बिहार SIR बवाल: जिन 10 सीटों से सबसे ज्यादा नाम हटे, 2020 में किसका चला था सिक्का?
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत 65 लाख से अधिक नामों को मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। शुक्रवार को चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों से साफ हुआ कि गोपालगंज, किशनगंज, मोतिहारी, कुचायकोट जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक नामों की कटौती हुई है। इनमें से अधिकांश सीटें 2020 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए के पाले में गई थीं, जिससे राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ गई है।
चुनाव आयोग के अनुसार, जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या में मृतक, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर बस चुके लोग, और एक से अधिक जगहों पर नाम वाले लोग शामिल हैं। वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह “सुनियोजित साजिश” हो सकती है, जिससे जनसमर्थन को प्रभावित किया जा सके।
कहां से कटे सबसे ज्यादा नाम?
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार
पटना: 3,95,500 नाम हटे
मधुबनी: 3,52,545 नाम
पूर्वी चंपारण: 3,16,793 नाम
गोपालगंज: 3,10,363 नाम
किशनगंज: लगभग 2.5 लाख
पूर्णिया, भागलपुर, मोतिहारी, कुचायकोट, कटिहार सहित अन्य जिले भी सूची में शामिल हैं
2024 की मतदाता सूची की तुलना में गोपालगंज में 13.9%, किशनगंज में 10.5%, पूर्णिया में 9.7%, मधुबनी में 8.7%, और भागलपुर में 7.8% मतदाताओं को हटाया गया है। यह कटौती राज्य की कुल मतदाता संख्या का करीब 6.5% है, जोकि किसी भी राज्य चुनाव की पूर्व तैयारी में असाधारण मानी जा रही है।
2020 में किसका रहा दबदबा इन सीटों पर?
चुनाव विश्लेषकों के अनुसार SIR के तहत जिन 10 विधानसभा सीटों से सबसे ज्यादा नाम हटे हैं। वहां वर्ष 2020 में 7 सीटें सत्तारूढ़ एनडीए (BJP-JDU) के पास थीं। 3 सीटों पर महागठबंधन (RJD, कांग्रेस और वामपंथी दल) को जीत मिली थी।
इन प्रमुख सीटों का 2020 का चुनावी परिणाम
विधानसभा सीट 2020 विजेता पार्टी प्रमुख प्रतिद्वंदी नाम कटौती स्तर
गोपालगंज BJP RJD सबसे अधिक (13.9%)
कुचायकोट JDU RJD उच्च
किशनगंज कांग्रेस AIMIM अत्यधिक (10.5%)
मोतिहारी BJP INC उच्च
मधुबनी BJP CPI(ML) बहुत अधिक (8.7%)
पूर्णिया JDU RJD काफी (9.7%)
भागलपुर BJP RJD उल्लेखनीय (7.8%)
कटिहार JDU INC मध्यम
अररिया RJD BJP अपेक्षाकृत कम
सीतामढ़ी BJP CPI मध्यम
चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि सबसे ज्यादा प्रभावित सीटों पर 70% से अधिक हिस्सेदारी 2020 में एनडीए के पास थी। इसीलिए सत्तारूढ़ गठबंधन की बेचैनी स्वाभाविक है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
आरजेडी प्रवक्ता मनोज झा ने कहा, “यह केवल डेटा क्लीनिंग नहीं है, यह मताधिकार से वंचित करने की योजना है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने सफाई दी। “नाम वही कटे हैं जो या तो मृत हो चुके थे या दूसरी जगह ट्रांसफर हो गए थे। विपक्ष बिना वजह भ्रम फैला रहा है।
नाम क्यों हटाए गए?
चुनाव आयोग ने SIR के तहत नाम कटौती को तर्कसंगत बताते हुए कहा 22 लाख नाम उन मतदाताओं के थे जिनकी मृत्यु हो चुकी है। 36 लाख वे लोग थे जो अब स्थायी रूप से अन्य राज्यों/शहरों में रह रहे हैं। 7 लाख नाम दोहराव की वजह से हटाए गए हैं। आयोग के अनुसार जिनका नाम गलत तरीके से कट गया है। वे 1 सितंबर 2025 तक फॉर्म 6 भरकर अपना नाम फिर से जुड़वा सकते हैं।
राजनीतिक असर और आगे की राह
SIR की प्रक्रिया ने बिहार की चुनावी ज़मीन को गर्मा दिया है। विपक्ष इसे एक सुनियोजित रणनीति बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “डिजिटल सफाई” का नाम दे रहा है। आगामी 2025 विधानसभा चुनाव या 2026 लोकसभा चुनाव में इन नामों की बहाली या कटौती का असर निर्णायक हो सकता है, खासकर करीबी मुकाबले वाली सीटों पर। मतदाता जागरूकता और सूची की पारदर्शिता को लेकर अब सामाजिक संगठनों और मीडिया की भूमिका और भी अहम हो गई है।
बिहार में मतदाता सूची से नामों की कटौती ने राजनीतिक समीकरणों को झकझोर दिया है। जिन क्षेत्रों में मतदाता सूची में बड़ी कटौती हुई है, वहां का पिछला चुनावी इतिहास और आगामी रणनीति दोनों को अब नए सिरे से समझना होगा। विपक्ष और सत्ता दोनों के लिए यह नामों की गणित, अगली चुनावी बाज़ी का आधार बन सकती है।..( प्रकाश कुमार पांडेय)