Jagannath Rath Yatra 2025: ओडिशा के पुरी हर साल की तरह इस बार भी जगन्नाथ रथ यात्रा का उत्साह नजर आ रहा है। दुनिया भर के लोग श्रद्धा और उत्साह से यात्रा को देखने उसमें शामिल होने पहुंचे हैं। यात्रा आज 27 जून शुक्रवार से शुरू होने के साथ ही 8 जुलाई तक चलेगी। इस अवधि में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होंगे और पुरी के मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करेंगे। जगन्नाथ रथ यात्रा करीब 12 दिन तक चलती है। जिसमें हर दिन का अपना खास महत्व होता है।
बता दें पुरी, ओडिशा स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में से एक है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को यहां भगवान श्रीजगन्नाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। जिसमें भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है इस यात्रा में श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का रथ नहीं होता। ऐसे में यह सवाल कई श्रद्धालुओं के मन में आता है कि जब श्रीकृष्ण के परिवार के अन्य सदस्य रथ पर होते हैं, तो उनकी धर्मपत्नी रुक्मिणी क्यों नहीं?
इस प्रश्न का उत्तर एक रोचक और भावपूर्ण कथा में छिपा है। मान्यता है कि एक बार द्वारका में श्रीकृष्ण अपने महल में विश्राम कर रहे थे। नींद में उन्होंने राधा का नाम पुकारा। रुक्मिणी यह सुनकर चौंक गईं और दुखी हो गईं कि श्रीकृष्ण आज भी राधा को याद करते हैं। अगली सुबह उन्होंने यह बात अन्य रानियों को बताई और सभी ने मिलकर राधा-कृष्ण के प्रेम की गहराई को समझने का निश्चय किया। वे माता रोहिणी के पास पहुंचीं, जो राधा-कृष्ण के संबंध को निकट से जानती थीं।
माता रोहिणी ने शर्त रखी कि जब वह राधा-कृष्ण के प्रसंग सुनाएंगी, तब कोई कमरे में प्रवेश नहीं करेगा। श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा को दरवाजे पर निगरानी के लिए खड़ा किया गया। कथा आरंभ हुई और सुभद्रा भी उस कथा को सुनते हुए भावविभोर हो गईं। तभी श्रीकृष्ण और बलराम वहां पहुंचे। सुभद्रा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन कथा की मधुरता से वे भी आकर्षित हो गए। तीनों राधा के भक्ति और प्रेम को सुनते हुए इतने भावुक हो गए कि उनका शरीर रूपांतरित होने लगा। उनके हाथ-पैर अदृश्य हो गए और शरीर गोलाकार हो गया।
उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे और इस अद्भुत रूप के दर्शन किए। उन्होंने श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा से प्रार्थना की कि कलियुग में भी वे इसी रूप में भक्तों को दर्शन दें। यह रूप ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर में प्रतिष्ठित है — जहाँ तीनों की आधे-अधूरे अंगों वाली मूर्तियाँ पूजित हैं।
क्योंकि इस पूरी घटना में रुक्मिणी उपस्थित नहीं थीं और न ही उनका कोई उल्लेख आता है, इसलिए रथयात्रा में उनका कोई रथ नहीं होता। यह यात्रा राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम, भक्ति और त्याग की प्रतीक मानी जाती है — जिसमें रुक्मिणी का स्थान नहीं जोड़ा जाता।
इस कथा से यह भी स्पष्ट होता है कि रथयात्रा सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभूति है, जो राधा के प्रतीकात्मक प्रेम और नारायण के लोक कल्याण के संकल्प को दर्शाती है। ( प्रकाश कुमार पांडेय)





