भारतीय समाज में विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दो आत्माओं और दो परिवारों के मिलन का पवित्र संस्कार माना जाता है। यह परंपरा सदियों से सादगी, भावनाओं और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित रही है। लेकिन बदलते समय के साथ अब इस पवित्र बंधन पर आधुनिकता और दिखावे की परत चढ़ती नजर आ रही है। शादी से पहले होने वाले प्री-वेडिंग शूट ने इस परंपरा की मूल भावना को काफी हद तक बदल दिया है।
आजकल प्री-वेडिंग शूट केवल यादों को संजोने का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि यह एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गया है। कपल्स पहाड़ों, झरनों, महंगे रिसॉर्ट्स और ऐतिहासिक स्थलों पर जाकर घंटों शूट कराते हैं। महंगे कपड़े, लग्जरी गाड़ियां और फिल्मी स्टाइल में शूट किए गए वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए जाते हैं, जिससे यह एक स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल एक ट्रेंड है या फिर हमारी संस्कृति और सामाजिक संतुलन पर असर डालने वाला बदलाव।
जहां पहले विवाह सादगी और पारिवारिक सहभागिता का प्रतीक होता था, वहीं अब इसमें प्रदर्शन और आडंबर की झलक ज्यादा दिखाई देने लगी है। कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कारों के विपरीत है और पश्चिमी तथा फिल्मी संस्कृति की नकल है। इससे न केवल आर्थिक दबाव बढ़ता है, बल्कि समाज में दिखावे की होड़ भी तेज होती है।
ऐसे में जरूरी है कि हम इस ट्रेंड को समझदारी से अपनाएं। यादें संजोना गलत नहीं है, लेकिन यदि यह हमारी परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक संतुलन को प्रभावित करने लगे, तो उस पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
सबसे पहले—प्री-वेडिंग फोटोशूट अपने आप में गलत नहीं है। यह एक आधुनिक ट्रेंड है, जहां कपल अपनी शादी से पहले की यादों को क्रिएटिव तरीके से कैप्चर करना चाहते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब कंटेंट जरूरत से ज्यादा दिखावटी, असहज या परिवार/समाज के मूल्यों से टकराने वाला हो जाता है।
दूसरी बात—हर प्री-वेडिंग शूट “अश्लील” नहीं होता। बहुत से लोग इसे सादगी, परंपरा और भावनाओं के साथ भी करते हैं—जैसे मंदिर, प्रकृति, पारंपरिक पहनावे या परिवार के साथ शूट। यानी यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई कपल क्या दिखाना चाहता है । “संस्कार” की जो बात महत्वपूर्ण है। भारतीय विवाह परंपरा में दूल्हा-दुल्हन को पवित्र रूप में देखा जाता है—यह एक सामाजिक और आध्यात्मिक बंधन भी है। लेकिन समय के साथ अभिव्यक्ति के तरीके बदलते हैं। आज की पीढ़ी व्यक्तिगत पसंद, स्टाइल और स्वतंत्रता को भी महत्व देती है।
यहाँ असली सवाल “प्री-वेडिंग शूट सही या गलत” का नहीं, बल्कि “सीमा और संतुलन” का है।
- क्या हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिकता को अपना सकते हैं?
- क्या हम ऐसा कंटेंट बना रहे हैं जो आने वाले समय में खुद हमें सहज लगे?
दिखावे की संस्कृति (show-off culture) जरूर एक चिंता का विषय है—सोशल मीडिया के कारण लोग दूसरों को देखकर उसी तरह की चीजें कॉपी करने लगते हैं, बिना यह सोचे कि वह उनकी सोच, परिवार या व्यक्तित्व से मेल खाती है या नहीं।
जहां तक विवाह और तलाक को जोड़ने की बात है—यह सीधा संबंध नहीं है। रिश्ते टूटने के पीछे कई जटिल कारण होते हैं, सिर्फ प्री-वेडिंग शूट या शादी के दिखावे को इसका कारण मानना सही नहीं होगा।
प्री-वेडिंग शूट न पूरी तरह गलत है, न पूरी तरह सही।
यह इस पर निर्भर है कि—
- आप क्या दिखाना चाहते हैं
- किस सीमा तक जाते हैं
- और क्या वह आपकी व्यक्तिगत व पारिवारिक मूल्यों के अनुरूप है
अगर परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन रखा जाए, तो शादी की खूबसूरती भी बनी रहती है और नई यादें भी बनती हैं।





