पीएम-सीएम हटाने वाला बिल और JPC पर सियासी बवाल… सपा, टीएमसी के बाद AAP का भी किनारा – कांग्रेस पर विपक्षी एकता निभाने का दबाव बढ़ा

Political uproar over the bill to remove PM CM and JPC After SP TMC AAP too is on the sidelines

पीएम-सीएम हटाने वाला बिल और JPC पर सियासी बवाल… सपा, टीएमसी के बाद AAP का भी किनारा – कांग्रेस पर विपक्षी एकता निभाने का दबाव बढ़ा

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को गिरफ्तारी की स्थिति में पद से हटाने वाले विधेयक की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को लेकर विपक्षी राजनीति गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बाद अब आम आदमी पार्टी ने भी इस समिति से दूरी बनाने का ऐलान कर दिया है। विपक्षी पार्टियों के लगातार पीछे हटने से कांग्रेस असमंजस में है, क्योंकि उस पर विपक्षी एकता कायम रखने का दबाव बढ़ गया है।

विधेयक और JPC का गठन

20 अगस्त 2025 को लोकसभा में तीन अहम विधेयक पेश किए गए संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025।
इन विधेयकों में प्रावधान है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से हटना होगा। इन विधयकों की समीक्षा के लिए JPC का गठन किया गया है। जिसमें लोकसभा के 21 सदस्य और राज्यसभा के 10 सांसदों को शामिल किया गया है। समिति को अगले शीतकालीन सत्र में अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।

विपक्षी दलों का विरोध

इस बिल पर विपक्षी दलों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

तृणमूल कांग्रेस (TMC): पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने JPC को “नौटंकी” बताते हुए कहा कि मोदी सरकार ऐसे मुद्दों को जानबूझकर उछालती है ताकि असली सवालों से जनता का ध्यान भटकाया जा सके। उन्होंने ब्लॉग पोस्ट में लिखा कि पहले JPC जनता के प्रति जवाबदेही तय करने का मंच होती थी, लेकिन 2014 के बाद से इसका इस्तेमाल केवल राजनीतिक हथियार की तरह हो रहा है।

समाजवादी पार्टी (SP): अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी टीएमसी के साथ खड़ी है। उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून किसी भी नेता को झूठे मामलों में फंसा कर पद से हटाने का हथियार बन सकता है। उन्होंने उदाहरण दिए कि आजम खान, रामाकांत यादव और इरफान सोलंकी जैसे नेताओं को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। अखिलेश ने यह भी कहा कि यह कानून संघीय ढांचे के खिलाफ है क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है और मुख्यमंत्री अपने खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का अधिकार रखते हैं।

आम आदमी पार्टी (AAP): सपा और टीएमसी की राह पर चलते हुए अब आम आदमी पार्टी ने भी JPC से दूरी बना ली है। सूत्रों के मुताबिक AAP मानती है कि समिति का झुकाव सत्तारूढ़ पार्टी की ओर रहेगा और उसका निष्कर्ष पहले से तय है।

कांग्रेस पर बढ़ा दबाव

अब सबसे बड़ी दुविधा कांग्रेस के सामने है। कांग्रेस का अब तक मानना रहा है कि संसदीय समितियों की कार्यवाही अदालतों में महत्व रखती है और इससे विवादित विधेयकों पर जनमत प्रभावित होता है। लेकिन टीएमसी, सपा और AAP के बहिष्कार ने विपक्षी एकजुटता की नई चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी अपनी पुरानी लाइन पर अड़ी रहेगी या विपक्षी एकता को प्राथमिकता देगी।  कांग्रेस सूत्र कहते हैं कि पार्टी नेतृत्व इस बात पर विचार कर रहा है कि कहीं समिति में बने रहने से विपक्ष बंटा हुआ न दिखे। वहीं बाहर रहने पर सरकार को “विपक्ष गैरजिम्मेदार है” कहने का मौका मिल सकता है।

अखिलेश यादव का तर्क

अखिलेश यादव ने गृह मंत्री अमित शाह के बयान का हवाला दिया कि उन्हें भी कई मामलों में झूठा फंसाया गया था। उन्होंने पूछा कि जब केंद्रीय मंत्री तक खुद इस तरह की शिकायत कर चुके हैं तो फिर यह बिल किस आधार पर लाया गया है? उनका मानना है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल नेताओं को राजनीतिक कारणों से हाशिये पर करने के लिए हो सकता है।

विपक्ष की साझा चुनौती

विश्लेषकों का कहना है कि JPC से लगातार विपक्षी दलों का हटना सरकार को ही फायदा पहुंचा सकता है।यदि कांग्रेस JPC में बनी रहती है तो विपक्षी एकता कमजोर पड़ने का संदेश जाएगा। यदि कांग्रेस भी बाहर हो जाती है तो समिति पूरी तरह से एकतरफा हो जाएगी और सरकार अपने पक्ष में रिपोर्ट तैयार कर लेगी। इसलिए कांग्रेस के लिए यह फैसला आसान नहीं है। पार्टी हाईकमान को यह तय करना होगा कि वह प्रक्रिया के महत्व को प्राथमिकता देगा या विपक्षी एकजुटता को।

टीएमसी का आरोप – “सत्तारूढ़ पार्टी का औजार”

डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि JPC का अध्यक्ष लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन तय करते हैं, जबकि सदस्य संख्या के हिसाब से नामांकित होते हैं। इससे समिति का झुकाव स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ दल की ओर रहता है। उनका आरोप है कि JPC अब जनता की आवाज नहीं बल्कि सरकार के लिए एक “औपचारिकता” बन गई है।

कांग्रेस की रणनीतिक दुविधा

कांग्रेस ने पहले JPC में शामिल होने का संकेत दिया था क्योंकि उसे लगता है कि इस मंच पर अपनी बात रखी जा सकती है। लेकिन अब विपक्षी दलों के बहिष्कार ने कांग्रेस के सामने तीन विकल्प छोड़े हैं— JPC में बने रहना और विपक्षी एकता को खतरे में डालना। JPC का बहिष्कार करना और विपक्ष की एकजुटता को मजबूत करना। सशर्त भागीदारी का रास्ता, यानी समिति में रहकर विरोध दर्ज कराना। इनमें से कौन-सा रास्ता कांग्रेस चुनती है, यह आने वाले दिनों में तय करेगा कि विपक्षी राजनीति किस दिशा में जाती है।

आगे का रास्ता

जेपीसी को शीतकालीन सत्र में अपनी रिपोर्ट पेश करनी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस किस ओर झुकती है। विपक्षी एकता की मजबूती या कमजोरी, दोनों ही परिदृश्य भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विपक्ष की रणनीतिक सामंजस्य और भविष्य की दिशा तय करेगा। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हिरासत में लिए जाने पर पद से हटाने वाले विधेयक ने संसद से लेकर विपक्ष तक हलचल मचा दी है। टीएमसी, सपा और AAP पहले ही JPC से अलग हो चुके हैं। कांग्रेस पर अब विपक्षी एकता का दबाव है। अगर वह समिति में बनी रहती है तो विपक्ष बंटा हुआ दिखाई देगा, और अगर बाहर होती है तो सरकार पर निगरानी का एक मंच कमजोर पड़ जाएगा। यानी, JPC विवाद सिर्फ एक समिति का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि 2025 की राजनीति में विपक्ष साझा ताकत के रूप में खड़ा होगा या बिखरे हुए मोर्चे की तरह दिखेगा। प्रकाश कुमार पांडेय

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