संघ के सौ साल…: डॉक्टर हेडगेवार ने शुरू की थी गुरु-दक्षिणा की परंपरा…संघ का स्वयंसेवक नहीं मांगता चंदा …

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डॉक्टर हेडगेवार ने शुरू की थी गुरु-दक्षिणा की परंपरा..संघ का स्वयंसेवक नहीं मांगता चंदा ..!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपराओं में सबसे अनोखी और विशेष परंपरा है गुरु-दक्षिणा उत्सव। इस परंपरा की शुरुआत संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1928 में की थी। नाना पालकर अपनी जीवनी में लिखते हैं कि उस वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर डॉ. हेडगेवार ने नागपुर शाखा के स्वयंसेवकों से कहा कि वे कार्यक्रम में फूल और गुरुदक्षिणा (श्रद्धानुसार लिफाफे में धनराशि) लेकर आएं। स्वयंसेवकों के मन में प्रश्न था कि ये गुरुदक्षिणा किसे दी जाएगी? कईयों को लगा शायद डॉ. हेडगेवार स्वयं या फिर अन्ना सोहानी (तत्कालीन प्रशिक्षण प्रमुख) को यह अर्पित करनी होगी। लेकिन जब सभी शाखा में एकत्र हुए, तब यह देखकर वे हैरान रह गए कि गुरुदक्षिणा और फूल किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भगवा ध्वज को अर्पित किए गए।

डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि “भगवा ध्वज हजारों सालों से हमारी संस्कृति और राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत रहा है। कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, उसमें कुछ न कुछ खामियां होती हैं। इसलिए हमारा गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि भगवा ध्वज होगा।”

पहली गुरुदक्षिणा का विवरण

1928 के पहले गुरु-दक्षिणा उत्सव में कुल 84 रुपये 50 पैसे एकत्र हुए। कुछ स्वयंसेवकों ने आधे पैसे तक अर्पित किए थे। आज की कीमतों के अनुसार यह राशि लगभग 10–15 हजार रुपये के बराबर होती है। इस कदम के पीछे डॉ. हेडगेवार की दूरदर्शिता थी। उन्होंने सुनिश्चित किया कि संघ किसी व्यक्ति-पूजा पर आधारित न होकर, ध्वज और विचार के प्रति समर्पित रहे। यही कारण है कि आज भी RSS अपने बजट का पूरा संचालन गुरुदक्षिणा से ही करता है।

संघ की आत्मनिर्भरता

आज सैकड़ों प्रचारक और संघ के कार्यालयों का खर्च केवल स्वयंसेवकों द्वारा दी गई गुरुदक्षिणा से चलता है। संघ का कोई स्वयंसेवक सार्वजनिक रूप से चंदा मांगते नहीं दिखेगा। कई ऐसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली लोग भी समय-समय पर गुरुदक्षिणा अर्पित करते आए हैं, जिनके नाम चौंकाने वाले होते हैं। जैसे 2017 में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ दिल्ली में ही करीब 95,000 लोगों ने गुरुदक्षिणा दी थी। इस प्रकार, डॉ. हेडगेवार द्वारा शुरू की गई यह परंपरा न केवल संघ की आर्थिक रीढ़ बनी, बल्कि संगठन को व्यक्ति पूजा से बचाकर विचार और ध्वज के प्रति समर्पण का उदाहरण भी स्थापित किया। ( प्रकाश कुमार पांडेय )

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