मिलेगी। और राज्यों को मिलने वाला खनन राजस्व प्रभावित नहीं होगा। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल राजस्व से आगे का है। खनन से मिलने वाली कमाई का हिसाब तुरंत लगाया जा सकता है। लेकिन खनन के कारण जंगल का नुकसान कितना हुआ। भूजल पर कितना दबाव पड़ा। मिट्टी की गुणवत्ता कितनी बदली। जैव विविधता को कितना नुकसान हुआ। और स्थानीय आबादी पर उसका क्या असर पड़ा। इन सवालों का आर्थिक मूल्यांकन अक्सर उतना स्पष्ट नहीं होता। यही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती है। खनिज की कीमत तय हो रही है। लेकिन क्या उस जमीन, जंगल और पानी की कीमत भी तय हो रही है, जिससे खनिज निकाला जा रहा है? अगर खनन से होने वाला आर्थिक लाभ दर्ज होता है, लेकिन पर्यावरणीय क्षति पूरी तरह दर्ज नहीं होती, तो विकास का हिसाब अधूरा रह जाता है।

हिमालय..खतरे की सबसे बड़ी घंटी

अब पूरी तस्वीर हिमालय तक पहुंचती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र पहले से ज्यादा संवेदनशील हो रहा है। ग्लेशियरों में बदलाव। बारिश के पैटर्न में परिवर्तन। अचानक बाढ़। भूस्खलन। और ढलानों की अस्थिरता। ये घटनाएं अब सिर्फ अलग-अलग प्राकृतिक आपदाएं नहीं रह गई हैं। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक तापमान वृद्धि और वर्षा के बदलते रुझानों को लेकर चिंता सामने आई है। नैनीताल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उपग्रह और रडार आधारित अध्ययनों ने भी जमीन की हलचल और ढलान अस्थिरता पर ध्यान खींचा है। और इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। हिमालय देश की नदियों का आधार है। जल सुरक्षा से जुड़ा है। कृषि से जुड़ा है। ऊर्जा से जुड़ा है। पर्यटन और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। इसलिए हिमालय का अस्थिर होना सिर्फ पहाड़ों का संकट नहीं है। ये पूरे भारत की जल और पर्यावरण सुरक्षा का संकट है।

अब प्रकृति को खर्च नहीं, पूंजी मानना होगा..

छत्तीसगढ़ के जंगलों की 1.41 लाख करोड़ रुपये की पारिस्थितिकी सेवाओं से लेकर जोड़बीड़ के गिद्धों तक। पहाड़ी स्वास्थ्य केंद्रों की सौर ऊर्जा से लेकर खनन और हिमालय की अस्थिरता तक। इन सभी घटनाओं का संदेश एक ही है। प्रकृति मुफ्त नहीं है। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या पर्यावरण बचना चाहिए। सवाल यह है कि विकास की कीमत कौन चुकाएगा? अगर किसी परियोजना से हजारों करोड़ रुपये का निवेश आता है, तो उसका लाभ गिना जाना चाहिए। लेकिन अगर उसी परियोजना से जंगल, पानी, जमीन या जैव विविधता को नुकसान होता है, तो उस नुकसान की कीमत भी आर्थिक गणना में शामिल होनी चाहिए। यानी भविष्य की अर्थव्यवस्था में सिर्फ GDP पर्याप्त नहीं होगी। हमें यह भी देखना होगा कि देश की प्राकृतिक पूंजी कितनी बची है। कितना जंगल कार्बन सोख रहा है। कितनी नदियां सुरक्षित हैं। कितना भूजल बचा है। कितनी जैव विविधता कायम है। और विकास की हर परियोजना के बाद प्रकृति की स्थिति पहले से बेहतर हुई या बदतर। क्योंकि अगर आर्थिक विकास बढ़ता रहे, लेकिन प्राकृतिक पूंजी लगातार घटती जाए, तो समृद्धि का यह मॉडल लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा।

अब वक्त आ गया है कि जंगल को सिर्फ जमीन पर खड़े पेड़ों की तरह नहीं, बल्कि आर्थिक संपत्ति माना जाए। नदियों को सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि प्राकृतिक पूंजी समझा जाए। और हिमालय को सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की जल और पर्यावरण सुरक्षा की रीढ़ माना जाए। आखिरकार विकास की असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि हमने आज कितना कमाया। असली सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमने कितना बचाया। और शायद प्रकृति की कीमत का सबसे बड़ा हिसाब यही है।

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