बिहार चुनाव में ‘एमपी फैक्टर’: एमपी के ये OBC चेहरे बनेंगे हथियार….लिस्ट में सीएम मोहन यादव से लेकर शिवराज और कई दिग्गजों के नाम….!

Bihar elections CM Mohan Yadav Shivraj

बिहार चुनाव में एमपी के ओबीसी चेहरे बनेंगे हथियार….लिस्ट में सीएम मोहन यादव से लेकर शिवराज और कई दिग्गजों के नाम

भोपाल/पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का बिगुल बजते ही राजनीति का पारा चढ़ गया है। जैसे-जैसे बिहार में चुनावी रंग गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे दूसरे राज्यों के बड़े नेता भी वहां सक्रिय होने लगे हैं। इस बार मध्य प्रदेश की सियासत बिहार में खास भूमिका निभाने जा रही है। वजह साफ है—यहां के ओबीसी चेहरे दोनों ही दलों, बीजेपी और कांग्रेस के लिए ‘चुनावी हथियार’ बनकर सामने आ रहे हैं। खासकर यादव, पटेल और गुर्जर समाज से जुड़े नेताओं को बिहार की ओबीसी बहुल सीटों पर उतारने की रणनीति तैयार की गई है।

भाजपा का ‘मोहन-शिवराज’ फॉर्मूला

भाजपा इस चुनाव में अपने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को ‘यादव वोट बैंक’ के सामने बड़ा चेहरा बनाने की योजना पर काम कर रही है। यूपी-बिहार की राजनीति में यादव वंश का असर हमेशा से अहम रहा है। ऐसे में भाजपा, मोहन यादव को इस प्रभाव को चुनौती देने के लिए आगे बढ़ा रही है। मोहन यादव इससे पहले महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए स्टार प्रचारक बन चुके हैं। संगठन का मानना है कि मोहन की ओबीसी पृष्ठभूमि और उनकी तेजतर्रार छवि बिहार में भाजपा को नए वोटरों से जोड़ने में मदद करेगी। वहीं, केंद्रीय कृषि मंत्री और पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की किसान हितैषी और संवेदनशील नेता की छवि को भाजपा बिहार में हथियार की तरह इस्तेमाल करेगी। खासकर मखाना किसानों के लिए उनके प्रयास और गरीबों से जुड़ाव उन्हें बिहार में लोकप्रिय बनाता है। शिवराज को ग्रामीण और किसान वर्ग के बीच मजबूत पैठ बनाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

कांग्रेस का ‘यादव–पटेल’ कार्ड

दूसरी ओर कांग्रेस भी ओबीसी समीकरण साधने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी ने अपने भरोसेमंद नेताओं को बिहार चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी शुरू कर दी है।
एमपी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव और उनके भाई सचिन यादव को बिहार चुनाव अभियान में अहम जिम्मेदारी देने की रणनीति बनाई गई है। दोनों यादव नेताओं की पहचान जमीनी और संगठनात्मक कामकाज के लिए है, जो बिहार के यादव वोट बैंक को साधने में सहायक हो सकते हैं।

इसके अलावा, राज्यसभा सांसद अशोक सिंह (यादव), पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल, वरिष्ठ नेता सत्यनारायण पटेल और दिनेश गुर्जर भी बिहार के चुनावी रण में उतारे जाएंगे। कांग्रेस का फोकस बिहार के ओबीसी बहुल इलाकों पर है। राहुल गांधी की “वोट अधिकार यात्रा” से जुड़े इन नेताओं को वहां मोर्चा संभालने का दायित्व दिया जा सकता है।

ओबीसी समीकरण पर टिकी नजर

बिहार की राजनीति में ओबीसी समाज, विशेषकर यादव और कुर्मी (पटेल) समुदाय का वोट निर्णायक माना जाता है। यही वजह है कि दोनों ही दल मध्य प्रदेश के ओबीसी चेहरों को आगे कर रहे हैं। भाजपा जहां यादव समाज को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस पटेल और यादव कार्ड पर दांव खेल रही है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बाहरी नेताओं को बिहार भेजना सिर्फ प्रचार रणनीति नहीं, बल्कि संगठनात्मक संदेश भी है। इससे यह धारणा बनाई जा रही है कि पार्टी का फोकस ओबीसी समुदाय पर पूरी तरह है।

बिहार चुनाव में ‘एमपी फैक्टर’

बीजेपी और कांग्रेस दोनों मान रही हैं कि मध्य प्रदेश के ओबीसी नेताओं का बिहार चुनाव में असर दिख सकता है। भाजपा को उम्मीद है कि मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान की जोड़ी यादव और किसान वोटरों पर सीधा असर डालेगी। कांग्रेस को भरोसा है कि अरुण–सचिन यादव और पटेल नेताओं की टीम राहुल गांधी की यात्रा को बिहार में मजबूती देगी। कुल मिलाकर, बिहार चुनावी रणभूमि में मध्य प्रदेश का ‘ओबीसी फैक्टर’ इस बार पूरी तरह से हावी नजर आ रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इन चेहरों की रणनीति किस पार्टी को जीत की राह दिखाती है। बिहार चुनाव सिर्फ स्थानीय समीकरणों पर नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों की राजनीति पर भी टिका हुआ है। मध्य प्रदेश के ओबीसी नेता अब वहां की सियासत में नई भूमिका निभाने जा रहे हैं, और यही ‘बाहरी ताकत’ दोनों दलों की जीत-हार तय कर सकती है।

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