क्या हैं संघ प्रमुख भागवत की मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ मुलाकात के मायने?

Meeting of RSS chief Mohan Bhagwat and Muslim religious leaders at Haryana Bhawan in Delhi

दिल्ली के हरियाणा भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ प्रमुख मोहन भागवत और मुस्लिम धर्म गुरुओं की मुलाकात हुई। 24 जुलाई की सुबह 10 बजे से शुरू हुई करीब 3 घंटे लंबी यह बैठक जिसमें भागवत के साथ संघ के अन्य पदाधिकारी भी मौजूद थे। जैसे दत्तात्रेय होसबोले, सुनील आंबेडकर, कृष्ण गोपाल, इंद्रेश कुमार जैसे और भी पदाधिकारी। बैठक से निकलते वक्त ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी के हाथों में दस्तावेज का एक पुलिंदा नजर आया। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि कुछ आंकड़े हो सकते हैं जिस पर चर्चा हुई हो। बैठक में एजेंट पर शामिल तमाम लोगों ने चुप्पी साध ली कि एजेंडा क्या रहा लेकिन यह जरूर कहा गया कि उन मुद्दों पर बातचीत हुई जिस पर आपसी भाईचारा बना रहे।

संवाद ही समाधान है। इसको लेकर 3 घंटे अलग-अलग विषयों पर चर्चा हुई हैं।

हम भारत में रहते हैं। हम सब भारतीय हैं। राष्ट्र सर्वोपरि है। इसका हमेशा ध्यान रखना चाहिए। राष्ट्र प्रथम है। संघ प्रमुख मोहन भागवत और उमर इलियासी साहब चीफ इमाम की मेहनत से कोशिश से यह पहली दफा यह मीटिंग हुई है। देखिए अब सवाल यह है कि आखिर इस मुलाकात के क्या मायने निकाले जाएं? पिछले कुछ सालों में मुस्लिम को लेकर संघ की विचारधारा और रणनीति में काफी बदलाव आया है। जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत की बड़ी भूमिका रही है। साल 2022 में सर संघ चालक पहली बार दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग पर बनी एक मस्जिद पहुंचे। साथ ही भागवत ने उत्तरी दिल्ली के आजादपुर में मदरसा तजादील कुरान का भी दौरा किया। मोहन भागवत के साथ संघ के पदाधिकारियों कृष्ण गोपाल और इंद्रेश कुमार भी थे। उस दौरान भागवत ने अखिल भारतीय इमाम संगठन के चीफ उमर अहमद इलियासी के साथ बैठक की थी। संघ प्रमुख ने उस वक्त कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों से भी मुलाकात की थी। जिसमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह, पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी और सैद शेरवानी जैसे कारोबारी शामिल थे।

तब इस बैठक में ज्ञानवापी विवाद, हिजाब विवाद और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। ऐसे में उम्मीद लगाई जा रही है कि मौजूदा हालातों को देखते हुए आज की बैठक में भी कुछ ऐसे ही मुद्दों पर मंथन हुआ होगा और इतना ही नहीं अक्टूबर 2022 में संघ प्रमुख ने हजरत निजामुद्दीन दरगाह का दौरा किया था और वहां दिए भी जलाए थे। मार्च 2023 से मुस्लिम आउटरीच प्रोग्राम शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने की तैयारी हुई थी। इसकी जिम्मेदारी पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे को दी गई थी।

पहले चरण में 14 राज्यों को चिन्हित किया गया था। इनके 64 जिलों में यह अभियान चलाया गया। दूसरी तरफ संघ की मुस्लिम संस्था मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी इस दिशा में अहम भूमिका अदा कर रही है। इस साल दिल्ली में राजघाट पर ईद मिलन समारोह में
मंच की तरफ से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में मंच के संरक्षक इंद्रेश कुमार ने कहा था कि हम वक्त कानून के उद्देश्यों और लाभों को हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए देश भर में 100 से अधिक प्रेस कॉन्फ्रेंस और पांच से अधिक सेमिनार
करेंगे। अब वहीं सितंबर 2021 में मुस्लिम विद्वानों के एक कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भारत में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक समान है। मुसलमानों को भारत में डरने की जरूरत नहीं है। हमें मुस्लिम वर्चस्व की
नहीं बल्कि भारत वर्चस्व की सोच रखनी होगी।

क्या है संघ की बदली रणनीति?

दरअसल RSS पिछले कुछ वर्षों से ‘सभी को साथ लेकर चलने’ की नीति पर काम करता दिखाई दे रहा है। दलितों, आदिवासियों, और मुस्लिम समुदायों के साथ संवाद और संपर्क बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। संघ यह मानता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता के लिए धार्मिक भिन्नता कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

समाज में संदेश  

यह मुलाकात धर्मों के बीच संवाद और भरोसे की बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य इस तरह की बैठकें आगामी राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती हैं। यह बैठक खासकर आने वाले दिनों होने वाले राज्य चुनावों के संदर्भ में अहम है। जहां कुछ लोग इसे “प्रचारात्मक पहल” मानते हैं, वहीं कुछ इसे “समरसता का प्रयास” बताते हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत की मुस्लिम धर्मगुरुओं से यह मुलाकात यह दर्शाती है कि संवाद की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक और सामाजिक धारणाओं के बीच पुल बनाना एक सतत प्रक्रिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस संवाद से स्थायी सामाजिक विश्वास का निर्माण होता है, या यह भी महज राजनीतिक सांस्कृतिक प्रयासों की तरह एक क्षणिक पहल बनकर रह जाएगा। प्रकाश कुमार पांडेय

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