नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग के बाद देश एक नई सुबह की ओर बढ़ रहा है। कभी गोलियों की गूंज और बारूदी सुरंगों के धमाकों से दहलने वाला बस्तर आज शांति और विकास की नई इबारत लिख रहा है। इस बार की दिवाली जवानों के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि नक्सलवाद पर बड़ी जीत के बाद यह पहली दिवाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बस्तर पहुंचे और जवानों के साथ दिवाली मनाई। जवानों के शौर्य और बलिदान को नमन किया, तो साथ ही एक बड़ी चेतावनी भी दी। पीएम ने कहा कि जंगलों से नक्सली मिट गए हैं, लेकिन दिमागी नक्सली अभी मौजूद हैं। यानी खतरा पूरी तरह टला नहीं है। देखिए बस्तीर से हमारी ये खास रिपोर्ट।
दीपावली पर बस्तर पहुंचे पीएम मोदी
जवानों के बीच पीएम की दिवाली
नक्सलवाद पर बोले पीएम मोदी
नक्सलवाद पर जीत, खतरा अभी बाकी!
जंगल शांत, वैचारिक जंग बाकी
नक्सलियों की कमर टूटी,सोच बाकी?
अब वैचारिक लड़ाई की चुनौती
बस्तर में जवानों के बीच प्रधानमंत्री 7बस्तर की धरती…जहां कभी नक्सलवाद का खौफ था…आज वहां जवानों के शौर्य और साहस की गूंज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में मिली सफलता के बाद जवानों के बीच दिवाली मनाई। पीएम ने इस मौके को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि नक्सलवाद पर जीत के बाद यह पहली दिवाली है।पीएम मोदी ने जवानों के बलिदान को नमन किया और कहा कि आंतरिक सुरक्षा मजबूत होती है तो बाहरी दुश्मन भी देश का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन जब आंतरिक सुरक्षा कमजोर होती है, तभी बाहरी दुश्मन हावी होने की कोशिश करते हैं।
पुरानी सरकारों पर निशाना प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में नक्सलवाद के पुराने दौर को याद करते हुए पूर्ववर्ती सरकारों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था, जब जितने नक्सली मारे जाते थे, उससे ज्यादा हमारे वीर जवान शहीद होते थे। नक्सली संगठनों के मुखिया जश्न मनाते थे। उस दौर में नक्सलवाद को लाइलाज बीमारी मानकर छोड़ दिया गया था।पीएम ने कहा कि देश ऐसे रवैये से नहीं चलता कि सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा। दुश्मनों को उनके मंसूबों में नाकाम करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। 2014 में सरकार बदलने के बाद यही इच्छाशक्ति दिखाई गई और हालात बदलने लगे।
जवानों को खुली छूट, बदली रणनीति
प्रधानमंत्री ने सुरक्षा बलों की सफलता के पीछे सरकार की बदली रणनीति को भी अहम बताया। उन्होंने कहा कि पहले सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हुए थे, लेकिन उनकी सरकार ने जवानों को निर्णय लेने की पूरी आजादी दी। नक्सली संगठनों को मिलने वाले समर्थन और संसाधनों पर भी प्रहार किया गया।पीएम के मुताबिक सरकार का लक्ष्य सिर्फ नक्सलियों को खत्म करना नहीं था, बल्कि किसी मां की गोद सूनी न हो और किसी युवा का भविष्य बर्बाद न हो, यह सुनिश्चित करना था। बिना प्रचार और दिखावे के संवेदनशीलता के साथ अभियान चलाया गया और माओवादी आतंकवाद की कमर तोड़ी गई।
बड़ी सफलता, लेकिन चुनौती बरकरार
प्रधानमंत्री ने जवानों के शौर्य का उल्लेख करते हुए एक बड़ी उपलब्धि का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछले 47 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि एक साल में सीआरपीएफ के किसी जवान को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ी। यह जवानों के साहस, संयम और समर्पण की जीत है।लेकिन इस जीत के बीच प्रधानमंत्री ने वैचारिक चुनौती को लेकर भी आगाह किया। जंगलों में हथियार उठाने वाले नक्सलियों के कमजोर पड़ने के बावजूद नक्सली विचारधारा और उसके समर्थकों से सतर्क रहने की जरूरत है। यानी लड़ाई अब केवल बंदूक और बारूद तक सीमित नहीं है।
जीत को स्थायी बनाने की चुनौती
बस्तर में प्रधानमंत्री का जवानों के साथ दिवाली मनाना केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के सम्मान और उनके मनोबल का संदेश भी है। नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता को अब स्थायी शांति, विकास और विश्वास में बदलना सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि बंदूकें शांत होने के बाद भी विचारों की लड़ाई बाकी रह सकती है। साफ है…जंगलों में नक्सलवाद की चुनौती कमजोर हुई है, लेकिन देश अब इस खतरे की किसी भी नई शक्ल को लेकर सतर्क रहना चाहता है।