प्रेमानंद महाराज जी की सलाह….मंत्रों वाले कपड़े क्यों न पहनें?
प्रेमानंद महाराज जी का यह कहना कि मंत्रों वाले वस्त्र नहीं पहनने चाहिए, केवल व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि वैदिक मर्यादा और शास्त्रों के अनुरूप है। वे कहते हैं “मंत्र हृदय में बसाने की चीज है, कपड़ों पर लिखकर दिखाने की नहीं।” उनका यह कहना कई कारणों से सार्थक है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण से मंत्रों वाले वस्त्र पहनने के नुकसान
मंत्रों की पवित्रता का हनन
वैदिक या तांत्रिक मंत्र अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र माने जाते हैं। इन्हें शरीर पर पहनकर सार्वजनिक रूप से दिखाना उनका अपमान है। जैसे “ॐ नमः शिवाय”, “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं” जैसे बीज मंत्र सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए नहीं, आंतरिक जप के लिए होते हैं।
मंत्रों का अपवित्र हो जाना
कपड़े पहनने से वे शरीर के मल-मूत्र, पसीने, और धूल-मिट्टी के संपर्क में आते हैं। इससे मंत्रों की दिव्यता और प्रभाव नष्ट हो सकता है।
शास्त्रों में निषेध
धर्मशास्त्र और आचारसंहिता के अनुसार भगवान के नाम या मंत्रों को ऐसे स्थानों पर नहीं लिखा जाना चाहिए, जहां वे अपवित्र हो सकें। गृह्यसूत्रों और स्मृति ग्रंथों में यह वर्जना स्पष्ट है।
आकर्षण या दिखावा का माध्यम
आजकल ऐसे वस्त्र कभी-कभी फैशन या ट्रेंड के रूप में भी पहने जाते हैं, जो आध्यात्मिक रूप से अनुचित है।
प्रेमानंद महाराज जी का समाधान
ऐसे वस्त्रों को पहनना बंद करें। यदि पहले से ऐसा कोई वस्त्र है, तो उसे यमुना या किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें। मंत्रों को केवल गुरु से प्राप्त कर, हृदय में जपें। धार्मिक चिन्हों का सम्मान करें – उन्हें पहनावा नहीं, साधना का माध्यम बनाएं। प्रेमानंद महाराज जी और वैदिक शास्त्रों की दृष्टि से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मंत्रों या भगवान के नाम वाले वस्त्र पहनना अशुद्ध और अमंगलकारी है। ऐसे कपड़े न तो पहनें, न बेचें, और न ही प्रचारित करें।