इंदौर में दूषित पानी से मौत पर NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान…दो सप्ताह में मांगी पूरी रिपोर्ट

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इंदौर में दूषित पानी से मौत पर एनएचआरसी ने लिया स्वतः संज्ञान…दो सप्ताह में मांगी पूरी रिपोर्ट

नई दिल्ली, 2 जनवरी 2026। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से 13 लोगों की मौत और 40 से अधिक लोगों के बीमार होने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने इस मामले को मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन से जुड़ा बताते हुए मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भागीरथपुरा क्षेत्र में पिछले कई दिनों से नागरिकों को सप्लाई किया जा रहा पानी दूषित था। स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत संबंधित विभागों और अधिकारियों से बार-बार की, लेकिन आरोप है कि प्रशासन की ओर से समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसी लापरवाही के चलते कई लोगों की तबीयत बिगड़ी और कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई, जबकि 40 से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने बयान में कहा है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में दी गई जानकारी सही पाई जाती है, तो यह घटना पीड़ितों के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला बनती है। सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना राज्य की मूलभूत जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का हनन है।

मीडिया रिपोर्ट, जो 31 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी, के अनुसार जिस मुख्य पाइपलाइन से क्षेत्र में पेयजल की आपूर्ति होती है। वह एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से होकर गुजरती है। बताया गया है कि इस मुख्य पाइपलाइन में रिसाव हो गया था, जिसके कारण सीवर का गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया। इसके अलावा, इलाके में पानी की कई वितरण लाइनें भी टूटी हुई पाई गईं, जिससे दूषित पानी सीधे घरों तक पहुंचता रहा।

घटना के बाद बड़ी संख्या में लोग उल्टी, दस्त, पेट दर्द और तेज बुखार जैसी शिकायतों के साथ अस्पताल पहुंचे। स्वास्थ्य विभाग ने स्थिति को गंभीर मानते हुए स्थानीय अस्पतालों में अतिरिक्त व्यवस्था की। कुछ मरीजों की हालत नाजुक बताई जा रही है। वहीं, मृतकों के परिजनों में गहरा आक्रोश और शोक का माहौल है। एनएचआरसी ने मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से इस पूरे मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने रिपोर्ट में यह स्पष्ट करने को कहा है कि दूषित जल आपूर्ति के लिए कौन जिम्मेदार है, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की गई, पीड़ितों को क्या चिकित्सा सुविधा और मुआवजा दिया गया है तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

मानवाधिकार आयोग ने यह भी संकेत दिया है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आगे और सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। आयोग का कहना है कि नागरिकों को स्वच्छ और सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना सरकार और स्थानीय प्रशासन का संवैधानिक दायित्व है। इस दायित्व में लापरवाही सीधे तौर पर आम जनता के जीवन और स्वास्थ्य को खतरे में डालती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते उनकी शिकायतों पर ध्यान दिया गया होता, तो इतनी बड़ी जनहानि से बचा जा सकता था। क्षेत्र के निवासियों ने दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही मृतकों के परिवारों को उचित मुआवजा देने और बीमार लोगों के इलाज का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन करने की मांग भी उठ रही है।
यह घटना एक बार फिर शहरी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाल स्थिति और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जल आपूर्ति लाइनों की नियमित जांच, रखरखाव और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र मजबूत किए बिना ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। फिलहाल एनएचआरसी की नोटिस के बाद राज्य सरकार पर दबाव बढ़ गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार आयोग के निर्देशों के अनुरूप क्या कदम उठाती है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कितनी गंभीरता से कार्रवाई करती है।

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