होली 2026: आजीविका मिशन दीदियों का कमाल, फूलों–सब्जियों से तैयार हो रहा हर्बल गुलाल
केमिकल रंगों से बढ़ता खतरा
बाजार में बिकने वाले कई रंगों में रासायनिक तत्व पाए जाते हैं। इनसे त्वचा पर एलर्जी, खुजली, दाने और आंखों में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खासकर बच्चों और संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए ये रंग नुकसानदायक साबित होते हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश मॉलथोन की महिलाओं ने इस बार प्राकृतिक विकल्प तैयार करने का बीड़ा उठाया है। महिलाओं का कहना है कि वे ऐसा गुलाल बनाना चाहती थीं, जो पूरी तरह सुरक्षित हो और जिससे किसी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी न हो। इस सोच ने उन्हें हर्बल रंग बनाने की दिशा में प्रेरित किया।
फूलों और सब्जियों से बनता है रंग
हर्बल गुलाल बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक और प्राकृतिक है। इसमें टेसू (पलाश) और सेमल के फूलों का उपयोग किया जा रहा है।
- पीला और केसरिया रंग: टेसू और सेमल के फूलों को पहले धूप में सुखाया जाता है, फिर बारीक पीसकर छाना जाता है।
- हरा रंग: ताजी पालक और औषधीय पत्तियों के अर्क से तैयार किया जाता है।
- लाल और गुलाबी रंग: चुकंदर और स्थानीय वनस्पतियों के मिश्रण से बनाया जाता है।
इन सभी सामग्रियों को अच्छी तरह सुखाने के बाद महीन पाउडर में बदला जाता है, जिससे मुलायम और सुगंधित गुलाल तैयार होता है। इसमें किसी भी प्रकार के सिंथेटिक रंग या हानिकारक रसायन का प्रयोग नहीं किया जाता।
पर्यावरण के अनुकूल पहल
यह हर्बल गुलाल न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है। केमिकल रंग अक्सर जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं और मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। वहीं, प्राकृतिक रंग आसानी से मिट्टी में मिल जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते। इस पहल के जरिए महिलाएं लोगों को ‘इको-फ्रेंडली होली’ का संदेश भी दे रही हैं। उनका मानना है कि त्योहारों की खुशियां प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही मनाई जानी चाहिए।
महिलाओं के लिए बढ़ता रोजगार
मॉलथोन विकासखंड के अधिकारियों के अनुसार, पिछले वर्ष महिलाओं द्वारा तैयार किए गए हर्बल गुलाल को बाजार में अच्छा प्रतिसाद मिला था। इसी को देखते हुए इस साल उत्पादन बढ़ाया गया है। तैयार गुलाल को आकर्षक पैकिंग में सागर जिले के बाजारों और मेलों में बेचा जा रहा है।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
यह पहल दिखाती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, संसाधन और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं। हर्बल गुलाल निर्माण ने न केवल स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाया है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा को जमीनी स्तर पर साकार करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। गांव की महिलाएं अब केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उद्यमिता की राह पर भी मजबूती से कदम बढ़ा रही हैं।
सुरक्षित और खुशहाल होली का संदेश
इस बार सागर की होली केवल रंगों की नहीं, बल्कि जागरूकता और आत्मनिर्भरता की भी होगी। फूलों की खुशबू और सब्जियों से बने प्राकृतिक रंगों के साथ यह पहल एक सकारात्मक संदेश दे रही है—त्योहार मनाएं, लेकिन सेहत और प्रकृति का ख्याल रखते हुए। मॉलथोन की ये दीदियां साबित कर रही हैं कि बदलाव की शुरुआत गांवों से भी हो सकती है। उनकी मेहनत और नवाचार से इस बार होली के रंग और भी खास, सुरक्षित और सुगंधित होने वाले हैं।





