सिंगरौली के मोरवा में लगा जनविश्वास एवं सेवा सेतु शिविर उस वक्त सुर्खियों में आ गया, जब जनता की समस्याएं सुनने के लिए लगाए गए शिविर में बड़ी संख्या में कुर्सियां खाली दिखाई दीं। मंच पर जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद थे, विभागों के स्टॉल भी लगे थे, लेकिन जिन लोगों के लिए पूरा सरकारी अमला जुटा था, उनकी मौजूदगी अपेक्षा के मुताबिक नहीं रही। यही तस्वीर भाजपा विधायक रामनिवास शाह की नाराजगी की वजह बन गई।
विधायक ने मंच से उठाया सवाल
रामनिवास शाह ने सीधे प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की योजनाओं का मकसद तभी पूरा होगा, जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने अधिकारियों को संबोधित करते हुए यहां तक कहा कि अगर कलेक्टर और कमिश्नर अपना विभाग नहीं संभाल पा रहे हैं तो छुट्टी ले लें। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार विधायक ने यह भी कहा कि शिविर करीब दस दिन पहले से निर्धारित था, लेकिन हितग्राहियों तक इसकी सूचना पर्याप्त तरीके से नहीं पहुंची। यानी विधायक का मूल सवाल सिर्फ खाली कुर्सियों का नहीं था। सवाल था कि सरकारी योजना जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
कूलर बंद, अधिकारियों से कहा- पसीना महसूस कीजिए
विधायक ने कार्यक्रम स्थल पर कूलर बंद कराने की बात भी कही। उनका तर्क था कि जब तक अधिकारियों को गर्मी और पसीने का एहसास नहीं होगा, तब तक शायद गरीब की मेहनत और उसकी परेशानियों को महसूस करना मुश्किल होगा। यह बयान राजनीतिक भाषण से ज्यादा प्रशासनिक जवाबदेही के संदेश के तौर पर सामने आया। विधायक ने संकेत दिया कि सरकारी कार्यालयों में बैठकर योजनाएं बनाने से ज्यादा जरूरी है कि अधिकारी यह देखें कि जमीन पर उन योजनाओं का लाभ किसे मिल रहा है और कौन उससे छूट रहा है।
एसडीएम भी पहुंचे तो सुननी पड़ी खरी-खोटी
शिविर के दौरान एसडीएम के पहुंचने पर विधायक ने उन्हें भी मंच पर बुलाने और “ठंडा-गरम सुनने” की बात कही। इससे साफ था कि विधायक कम उपस्थिति को लेकर स्थानीय प्रशासन से जवाब चाहते थे। यहां तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। किसी शिविर में जनता कम पहुंचती है तो इसकी वजह केवल प्रशासनिक लापरवाही मान लेना जल्दबाजी होगी। सूचना का अभाव, समय, स्थानीय जरूरत, आवागमन, आयोजन की विश्वसनीयता और पिछले शिविरों का अनुभव, कई कारण हो सकते हैं। इसलिए कम भीड़ की वास्तविक वजह का प्रशासनिक आकलन जरूरी है।
जनविश्वास शिविर में जनता क्यों नहीं पहुंची?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है। अगर शिविर दस दिन पहले तय था, विभागों ने स्टॉल लगाए थे और अधिकारियों की मौजूदगी थी, तो फिर लोगों तक सूचना कितनी पहुंची? स्थानीय स्तर पर प्रचार-प्रसार कितना हुआ? क्या वार्ड और पंचायत स्तर पर हितग्राहियों को व्यक्तिगत सूचना दी गई? और क्या लोगों को भरोसा था कि शिविर में उनकी समस्या का समाधान मौके पर होगा? क्योंकि किसी भी जनसेवा शिविर की सफलता मंच, माइक और कुर्सियों की संख्या से नहीं, बल्कि वहां पहुंचे लोगों और उनकी समस्याओं के समाधान से तय होती है।
विधायक की नाराजगी का असली संदेश
रामनिवास शाह के तेवरों को सिर्फ अधिकारियों की फटकार के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। उनके बयान में एक राजनीतिक संदेश भी दिखाई देता है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। सरकार चाहे कितनी भी योजनाएं चलाए, अगर जरूरतमंद व्यक्ति को उसकी जानकारी नहीं है या वह सरकारी तंत्र तक पहुंच नहीं पा रहा है, तो जमीन पर उसका असर कमजोर पड़ सकता है। मोरवा की खाली कुर्सियों ने इसी अंतर को सामने ला दिया है। अब असली परीक्षा प्रशासन की है। यह पता लगाना होगा कि शिविर में कम संख्या में हितग्राही क्यों पहुंचे और अगली बार ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए क्या व्यवस्था की जाती है। क्योंकि जनविश्वास सिर्फ नाम से नहीं बनता। जनविश्वास तब बनता है, जब जनता को लगे कि सरकार उसकी बात सुनने के लिए सचमुच उसके बीच मौजूद है।





