कुछ अपराध की खबरें इसलिए विचलित करती हैं क्योंकि उनमें कथित तौर पर क्या हुआ, यह बेहद गंभीर होता है। लेकिन कुछ मामले इसलिए और ज्यादा परेशान करते हैं क्योंकि सवाल उन लोगों पर उठता है, जिनसे समाज सुरक्षा, सूचना और न्याय की उम्मीद करता है। ओडिशा के बोलांगीर में 62 वर्षीय कारोबारी के कथित अपहरण का मामला इसी दूसरी श्रेणी में आता है। पुलिस के मुताबिक, कारोबारी को 14 अगस्त को कथित तौर पर अगवा कर भुवनेश्वर ले जाया गया। मामले में अब तक चार लोगों की गिरफ्तारी की बात सामने आई है, जिनमें एक सेवारत महिला पुलिस सब-इंस्पेक्टर और एक पत्रकार भी शामिल हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि मामले में कुछ और लोग भी शामिल हो सकते हैं।
जब वर्दी और प्रेस कार्ड पर उठे सवाल
- बोलांगीर कांड ने भरोसे को झकझोरा
- जब रक्षक ही कटघरे में आए
- वर्दी पर आरोप, व्यवस्था पर सवाल
- पत्रकार की भूमिका ने बढ़ाई चिंता
- सिर्फ अपराध नहीं, भरोसे का संकट
- संस्थाओं की साख की असली परीक्षा
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप अभी आरोप हैं। उनकी सच्चाई जांच और न्यायिक प्रक्रिया में तय होगी। किसी आरोपी को अदालत के फैसले से पहले दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इस मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है— जब भरोसे की संस्थाओं से जुड़े लोगों पर ही गंभीर अपराध में शामिल होने का आरोप लगे, तो आम आदमी का संस्थाओं पर भरोसा कैसे बचा रहेगा? यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सामाजिक और संस्थागत पहलू है।
1. यह सिर्फ अपहरण की कहानी नहीं
अगर कोई सामान्य नागरिक अपराध का आरोपी बनता है, तो मामला मुख्य रूप से उस व्यक्ति के कथित अपराध तक सीमित रहता है। लेकिन जब किसी पुलिस अधिकारी पर अपराध में कथित भूमिका का आरोप लगता है, तो मामला व्यक्ति से आगे बढ़कर संस्था तक पहुंच जाता है। क्योंकि पुलिस सिर्फ एक नौकरी नहीं है। पुलिस राज्य की कानून लागू करने वाली शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। एक सामान्य नागरिक जब डरता है तो उसे यही बताया जाता है— पुलिस को फोन करो। जब किसी के साथ धोखाधड़ी होती है, धमकी मिलती है, हमला होता है या कोई अपराध होता है, तो पुलिस थाने को वह स्थान माना जाता है जहां से सुरक्षा और न्याय की उम्मीद शुरू होती है।
इसलिए किसी सेवारत पुलिस अधिकारी पर अपराध में कथित संलिप्तता का आरोप सामाजिक स्तर पर अलग असर डालता है। बोलांगीर मामले में जांचकर्ताओं के अनुसार महिला सब-इंस्पेक्टर की कथित भूमिका की जांच की जा रही है और सबूतों से छेड़छाड़ के प्रयास का आरोप भी सामने आया है। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो मामला केवल एक कारोबारी के कथित अपहरण तक सीमित नहीं रहेगा। यह सवाल भी उठेगा कि जिस वर्दी का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए होना चाहिए, क्या वही कथित तौर पर किसी अपराध की योजना का हिस्सा बन सकती है? यही संस्थागत खतरा है।
पत्रकार की भूमिका ने मामले को और गंभीर बनाया
इस मामले में पत्रकार के कथित तौर पर शामिल होने का आरोप एक अलग चिंता पैदा करता है। पत्रकारिता भी मूल रूप से भरोसे पर चलती है। एक पत्रकार लोगों से बातचीत करता है, दस्तावेज मांगता है, संवेदनशील जानकारी हासिल करता है और कई बार प्रभावशाली लोगों के खिलाफ तथ्य सामने लाता है। लोग पत्रकार को अपनी बात क्यों बताते हैं? क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि पत्रकार उनकी कहानी बताएगा—खुद उस कहानी का हिस्सा नहीं बनेगा। यही अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। एक पत्रकार अपराधियों से बात कर सकता है। अपराध की जांच कर सकता है। आरोपियों से संपर्क कर सकता है। लेकिन अगर कोई पत्रकार खुद कथित अपराध में भागीदार बन जाए, तो निरीक्षक और सहभागी के बीच की सीमा टूट जाती है। और इसका नुकसान सिर्फ उस पत्रकार तक सीमित नहीं रहता। अगली बार जब कोई रिपोर्टर किसी के घर दस्तक देगा, तो सामने वाला व्यक्ति शायद पहले से ज्यादा संदेह करेगा। यानी एक व्यक्ति के कथित कृत्य की कीमत पूरी पेशेवर बिरादरी को चुकानी पड़ सकती है।
3. पुलिस और मीडिया का रिश्ता—सहयोग से प्रभाव तक
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पुलिस और पत्रकारिता के बीच का स्वाभाविक संबंध है। क्राइम रिपोर्टर पुलिस से जानकारी लेते हैं। पुलिस कई बार जनता तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए पत्रकारों का इस्तेमाल करती है। वर्षों में पेशेवर संबंध व्यक्तिगत परिचय में बदल सकते हैं। फोन नंबर साझा होते हैं। सूत्र बनते हैं। कभी-कभी दोस्ती भी हो जाती है। यह अपने आप में गलत नहीं है। दरअसल, खोजी और अपराध पत्रकारिता के लिए स्रोतों का नेटवर्क जरूरी होता है। समस्या तब शुरू होती है जब पेशेवर पहुंच व्यक्तिगत प्रभाव में बदल जाती है। सवाल यही है—
सूचना देने वाला स्रोत कब दोस्त बन जाता है?
दोस्ती कब एहसान में बदलती है?
और एहसान कब कथित मिलीभगत का रूप ले सकता है?
यह सवाल सिर्फ ओडिशा का नहीं है।
यह हर उस व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है जहां पुलिस, मीडिया, प्रशासन, कारोबारी और राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। इसीलिए मजबूत संस्थाएं केवल व्यक्तियों की ईमानदारी पर निर्भर नहीं करतीं। उन्हें ऐसी व्यवस्थाओं की जरूरत होती है जहां अधिकार का दुरुपयोग कठिन और जवाबदेही अनिवार्य हो।
4. आज ताकत सिर्फ पैसे में नहीं है
इस मामले का व्यापक सामाजिक संदेश यह भी है कि आधुनिक समाज में शक्ति के कई रूप हैं। पुलिस अधिकारी के पास संस्थागत शक्ति है। पत्रकार के पास सूचना और नैरेटिव की शक्ति है। सोशल मीडिया प्रभावशाली व्यक्ति के पास लोगों का ध्यान खींचने की शक्ति है। ब्यूरोक्रेट के पास प्रशासनिक अधिकार है। व्यापारी के पास आर्थिक प्रभाव है। अलग-अलग प्रकार की ये शक्तियां जब एक-दूसरे से जुड़ती हैं तो प्रभाव का नेटवर्क तैयार होता है। और जहां शक्ति है, वहां जवाबदेही भी जरूरी है। इसलिए भ्रष्टाचार को केवल रिश्वत के लिफाफे से नहीं समझा जा सकता। आज भ्रष्टाचार का एक रूप ‘एक्सेस’ भी हो सकता है।
किसका फोन तुरंत उठता है?
कौन किस अधिकारी को जानता है?
कौन किसी काम को जल्दी करवा सकता है?
कौन किसी समस्या को दबा सकता है?
कौन किसी घटना का नैरेटिव बदल सकता है?
यही अनौपचारिक प्रभाव व्यवस्था कई बार पैसे से भी ज्यादा शक्तिशाली हो सकती है।
5. ‘हनुमान पैसा’ की कहानी और आधुनिक भारत का विरोधाभास
मामले की जांच में कथित तौर पर एक ऐसी वस्तु से जुड़े विवाद की बात भी सामने आई है, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘हनुमान पैसा’ बताया जा रहा है। एक आरोपी की ओर से कथित तौर पर दावा किया गया कि ऐसी वस्तु के संबंध में पहले बड़ी रकम का भुगतान किया गया था। कारोबारी ने कथित आरोप से इनकार किया है। इन दावों की सच्चाई अभी जांच का विषय है। लेकिन इस कथित कहानी का एक व्यापक सामाजिक पहलू भी है। एक तरफ भारत अंतरिक्ष में मिशन भेज रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से कामकाज बदल रही है। स्मार्टफोन से कुछ सेकंड में पैसे का लेनदेन हो रहा है। लेकिन दूसरी तरफ चमत्कारी वस्तुओं, अचानक अमीर बनाने वाले दावों और रहस्यमयी कीमती सामान को लेकर विश्वास अब भी समाज में मौजूद है। यानी— आधुनिक तकनीक और अंधविश्वास एक ही व्यक्ति में साथ-साथ मौजूद हो सकते हैं।
स्मार्टफोन होने का मतलब वैज्ञानिक सोच होना नहीं है। शिक्षित होना हमेशा तार्किक होना नहीं है। बल्कि तकनीक कभी-कभी अफवाहों को रोकने के बजाय उन्हें और तेजी से फैलाने का माध्यम बन जाती है।
6. असली लालच शायद ‘शॉर्टकट’ का है
आज की कई आपराधिक और सामाजिक घटनाओं के पीछे एक समान मनोविज्ञान दिखाई देता है— शॉर्टकट। जल्दी पैसा चाहिए। जल्दी प्रसिद्धि चाहिए। जल्दी प्रभाव चाहिए।
कानून से बचकर काम निकालना है। इंसान के भीतर धन और शक्ति की इच्छा नई नहीं है।
लेकिन आधुनिक समाज ने सफलता की गति को इतना तेज कर दिया है कि मेहनत, धैर्य और वर्षों में बनी प्रतिष्ठा कई लोगों को धीमी प्रक्रिया लगने लगी है।
शल मीडिया पर अचानक प्रसिद्धि। किसी कारोबार से रातोंरात करोड़ों कमाने की कहानियां।
कुछ ही समय में प्रभावशाली बनने की चाह।
इसके बीच यह भूलना आसान है कि कुछ चीजों का कोई शॉर्टकट नहीं होता।
विश्वास समय लेता है।
प्रतिष्ठा समय लेती है।
पेशेवर विश्वसनीयता समय लेती है।
लेकिन इन्हें खत्म होने में बहुत कम समय लग सकता है।
7. एक आरोपी से पूरी संस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता
यहां सबसे महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है।
यदि किसी पुलिस अधिकारी पर अपराध का आरोप लगा है, तो इससे पूरी पुलिस व्यवस्था भ्रष्ट नहीं हो जाती।
यदि किसी पत्रकार पर अपराध में शामिल होने का आरोप लगा है, तो इससे पूरी पत्रकारिता अपराधी नहीं बन जाती।
भारत में हजारों पुलिसकर्मी हर दिन कठिन और जोखिम भरी परिस्थितियों में काम करते हैं।
इसी तरह बड़ी संख्या में पत्रकार लगातार दबाव, धमकियों और आर्थिक चुनौतियों के बीच महत्वपूर्ण पत्रकारिता करते हैं।
इसलिए सामूहिक दोषारोपण न तो न्यायसंगत है और न उपयोगी।
सही प्रतिक्रिया संस्थाओं पर भरोसा खत्म करना नहीं, बल्कि संस्थाओं से जवाबदेही की मांग करना है।
और इस दृष्टि से गिरफ्तारी की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण है।
अगर किसी सेवारत अधिकारी पर संदेह होने पर जांच और गिरफ्तारी होती है, तो यह इस बात का संकेत भी है कि जवाबदेही की व्यवस्था काम कर सकती है।
इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
8. भरोसा दिखाई नहीं देता, लेकिन व्यवस्था उसी पर चलती है
लोकतंत्र कानून, अदालत, सरकार और संविधान से चलता है।
लेकिन इनके नीचे एक ऐसी चीज होती है जिसे हम अक्सर देख नहीं पाते—
विश्वास।
हम किसी अनजान पुलिसकर्मी की बात इसलिए मानते हैं क्योंकि वह एक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
हम शिकायत दर्ज कराते समय पुलिस को निजी जानकारी देते हैं।
हम पत्रकार को ऐसी बातें बताते हैं जो कई बार पड़ोसी तक को नहीं बताते।
हम डॉक्टर पर भरोसा करते हैं क्योंकि उसके पास योग्यता और पेशेवर पहचान है।
हम न्यायाधीश के निर्णय को स्वीकार करते हैं क्योंकि उसके पीछे न्यायिक संस्था का अधिकार है।
अगर हर नागरिक को हर संस्था पर संदेह होने लगे, तो समाज का सामान्य संचालन मुश्किल हो जाएगा।
यही कारण है कि बोलांगीर जैसा मामला एक स्थानीय अपराध से कहीं बड़ा प्रश्न पैदा करता है।
यह पूछता है—
क्या हमारी संस्थाएं अपने प्रतीकों के भरोसे को बचा पा रही हैं?
9. वर्दी और प्रेस कार्ड सिर्फ पहचान नहीं, एक वादा हैं
पुलिस की वर्दी और पत्रकार का प्रेस कार्ड—दोनों में एक असाधारण समानता है।
दोनों प्रतीक हैं।
वे सामने वाले व्यक्ति को एक संदेश देते हैं—
आप मुझ पर इस भूमिका को निभाने के लिए भरोसा कर सकते हैं।
वर्दी सुरक्षा और कानून का प्रतीक है।
प्रेस कार्ड सूचना और सार्वजनिक जवाबदेही का प्रतीक है।
इन प्रतीकों के कारण दोनों पेशों को सामान्य नागरिक की तुलना में अतिरिक्त पहुंच और प्रभाव मिलता है।
और जहां अतिरिक्त शक्ति है, वहां अतिरिक्त जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।
यही किसी भी लोकतांत्रिक संस्था का मूल सिद्धांत है।
10. इस मामले की असली परीक्षा अब शुरू होगी
अब यह मामला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा।
हर आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच होगी।
सबूतों का परीक्षण होगा।
और अंतिम फैसला अदालत करेगी।
इसलिए किसी भी व्यक्ति को अदालत के फैसले से पहले दोषी घोषित करना उचित नहीं है।
लेकिन संस्थागत स्तर पर सबक सीखने के लिए न्यायिक फैसले का इंतजार करना जरूरी नहीं है।
पुलिस व्यवस्था को देखना होगा कि उसके भीतर किसी अधिकारी द्वारा अधिकार के दुरुपयोग की संभावना को कैसे रोका जाए।
मीडिया संस्थानों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि पत्रकारिता की पेशेवर सीमाएं स्पष्ट रहें। और समाज को भी यह समझना होगा कि किसी एक व्यक्ति की कथित गलती के आधार पर पूरी संस्था को कटघरे में खड़ा करना समाधान नहीं है।
समाधान है—
निष्पक्ष जांच।
कठोर जवाबदेही।
पारदर्शी प्रक्रिया।
और संस्थागत सुधार।
अपराध से बड़ा है भरोसे का सवाल
बोलांगीर का कथित अपहरण मामला जांच का विषय है और आरोपों की अंतिम सच्चाई अदालत तय करेगी। लेकिन इस घटना ने उससे कहीं बड़ा सवाल हमारे सामने रख दिया है। जब रक्षक ही आरोपी बन जाए तो नागरिक किस पर भरोसा करे? इसका जवाब संस्थाओं को कमजोर करने में नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाने में है । एक पुलिस अधिकारी पर आरोप लगे तो पूरी पुलिस व्यवस्था को खारिज नहीं किया जा सकता। एक पत्रकार पर आरोप लगे तो पूरी पत्रकारिता को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता।
लेकिन संस्थाओं को यह भी नहीं कहना चाहिए कि ऐसे मामलों से उनकी साख पर कोई असर नहीं पड़ता। असर पड़ता है। क्योंकि वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं है। प्रेस कार्ड सिर्फ पहचान-पत्र नहीं है। दोनों जनता के साथ किए गए एक भरोसे के वादे हैं। और उस भरोसे की कीमत किसी भी संस्था की सबसे बड़ी संपत्ति से ज्यादा है। पुलिस की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी कानूनी शक्ति नहीं—जनता का भरोसा है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी पहुंच नहीं—उसकी विश्वसनीयता है। और जब यह भरोसा टूटता है, तो उसे वापस पाने में वर्षों लग सकते हैं। इसलिए बोलांगीर की कहानी सिर्फ एक कथित अपहरण की कहानी नहीं है। यह उस अदृश्य पूंजी की कहानी है जिस पर लोकतंत्र चलता है— विश्वास।