Dussehra 2026: दशहरे पर इन जगहों पर नहीं जलाया जाता रावण का पुतला, मध्य प्रदेश के दो शहरों में होती है विशेष पूजा

देशभर में विजयादशमी पर रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन भारत की सांस्कृतिक विविधता में कुछ ऐसी परंपराएं भी हैं, जहां रावण को सम्मान के साथ याद किया जाता है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का रावण गांव और मंदसौर ऐसे ही प्रमुख उदाहरण हैं। यहां की स्थानीय मान्यताओं के अनुसार रावण को ग्राम देवता, पूर्वज या परिवार से जुड़ा सम्मानित पात्र माना जाता है। देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग रावण की विद्वता, शिवभक्ति और पारिवारिक परंपराओं के कारण उसका पुतला जलाने से परहेज करते हैं। इन स्थानों पर दशहरे का दिन सामान्य रावण दहन से अलग तरीके से मनाया जाता है। कहीं विशेष पूजा होती है, कहीं धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं और कहीं स्थानीय समुदाय अपनी पुरानी परंपरा को निभाता है। हालांकि, इन मान्यताओं और रीति-रिवाजों के पीछे स्थानीय इतिहास तथा लोककथाएं जुड़ी हैं, जिनकी व्याख्या अलग-अलग समुदायों में अलग हो सकती है।

विदिशा के रावण गांव में रावण को ग्राम देवता मानकर निभाई जाती है पुरानी परंपरा
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में गंजबासौदा के पास नटेरन क्षेत्र का रावण गांव अपनी अनूठी धार्मिक मान्यता के लिए जाना जाता है। यहां रावण को केवल रामायण के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि रावण बाबा के रूप में पूजने की परंपरा प्रचलित है। गांव में रावण की करीब 12 फीट लंबी लेटी हुई प्रतिमा होने की बात कही जाती है। स्थानीय लोगों की आस्था है कि रावण बाबा गांव की रक्षा करते हैं। इसी विश्वास के चलते दशहरे पर यहां पुतला दहन नहीं किया जाता। ग्रामीण मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना, आरती, रामायण पाठ और कीर्तन करते हैं। गांव में विवाह के अवसर पर पहला निमंत्रण पत्र रावण बाबा को अर्पित करने और हल्दी-तेल की रस्म से जुड़ी परंपरा भी बताई जाती है। इस तरह यहां दशहरा स्थानीय आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है।

मंदसौर में रावण को मंदोदरी का मायका पक्ष मानकर दिया जाता है दामाद जैसा सम्मान
मध्य प्रदेश के मंदसौर में रावण से जुड़ी एक अलग धार्मिक मान्यता प्रचलित है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इस शहर का प्राचीन नाम दशपुर था और इसे रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। इसी संबंध के कारण कुछ स्थानीय लोग रावण को नगर का दामाद मानकर सम्मान देते हैं। मंदसौर के खानपुरा क्षेत्र में रावण की लगभग 35 फीट ऊंची प्रतिमा होने की जानकारी मिलती है। दशहरे पर यहां कुछ लोग प्रतिमा की पूजा करते हैं और उसके पैर में रक्षासूत्र बांधते हैं। महिलाओं के घूंघट करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इन मान्यताओं के चलते यहां का दशहरा देश के अन्य हिस्सों से अलग दिखाई देता है। हालांकि, ये रीति-रिवाज स्थानीय धार्मिक विश्वासों से जुड़े हैं और सभी निवासियों की मान्यता एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।

उत्तर प्रदेश के बिसरख गांव में रावण से जुड़ी पूर्वजों की मान्यता आज भी है प्रचलित
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव को स्थानीय मान्यता में रावण की जन्मस्थली माना जाता है। कहा जाता है कि गांव का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रवा से जुड़ा है। यहां के कुछ लोग रावण को अपना पूर्वज और विद्वान ब्राह्मण मानते हैं। इसी वजह से गांव में दशहरे की परंपरा कई दूसरे स्थानों से अलग बताई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां रावण दहन के बजाय धार्मिक अनुष्ठान और पूजा पर जोर दिया जाता है। रावण को लेकर यहां की आस्था रामायण के प्रचलित दृष्टिकोण से अलग सांस्कृतिक पक्ष सामने रखती है। इस परंपरा के कारण बिसरख का नाम दशहरे के समय विशेष रूप से चर्चा में आता है।

राजस्थान के जोधपुर और कानपुर में भी रावण की पूजा से जुड़ी हैं खास परंपराएं
राजस्थान के जोधपुर स्थित मंडोर को लेकर मान्यता है कि यहां रावण और मंदोदरी का विवाह हुआ था। कुछ श्रीमाली गोधा ब्राह्मण समुदाय के लोग खुद को रावण का वंशज मानते हैं। इस समुदाय से जुड़ी परंपराओं में दशहरे के अवसर पर धार्मिक कर्मकांड और श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। वहीं उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवाला क्षेत्र में दशानन मंदिर स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह साल में विशेष रूप से दशहरे पर खोला जाता है। यहां श्रद्धालु रावण के स्वरूप के दर्शन करने पहुंचते हैं। इन स्थानों पर रावण से जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग हैं। कहीं वंश परंपरा महत्वपूर्ण है, तो कहीं उसकी विद्वता और धार्मिक ज्ञान को याद किया जाता है।

हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ में रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यता के कारण नहीं होता पुतला दहन
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ को भगवान शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी और अपने सिर अर्पित किए थे। इसी कथा के कारण स्थानीय परंपरा में रावण की शिवभक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि रावण का पुतला जलाने से भगवान शिव के प्रति अनादर हो सकता है, इसलिए यहां रावण दहन नहीं किया जाता। भारत के इन अलग-अलग स्थानों की परंपराएं बताती हैं कि दशहरे को मनाने का तरीका हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है। कहीं रावण दहन होता है, तो कहीं स्थानीय इतिहास, आस्था और लोकपरंपराओं के आधार पर उसकी पूजा की जाती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

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