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नक्सलवाद का काउंटडाउन…टॉप माओवादी कमांडर सुरेश का सरेंडर…जानें कैसे सिमटा रेड कॉरिडोर

DigitalDesk by DigitalDesk
March 30, 2026
in दिल्ली, मुख्य समाचार
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Naxalism countdown
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नक्सलवाद का काउंटडाउन…टॉप माओवादी कमांडर सुरेश का सरेंडर…जानें कैसे सिमटा रेड कॉरिडोर

काउंटडाउन के बीच बड़ा सरेंडर

भारत में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ जारी निर्णायक अभियान अब अपने अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है। केंद्र सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन से ठीक पहले घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं और जमीनी हालात यह संकेत दे रहे हैं कि “रेड कॉरिडोर” का दायरा लगातार सिमट रहा है। इसी काउंटडाउन के बीच आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से आई एक बड़ी खबर ने पूरे अभियान को नया मोड़ दे दिया है—टॉप माओवादी कमांडर सुरेश ने अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया है।

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36 साल का नक्सली सफर खत्म

करीब तीन दशकों से ज्यादा समय तक नक्सली आंदोलन का अहम चेहरा रहे सुरेश उर्फ चेल्लूरी नारायण राव, CPI (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के सदस्य और आंध्र-ओडिशा सीमा स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव थे। उनके साथ आठ अन्य कैडरों ने भी हथियार डाल दिए। इन कैडरों में प्लाटून कमांडर, एरिया कमेटी सदस्य और सक्रिय पार्टी सदस्य शामिल हैं, जो छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में लंबे समय से सक्रिय थे। इस सरेंडर को सुरक्षा एजेंसियां एक “मनोवैज्ञानिक जीत” के तौर पर देख रही हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर संगठन के नेतृत्व ढांचे पर असर डालता है।

सरेंडर बना मनोवैज्ञानिक वार

आत्मसमर्पण कार्यक्रम के दौरान आंध्र प्रदेश पुलिस के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में सभी नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत सुरेश को 25 लाख रुपये की सहायता दी जाएगी, जबकि अन्य कैडरों को उनकी भूमिका के अनुसार 1 से 5 लाख रुपये तक का पैकेज मिलेगा। इसके अलावा तत्काल राहत के तौर पर नकद सहायता भी दी गई है।

आंकड़ों में दिखती गिरती ताकत

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब केंद्र सरकार ने देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने के लिए व्यापक रणनीति पर काम किया है। पिछले दो वर्षों में सुरक्षा बलों ने लगातार ऑपरेशन चलाकर नक्सलियों के नेटवर्क को कमजोर किया है। आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में 317 नक्सली मारे गए, 862 गिरफ्तार हुए और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया। वहीं 2024 में 290 नक्सली मारे गए, 1,090 गिरफ्तार हुए और 881 ने सरेंडर किया था। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि संगठन के भीतर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

फंडिंग पर कसा शिकंजा

सिर्फ हथियारबंद कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार ने नक्सलियों की कमर तोड़ने की रणनीति अपनाई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के तहत बनाए गए विशेष विंग ने नक्सली फंडिंग पर सख्त प्रहार किया है। इस विंग ने 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां जब्त की हैं। राज्यों की एजेंसियों ने भी लगभग इतनी ही राशि की संपत्ति जब्त की है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय ने 12 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच की है। इस आर्थिक नाकेबंदी ने नक्सलियों के लॉजिस्टिक और सूचना तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।

सुरक्षा ढांचे में बड़ा निवेश

इसी के साथ केंद्र सरकार ने सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है। सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना के तहत पिछले 11 वर्षों में 3,331 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं, जो पहले के मुकाबले 155 प्रतिशत अधिक है। विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर योजना (SIS) के तहत विशेष बलों, खुफिया इकाइयों और पुलिस थानों को आधुनिक संसाधनों से लैस किया गया है। 246 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों के निर्माण और विस्तार के साथ ही कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा उपस्थिति मजबूत हुई है।

सरेंडर पॉलिसी बनी हथियार

हालांकि, सरकार की रणनीति केवल “गन बनाम गन” तक सीमित नहीं रही। पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति के जरिए नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। शिक्षा, रोजगार और आर्थिक सहायता के जरिए पूर्व उग्रवादियों को समाज में वापस स्थापित करने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में कैडर हथियार छोड़ने को तैयार हुए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच संसद में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई देने वाली है। लोकसभा में वामपंथी उग्रवाद से जुड़े प्रयासों पर चर्चा प्रस्तावित है, जहां सरकार अपनी उपलब्धियों और आगे की रणनीति का खाका पेश कर सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ यह निर्णायक लड़ाई अपने अंतिम चरण में जरूर है, लेकिन पूरी तरह खत्म होने के लिए सतत निगरानी, स्थानीय विकास और विश्वास बहाली बेहद जरूरी है। सुरेश जैसे बड़े कमांडर का आत्मसमर्पण निश्चित रूप से एक बड़ी सफलता है, लेकिन यह भी संकेत है कि संगठन अब दबाव में है और अपनी पकड़ खो रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि 31 मार्च की डेडलाइन के बाद तस्वीर कैसी होगी—क्या भारत खुद को पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित कर पाएगा, या फिर यह लड़ाई नए रूप में जारी रहेगी। फिलहाल इतना तय है कि “नक्सल काउंटडाउन” ने देश की आंतरिक सुरक्षा की कहानी को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

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Tags: #Naxalism countdown#Suresh surrenders#Top Maoist commander Suresh
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