मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर अंदरूनी हलचल की चर्चाएं तेज हैं। दतिया के अचानक आए नतीजों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी लंबी बातचीत और इसके तुरंत बाद उनके खिलाफ एक पूर्व आईएफएस की ओर से EOW में शिकायत दर्ज होने की टाइमिंग ने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। इतना ही नहीं उनके करीबी रहे पूर्व मंत्री भूपेन्द्र सिंह के खिलाफ भी शिकायत की गई है। पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखा जाए तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर सत्ता और प्रभाव को लेकर कोई नई राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है?
दतिया नतीजों के बाद क्यों सक्रिय हुए शिवराज?
दिल्ली से भोपाल लौटते ही EOW शिकायत क्यों?
मध्यप्रदेश में पर्दे के पीछे सत्ता का खेल?
अपनों के बीच बढ़ती सियासी खींचतान?
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि शिवराज के खिलाफ पूर्व आईएफएस आजाद सिंह डबास की ओर से EOW में की गई शिकायत सीधे किसी राजनीतिक फैसले का हिस्सा है। किसी सरकारी एजेंसी में शिकायत या केस दर्ज होना अपने आप में किसी नेता के खिलाफ राजनीतिक साजिश का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन राजनीति में टाइमिंग अक्सर कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। दतिया के नतीजे, शिवराज की सक्रियता, दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात और फिर EOW की कार्रवाई—इन घटनाओं के बीच राजनीतिक कनेक्शन तलाशे जाने लगे हैं। सवाल यह भी है कि क्या मध्य प्रदेश बीजेपी में पुराने और नए सत्ता केंद्रों के बीच प्रभाव की कोई खींचतान चल रही है?
शिवराज सिंह चौहान लंबे समय तक मध्य प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे हैं। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बावजूद प्रदेश की राजनीति में उनकी पकड़ और जनाधार को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। ऐसे में उनके राजनीतिक कदमों पर नजर रहना स्वाभाविक है।
दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश में मौजूदा नेतृत्व अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटा है। ऐसे में यदि संगठन और सत्ता के भीतर अलग-अलग नेताओं के समर्थक अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने की कोशिश करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाएं तेज होती हैं।
सबसे दिलचस्प पहलू है “अपने ही बनाम अपने” की राजनीति। बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी में सार्वजनिक टकराव कम दिखाई देता है, लेकिन सत्ता के गलियारों में राजनीतिक समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। ऐसे में अगर किसी बड़े नेता के खिलाफ उनके ही दौर से जुड़े अधिकारी या पुराने राजनीतिक सहयोगी सक्रिय दिखाई दें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि इसके पीछे सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया है या कोई बड़ा राजनीतिक संदर्भ भी है।
फिलहाल तीन संभावनाएं चर्चा में हैं—पहली, EOW की शिकायत पूरी तरह कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। दूसरी, शिकायत का राजनीतिक समय महज संयोग हो सकता है। और तीसरी, इसके पीछे मध्य प्रदेश की अंदरूनी राजनीति में चल रही किसी बड़ी खींचतान की भूमिका हो सकती है।
यही वजह है कि अभी सबसे जरूरी है दावों और तथ्यों को अलग-अलग रखना। जब तक EOW की कार्रवाई, शिकायत में लगाए गए आरोपों और संबंधित दस्तावेजों की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इसे नेतृत्व परिवर्तन की कवायद कहना राजनीतिक अनुमान ही होगा।
लेकिन इतना जरूर है कि दतिया से शुरू हुई राजनीतिक हलचल ने भोपाल से दिल्ली तक नए सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। क्या यह महज घटनाओं का संयोग है या मध्य प्रदेश बीजेपी में किसी बड़े सत्ता-समीकरण की आहट? आने वाले दिनों में नेताओं की सक्रियता, संगठन के फैसले और जांच की दिशा इस कहानी के अगले अध्याय तय कर सकते हैं।