मालेगांव ब्लास्ट फैसले पर गरमाई सियासत…. भगवा आतंकवाद को लेकर राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं
2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में NIA कोर्ट के फैसले के बाद भगवा आतंकवाद को लेकर सियासी बवाल फिर से जोर पकड़ने लगा है। फैसले के बाद जहां कुछ नेताओं ने “भगवा आतंकवाद” शब्द को सिरे से खारिज कर दिया, वहीं कुछ ने इसे राजनीतिक हथकंडा बताकर भाजपा पर निशाना साधा।
भगवा आतंकवाद को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। इसकी वजह बना है 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत का ताजा फैसला। इस बहुचर्चित विस्फोट मामले में कुछ आरोपियों को लेकर कोर्ट ने अहम टिप्पणी की, जिससे एक बार फिर यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है।
भगवा आतंकवाद पर फिर छिड़ी बहस…
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत की ओर से 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दियागया है।NIA कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियां पाई, जैसे घटनास्थल पर पंचनामा गलत पाया गया, सबूतों से छेड़छाड़ के साथ ही गवाहों पर दबाव डालनाNIA।कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा। यूएपीए UAPA लगाना कोर्ट ने गलत करार दिया है।
Nia कोर्ट के इस फैसले के साथ ही राजनीतिक दलों में जबरदस्त जुबानी जंग शुरू हो गई है। बीजेपी ने कांग्रेस को निशाने पर लिया है। कांग्रेस आरोप है कि उसन
राजनीतिक फायदे की मंशा से हिंदू और भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों को गढ़ने के लिए निर्दोष लोगों को फंसाया था।
NIA कोर्ट के इस फैसले के बाद अब भगवा आतंकवाद और हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों पर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।कांग्रेस पर आरोप लग रहा है कि उसने ही हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द का आविष्कार किया और बेगुनाह लोगों को फंसाया। बीजेपी नेअब कांग्रेस से माफी की मांग की है। रोहिणी सैलियन की ओर से दिए गए हलफनामे में एनआईए अधिकारियों पर दबाव डालने का दावा किया गया है। ऐसे में आप यह सवाल उठ रहे हैं कि 17 साल तक जेल में रहने वाले निर्दोषों के समय की भरपाई कौन करेगा। इस पूरे मामले में असली दोषी कौन हैं। बता दे इस दौरान समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव ब्लास्ट जैसे मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाने का आरोप लगाया गया है
क्या था मालेगांव ब्लास्ट केस?
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में एक मोटरसाइकिल में विस्फोट हुआ था, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक घायल हुए थे। प्रारंभिक जांच में संदेहियों के नाम सामने आए, जिसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जिनका संबंध दक्षिणपंथी संगठनों से बताया गया। इसी कारण “भगवा आतंकवाद” शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ।
क्या है ‘भगवा आतंकवाद’?
‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पहली बार तब चर्चा में आया जब कुछ आतंकी मामलों में आरोपियों का संबंध हिंदू संगठनों से जोड़ा गया। खास तौर पर 2008 में हुए मालेगांव विस्फोट के बाद। हालांकि, इस शब्द के उपयोग को लेकर हमेशा विवाद रहा। कई लोगों का मानना है कि यह एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने की कोशिश थी, वहीं कुछ इसे कट्टरवाद के खिलाफ जरूरी शब्द मानते हैं।
मालेगांव ब्लास्ट मामले में आया यह नया फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे एक बार फिर उस पुराने बहस को हवा मिल गई है, जिसमें धर्म, राजनीति और आतंकवाद की परिभाषा आपस में उलझ जाती है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़कों तक चर्चा का विषय बना रह सकता है।
आइए जानते हैं किस दल ने क्या कहा
कांग्रेस ने कहा “भगवा आतंकवाद का जिक्र हमने नहीं किया था, यह शब्द उस समय की जांच एजेंसियों की रिपोर्ट्स से सामने आया था। लेकिन अब जब अदालत ने अपना फैसला दिया है, तो हमें फैसले का सम्मान करना चाहिए। परंतु यह भी सच है कि इस मामले में तत्कालीन जांच एजेंसियों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए थे।
भगवा आतंकवाद जैसे शब्द कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ के लिए गढ़े-BJP
बीजेपी ने इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा भगवा आतंकवाद जैसे शब्द कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ के लिए गढ़े थे। इससे न केवल करोड़ों हिंदुओं की आस्था को चोट पहुंची, बल्कि यह देश के संतों और साधुओं के अपमान का मामला था। अब कोर्ट के फैसले से कांग्रेस की साजिश बेनकाब हो गई है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने तटस्थ रुख अपनाते हुए कहा “न्यायालय का फैसला अंतिम होता है। हमें फैसले का सम्मान करना चाहिए, लेकिन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी ताकि न्याय हो सके, न केवल कानून के तहत, बल्कि सामाजिक नजरिए से भी।”
शिवसेना (UBT गुट)
शिवसेना (उद्धव गुट) ने केंद्र सरकार की एजेंसियों पर सवाल उठाए “जब से केंद्र में भाजपा आई है, जांच एजेंसियों की भूमिका बदल गई है। मालेगांव जैसे गंभीर मामलों को कमजोर किया गया। अगर सच में आरोपी निर्दोष थे, तो इतने साल क्यों लगे उन्हें बरी करने में?”
ओवैसी की पार्टी AIMIM
असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। “साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित जैसे आरोपियों को क्लीन चिट देने के लिए सरकार ने जांच को प्रभावित किया। भगवा आतंकवाद कोई गढ़ी हुई बात नहीं थी। यह सच्चाई है कि कुछ तत्व धर्म के नाम पर आतंक फैला रहे थे।
मालेगांव ब्लास्ट केस का यह फैसला न्यायपालिका का एक कानूनी कदम है, लेकिन राजनीतिक दल इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। भगवा आतंकवाद की बहस एक बार फिर चुनावी साल में गरमाई है और इससे सियासत की लहरें उठना तय हैं। प्रकाश कुमार पाण्डेय





