लोकसभा चुनावों के नतीजो के बाद एन डी ने सरकार बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया है। सरकार के सहयोगी दलों नरेंद्र मोदी को संसदीय दल का नेता चुन लिया है। 9 जून को शपथ नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ लेगें. लेकिन इस बीच लगातार राजनैतिक गलियारों से लेकर मीडिया की सुर्खियों तक सभी एक ही बात कर रहे हैं कि क्या गठबंदन सरकार चल पाएगी। इसकी वजह गठबंधन के दो दल जेडीयू और टीजीपी है। दोनों ही दल घटक दलों मे सबसे ज्यादा सासंद रखते हैं ऐसे में दोनो के सहयोग के बिना बीजेपी सरकार नहीं चला सकती। लेकिन दोनो ही दलों के नेताओं का पुराना रिकार्ड देखें तो दोनो ने ही जिन दलों का सहयोग किया वो लगातार नहीं रहा किसी न किसी कारण से गठबंधन टूटता रहा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू के बिहार में सरकार की कहानी किसी से छुपी नहीं है। हर बार कुछ महीनों और सालों में घटक दल ही बदल दिए जाते हैं । नीतीश कुमार के 2013 से लगभग इसी तरह का ट्रैक रिकार्ड देखने को मिला।
वही अगर टीडीपी के बात करें तो टीडीपी ने पहले एनडीए को वाजपेयी सरकार के समय समर्थन दिया लेकिन एक वोट से सरकार गिराने की कहानी भी टीडीपी सासंद के लोकसभा स्पीकर रहते हुए हुई। वहीं प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के खिलाफ 2018 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव टीडीपी लेकर आई थी। हांलाकि उससे सरकार को कोई खतरा नहीं था लेकिन बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चंद्र बाबू नायडू के रिश्ते भी उतार चढ़ाव वाले रहे। यही वजह है कि आज एक ही सवाल है कि इनसहयोगियों के चलते क्या एनडीए पांच साल बिना किसी गतिरोध के सरकार चला पाएगी। क्योंकि दोनो ही दल बीजेपी को बहुमत के जादुई आंकड़े 272 तक पंहुचने के लिए जरूरी है।