मिडिल ईस्ट संकट में मोदी की सक्रिय कूटनीति
Middle East crisis: पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी संतुलित और सक्रिय कूटनीति का परिचय दिया है। नरेंद्र मोदी ने हालात की गंभीरता को देखते हुए एक ही दिन में पांच देशों के शीर्ष नेताओं से बातचीत कर वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को मजबूती से रखा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव ने जहां पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है, वहीं इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।
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जंग के बीच भारत की पहल
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पांच देशों से पीएम की बातचीत
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होर्मुज पर भारत का फोकस
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ऊर्जा संकट पर भारत की चिंता
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खाड़ी देशों संग रिश्ते मजबूत
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शांति के लिए कूटनीति पर जोर
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भारतीयों की सुरक्षा बनी प्राथमिकता
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ईरान युद्ध से वैश्विक असर
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तेल आपूर्ति पर मंडराया संकट
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भारत ने संतुलित रुख अपनाया
Israel and America war on Iran: दरअसल, ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमलों के 20 दिन बीत चुके हैं। इस दौरान हालात लगातार बिगड़ते गए और ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण Strait of Hormuz को बंद कर दिया। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति होती है। इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हड़कंप मच गया और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की चिंता बढ़ गई। भारत में भी इस संकट का असर दिखने लगा है। कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता को लेकर लोगों में आशंका और घबराहट का माहौल बन गया है। ऐसे में भारत सरकार ने कूटनीतिक मोर्चे पर तेजी से कदम बढ़ाते हुए स्थिति को संभालने की कोशिश शुरू कर दी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कतर, जॉर्डन, ओमान, फ्रांस और मलेशिया के नेताओं से फोन पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बहाल करने के लिए संवाद और कूटनीति को सबसे प्रभावी माध्यम बताया। साथ ही उन्होंने ऊर्जा ढांचे पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा भी की। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से बातचीत में पीएम मोदी ने न केवल ईद की शुभकामनाएं दीं, बल्कि भारत की ओर से ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों की निंदा करते हुए कतर के साथ एकजुटता भी जताई। उन्होंने कतर में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और देखभाल के लिए आभार व्यक्त किया।
इसी तरह, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय से बातचीत में प्रधानमंत्री ने उन्हें “भाई” कहकर संबोधित किया और क्षेत्रीय हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऊर्जा संसाधनों पर हमले न केवल तनाव बढ़ाते हैं, बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी खतरे में डालते हैं। दोनों देशों ने वस्तुओं और ऊर्जा की मुक्त आवाजाही बनाए रखने पर सहमति जताई।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बातचीत में भी यही स्वर देखने को मिला। दोनों नेताओं ने माना कि हालात को नियंत्रण में लाने के लिए तुरंत तनाव कम करना जरूरी है और इसके लिए कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भारत और फ्रांस ने इस दिशा में मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक के साथ चर्चा में प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान की भूमिका की सराहना की, खासकर क्षेत्र में फंसे भारतीयों की सुरक्षित वापसी को लेकर। उन्होंने ओमान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की भी बात दोहराई।
वहीं, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से बातचीत में भी प्रधानमंत्री ने क्षेत्रीय संकट पर चिंता जताते हुए शांति बहाली के लिए साझा प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। इस दौरान दोनों नेताओं ने संवाद के जरिए समाधान निकालने की प्रतिबद्धता दोहराई। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट पर सक्रियता दिखाई हो। वे कतर, जॉर्डन और ओमान के नेताओं से पहले भी दो-दो बार बात कर चुके हैं। इसके अलावा, भारत ने ईरान और इजरायल समेत खाड़ी क्षेत्र के कई अन्य देशों के साथ भी लगातार संपर्क बनाए रखा है।
इस पूरी कूटनीतिक कवायद का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत ने एक संतुलित रुख अपनाया है। उसने किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने के बजाय शांति, संवाद और स्थिरता पर जोर दिया है। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह रणनीति न केवल तत्काल संकट को संभालने में मददगार होगी, बल्कि भविष्य में उसकी वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगी। पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भारत की सक्रियता यह दर्शाती है कि वह अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर जिम्मेदार और प्रभावशाली भूमिका निभाने के लिए तैयार है।